4 दिसंबर 2013
संपादकीय
दो महीने से फरार कुख्यात नारायण साईं की गिरफ्तारी की खबर से आज का दिन शुरू हुआ। इसी तरह देश के बहुत से ताकतवर आरोपी और अभियुक्त, अपने आपको मुजरिम साबित करते हुए फरार रहते हैं, और देश की पुलिस उनको ढूंढते रहती है। जिस गुजरात की पुलिस नारायण साईं की तलाश में कई प्रदेशों की पुलिस के साथ रात-दिन लगी हुई थीं, उन प्रदेशों में वहां के अपराधों की छानबीन के लिए भी पुलिस कम पड़ती है, जेलों से विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक ले जाने के लिए पुलिस कम पड़ती है, और जनता के पैसों से चल रही पुलिस ऐसे करोड़पति-अरबपति अभियुक्तों को ढूंढने में अपना लंबा वक्त लगाती है। यहां पर हमको लगता है कि कोई भी पैसे वाला ऐसा अभियुक्त हो, जिसकी तलाश घोषित हो जाने के बाद वह पेश न हो रहा हो, और फरार चल रहा हो, उसकी गिरफ्तारी के साथ-साथ उस पर होने वाले पुलिस के सारे खर्च पर जुर्माना जोड़कर उस अभियुक्त की दौलत से उसे पहले ही निकालने का कानून बना देना चाहिए। अदालतों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि ऐसे लोगों के बैंक खातों से लेकर उनकी जमीन-जायदाद तक से इस पूरे खर्च का कई गुना वसूल किया जाए।
देश में ताकतवर और कमजोर लोगों के लिए दो अलग-अलग किस्म के कानून चल रहे हैं। कागजों पर तो इनको एक जैसा रखा गया है, लेकिन अमल में इसी एक कानून की दो अलग-अलग शक्लें दिखती हैं। गोवा में कुछ ही दिन पहले तहलका के मालिक तरूण तेजपाल की जमानत को लेकर जिस तरह अदालतें कुछ-कुछ घंटों की मोहलत दे रही थीं, उससे लग रहा था कि उन अदालतों के पास मानो और कोई काम ही न हो। वे मानो बैठकर कुछ घंटों बाद पुलिस के वकील या तेजपाल के वकील के आने की राह देख रही हों। दूसरी तरफ जब कोई गरीब अदालत के चक्कर में फंसते हैं, तो वे संभावित अधिकतम सजा से अधिक वक्त सुनवाई के दौरान ही जेल में विचाराधीन कैदी बनकर गुजार देते हैं। ताकतवर और कमजोर के हकों में इस लोकतंत्र के भीतर खाई सा यह जो फर्क है, उसी की वजह से लोगों के मन में लोकतंत्र और इंसाफ के लिए हिकारत भरी हुई है।
आज अगर यह देखें कि जनता के बीच बनी हुई एक संस्था क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड किस तरह अपनी जरा-जरा सी बात को लेकर अदालतों का वक्त बर्बाद करती है, किस तरह सहारा कारोबार समूह पिछले कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट की लगातार की फटकार के बाद भी अदालत के हुक्म को पूरा करने से बचते चले आ रहा है, और अखबारों में पूरे-पूरे पेज के ईश्तहार देकर अदालत को चुनौती ही दे रहा है! देश के ताकतवर तबके को जब कटघरे में जाना पड़ता है, तो जनता को ऐसा लगता है कि उस ताकत के वकील तो उसके साथ खड़े ही रहते हैं, बहुत से मामलों में अदालत की जज भी शायद उस ताकत के साथ खड़े रहते हों। सत्ता, पैसों, या किसी और तरह के असर की ताकत वालों के सजा पाने की गुंजाइश हिन्दुस्तान में कम ही रहती हैं, तब तक, जब तक कि उनके खिलाफ मामला इतना तगड़ा न हो जाए कि उसे भारत की सारी न्याय प्रक्रिया मिलकर भी कमजोर न कर सके।
आज यहां पर हमारा सुझाव यही है कि जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक का जितना खर्च दौलतमंद अभियुक्तों और मुजरिमों पर होता है, उनकी फरारी के आधार पर, और बाकी का उनको सजा हो जाने पर, उस खर्च को कई गुना जुर्माने के साथ उनसे वसूल करना चाहिए। गुजरात के कुपोषण के शिकार बच्चों के हक के पैसों से महीनों तक अगर नारायण साईं नाम के आदमी को ढूंढने में पुलिस लगी है, तो इस पैसे से सैकड़ों गुना अधिक वसूली उसकी दौलत से अभी हो जानी चाहिए, किसी भी अदालती फैसले के भी पहले। और उसके बाद अगर सजा होती है तो और बकाया ऐसे लोगों की दौलत से वसूल किया जाना चाहिए।

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