मोदी-राहुल मुकाबला, जाहिर से परे भी देखने की जहमत की जरूरत

22 दिसंबर 2013
संपादकीय
कांग्रेस के घोषित या अघोषित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी राहुल गांधी ने कल देश के उद्योगपतियों के सामने अर्थव्यवस्था के बारे में अपनी बात रखी। और शायद जो बात भारत के कारखानेदारों को सबसे अधिक परेशान कर रही है, उसे हवा से हटाने के लिए केन्द्र सरकार के न सिर्फ पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को हटा दिया गया, बल्कि उसका जिम्मा एक ऐसे पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली को दिया गया, जो कि कारखानों के हिमायती माने जा रहे हैं, और जिनकी तरफ से रिलायंस को मिल रही रियायत पर वामपंथी सांसद लगातार प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को लिख रहे हैं। राहुल गांधी उद्योगपतियों के बीच पहुंचें, उसके ठीक पहले का यह फेरबदल बहुत अनायास और मासूम नहीं लगता है। यह उस उद्योग जगत की शिकायत कम करने का एक तरीका लगता है, जो कि आज मोदी के साथ समझा जा रहा है। यूपीए सरकार की तरफ से पर्यावरण के मुद्दों पर कारखानों और खदानों को, कई दूसरे तरह के प्रोजेक्टों को मिलने वाली मंजूरी में होने वाली देरी को लेकर ऐसा माना जा रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था चौपट होने में इसका खासा हिस्सा रहा है। इसलिए अगर उद्योगपति और कारोबारी उद्योग-मित्र समझे जाने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते भी हैं, तो यह कारखानों-कारोबार के अपने अस्तित्व का सवाल भी है। 
अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव के लिए सीधा मुकाबला शुरू हो गया है, और भाजपा के पास अब कुछ नया साबित करने की कोई चुनौती नहीं बची है। एक पार्टी के रूप में उसने चार बड़े राज्यों में अपनी ताकत साबित कर दी है, और उसके प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी पूरी पार्टी से ऊपर जाकर, अपने आपको एक सबसे कामयाब नेता साबित करने में लगे हुए हैं, जिसमें उनको अधिक मेहनत भी नहीं करनी पड़ रही है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी व्यक्तित्वों के टकराव में मोदी से पिछड़ते दिख रही है, लेकिन जैसा कि क्रिकेट के खेल में होता है, आखिरी ओवर की आखिरी बॉल तक उम्मीद छोडऩे की जरूरत नहीं होती, वैसा ही अभी यूपीए को चुनाव मैदान छोडऩे की कोई जरूरत नहीं है, न ही हौसला छोडऩे की जरूरत है। 
ऊपर लिखी गई इस तस्वीर के सामने अब हम देश के नक्शे को रखकर देखते हैं, और राजनीतिक विश्लेषण करते हैं, तो ऐसा लगता है कि देश का नक्शा इन व्यक्तित्वों के कद के फर्क के बजाय एक दूसरे किस्म का फर्क भी सामने रख सकता है। देश के दो बड़े गठबंधनों के रूप में यूपीए और एनडीए के बीच का मुकाबला देश के कुछ राज्यों में तो आज साफ है, लेकिन बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर ताकतवर पार्टियां आज इन दोनों गठबंधनों से बाहर हैं। और ऐसे माहौल में जब कहीं त्रिकोण, तो कहीं चौकोन चुनाव होंगे, तो उनके नतीजों में से यूपीए और एनडीए का साथ देने वाले किस तरह के कितने लोग होंगे, यह तस्वीर अभी साफ नहीं है। और फिर यह भी साफ नहीं है कि उन नतीजों में जीतकर आने वाली पार्टियों में से कौन सी एनडीए के भीतर नरेन्द्र मोदी के नाम पर असहमत होंगी, और शायद किसी और नाम पर वे एनडीए में आने पर सहमत भी हो जाएंगी? इस तरह आज के चुनावी माहौल को सिर्फ मोदी और राहुल, कांग्रेस और भाजपा, इनके बीच की सीधी लड़ाई मानकर चलना ठीक नहीं होगा। ये दोनों पार्टियां देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां बनकर सामने आएंगी, लेकिन इनके गठबंधन अपने खुद के बूते शायद अगली केन्द्र सरकार न बना सकें। 
इसलिए जो लोग आज यूपीए के लिए उम्मीद पूरी छोड़ चुके हैं, उनको बहुत से ऐसे राज्यों की पार्टियों को देखना चाहिए, जो कि मोदी की अगुवाई वाले एनडीए में शायद जाना न चाहें। आज इन दो गठबंधनों के बाहर जो सीटें दिख रही हैं, वे काफी अधिक हैं, और वे गठबंधन, पार्टी, और नेता को लेकर पसंद और नापसंद पर आज अपनी राय खुलकर सामने रख भी नहीं रही हैं। कल तक यह किसने सोचा था कि जिस कांग्रेस सत्ता को अरविंद केजरीवाल ने उखाड़ फेंका है, जिस कांग्रेस कुनबे को देश के इतिहास में सबसे अधिक केजरीवाल ने कोसा है, आज वही केजरीवाल कांग्रेस के समर्थन से देश की राजधानी में सरकार बना सकता है? आज हिन्दीभाषी भारत पर केन्द्रित मीडिया जो तस्वीर पेश कर रहा है, वह भारत की आधी तस्वीर भी नहीं है। और इस आधी तस्वीर में भी आधी से अधिक ताकतें मोदी और राहुल के टकराव का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए मीडिया को जो टकराव पेश करने में आज आसान पड़ रहा है, वह टकराव हो सकता है कि 2014 में भारत की अगली सरकार बनाने में काम न आए, और तबका सत्तारूढ़ गठबंधन इन दो लोगों से परे, गठबंधन के दूसरे मुद्दों पर बने। लोगों के साथ दिक्कत दरअसल यह है कि जो विकल्प सबसे अधिक आसानी से सामने पेश हैं, उनसे परे जाने की जहमत लोग आमतौर पर नहीं उठाते। और जिंदगी की हकीकत तो यह होती है कि शब्दों के बीच के खाली फासले के भी मायने होते हैं, और उस मतलब को निकाले बिना सही मतलब नहीं निकल पाता। इसलिए आज हम यहां पर सिर्फ एक सिरा शुरू करके छोड़ रहे हैं, कि टीवी के पर्दे का लोकप्रिय टकराव, 2014 का निर्णायक टकराव शायद न भी हो। लोगों को जाहिर से परे देखने की जहमत भी उठानी चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें