6 दिसंबर 2013
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
सुनील कुमार
जिस दक्षिण अफ्रीका से गांधी ने सामाजिक आजादी की पहला लड़ाई शुरू की थी, उसी दक्षिण अफ्रीका का गांधी आज चल बसा। किसी को किसी का नाम लेना खतरे का काम होता है, और लोग ऐसी तुलना के बीच से, तुलना के लायक जो बातें नहीं हैं, उनको उठाकर तुरंत ही तर्क को खाक कर देते हैं, लेकिन फिर भी हिन्दुस्तानियों के समझने के लिए नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के लिए गांधी थे, और गांधी से बढ़कर भी बहुत कुछ थे। उनका संघर्ष दुनिया के इतिहास में शायद सबसे कड़ा था, और उस आग में तपकर, दशकों तक, आधी सदी तक तपकर मंडेला जिस मुस्कुराहट के साथ बाहर निकले थे, वह दुनिया के लिए सीखने की एक बात है। दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए जिस इंसान ने 27 बरस की कैद एक कोठरी में गुजारी, और जब वे बाहर निकले, तो हर किसी के लिए उनके दिल, चेहरे, होठों, और नजरों में सिर्फ नरमी और मुस्कुराहट थी। यह एक बात उनको गांधी जैसा भी बताती है, और गांधी से बढ़कर भी बताती है।
कुछ महीने पहले इसी पन्ने पर हमने भारत में किसी भी प्रेरणास्रोत के पूरी तरह अकाल की चर्चा करते हुए उस सिलसिले में मंडेला को याद किया था। और उनकी बीमारी के दौरान लिखा था- ''...दक्षिण अफ्रीका को देखकर रश्क होता है। वहां नेल्सन मंडेला की सेहत ठीक होने के लिए पूरा देश, और बाहर की दुनिया भी दुआ कर रही है। अफ्रीका में शायद ही कोई ऐसा हो जो मंडेला के लिए फिक्र ना कर रहा हो। और यह तब, जब वे किसी कुर्सी पर नहीं हैं, उनके कुनबे का कोई कुर्सी पर नहीं है, और सरकार में उनका कोई दखल नहीं है। उन्हें चुनावों में किसी को टिकिट नहीं देनी है, ना ही औद्योगिक नीतियों में फेरबदल करके अरबों के फेरबदल करने हैं, ना हथियारों की बड़ी खरीद में उनके कोई भूमिका है, लेकिन 95 साल के इस बुजुर्ग नेता के बीमार पड़ते ही उनके देश के राष्ट्रपति अपना विदेश दौरा रद्द कर देते हैं। सही मायनों में वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपिता हैं, जैसे कि एक वक्त हिंदुस्तान में गोडसे-गैंग के अलावा बाकी लोगों के लिए गाँधी थे। मंडेला को देखकर रश्क इसलिए होता है कि इतने बड़े हिंदुस्तान में एक भी इंसान या भगवान ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को इतना और ऐसा भरोसा हो। ...हिन्दुस्तान में अब लोगों को लगता है कि भरोसा करें तो किस पर करें? लेकिन अफ्रीका में ऐसा नहीं है। वहां घर बैठे हुए भी बरसों से मंडेला की बात का इतना वजन था कि दुनिया भर की संस्थाएं उनके मुंह से अपने बारे में एक अच्छी बात कहलवाने के लिए मरी जाती थीं, क्योंकि उनकी एक तारीफ घर बैठे दान की बौछार करवा देती थीं। एक पत्रकार ने कहा है कि नेल्सन मंडेला के चेहरे को देखें तो उस पर 27 साल जेल काटने की कड़वाहट का कोई निशान तक नहीं दिखता, बस एक मुस्कान फैली हुई है।...ÓÓ
नेल्सन मंडेला के जाने के बाद यह दुनिया के बाकी ताकतवर, मशहूर, और सार्वजनिक जीवन के लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती है कि वे अपने काम से अपने नाम को इस ऊंचाई के पैमाने पर कहां तक ले जा सकते हैं। लेकिन यह बात भी समझने की जरूरत है कि जो लोग ऐसे पैमाने पर अपने आपको नापने की परवाह में लगे रहते हैं, वे कभी भी ऐसी ऊंचाई पर पहुंच नहीं पाते। दुनिया में आज बहुत से लोग ऐसे हैं जो कि उनके मौजूदा ओहदों की वजह से ही इतिहास में दर्ज होंगे। लेकिन ऐसे लोग शायद ही कोई बचे हैं, जिनके ओहदे उनके नाम की वजह से इज्जत पा रहे हों। एक शानदार जिंदगी को याद करके आज दुनिया को इस पर खुश होने की जरूरत है कि हाड़-मांस के बने हुए इंसानों के बीच कोई एक इस ऊंचाई तक पहुंच सकता है कि महानता का पैमाना उसके मुकाबले अपने आपको बड़े ही छोटे कद का पाकर, गर्दन ऊपर उठाए देखने लगे। दुनिया में रोजाना बहुत से लोग अधिकतम वजन उठाने, सबसे तेज दौडऩे, सबसे अधिक खींचने के रिकॉर्ड कायम करने में लगे रहते हैं। दुनिया के इतिहास का महानता का गिनीज रिकॉर्ड नेल्सन मंडेला और गांधी जैसे एक-दो लोगों के नाम दर्ज रहेगा, तब तक जब तक कि कोई बिना अपने नाम का रिकॉर्ड बनाने की कोशिश किए सिर्फ बेहतर काम से रिकॉर्ड बनते चले जाने दे। महानता कभी सायास नहीं आती, यह सिर्फ उन्हीं लोगों की जिंदगी में अनायास आती है, जो इसकी न चाह रखते, न परवाह करते। यह सोचकर जो लोग मील के पत्थर देखे बिना, दुनिया के भले की मंजिल का अंदाज लगाए बिना, सिर्फ चलते चले जाएंगे, उनको गांधी और मंडेला सरीखे लोग अपने से अधिक कामयाब होने की दुआ भी देते रहेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें