खरीद-बिक्री पर चलते भारतीय संसदीय लोकतंत्र में नया झोंका

19 दिसंबर 2013
संपादकीय
दिल्ली में सरकार बनाने की दहलीज पर खड़े हुए अरविंद केजरीवाल जिस तरह से एक अभूतपूर्व और विशाल जनमतसंग्रह करके यह मालूम करने की कोशिश कर रहे हैं उसे देखकर लोगों को अटपटा लग रहा है कि हर बात पर जनता से पूछने का यह कौन सा तरीका है? और राजनीतिक दल यह सवाल कर रहे हैं कि अगर सरकार बनाने की ताकत नहीं थी, तो फिर आप पार्टी ने चुनाव क्यों लड़ा था?
लेकिन अगर भारत के संसदीय इतिहास को देखें तो बहुत से राज्यों में ऐसी नौबत आने पर विधायकों की थोक में खरीदी हुई, दल-बदल हुए, राजभवनों से साजिशें हुईं, और मामले-मुकदमे बने। इससे ठीक उलटे आप ने ऐसी कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई, और बात-बात में जनता की राय लेने की अपनी सोच को यहां भी जारी रखा है। जिस संसदीय लोकतंत्र में खरीदी-बिक्री को देश की सबसे बड़ी अदालत भी सजा नहीं दे पाई, उस लोकतंत्र में अगर आज कोई नाटक के लिए ही सही, जनता के बीच जाने की बात करते हैं, तो यह सांसदों और विधायकों की खरीद-बिक्री के मुकाबले एक साफ-सुथरा काम है, बेहतर तरीका है, और लोकतांत्रिक है। केजरीवाल ने भारतीय लोकतंत्र में चले आ रहे बहुत से तौर-तरीकों को तोड़ा है, और इसकी वजह से कई लोगों को लगता है कि वे नाटक जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं। 
हमको भी अक्सर यह लगता है कि वे अपनी सोच को जरूरत से ज्यादा शब्दों में कहते हैं, अपने अलावा बाकी पूरी दुनिया को बेईमान और भ्रष्ट कहते हैं, और इसकी ताजा मिसाल है उनका यह कहना कि अन्ना और आप के बीच मतभेद पैदा करने के लिए कुछ ताकतें सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च कर रही हैं। अब अगर सैकड़ों करोड़ खर्च हो रहे हैं, तो ऐसा खर्च करने वाले लोग भी भ्रष्ट और बेईमान होंगे, और इस खर्च का फायदा पाने वाले लोग भी उसी दर्जे में आएंगे। लेकिन केजरीवाल या किसी और के पास ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं। यह बात घोर अविश्वनीय भी लगती है कि अन्ना हजारे सैकड़ों करोड़ के चक्कर में आकर लोकपाल के मौजूदा मसौदे से संतुष्ट हो जाएंगे, और राहुल गांधी की तारीफ करने लगेंगे। अन्ना की बहुत सी बातों से असहमत रहते हुए भी हमारा यह मानना है कि उनके बारे में ऐसा कोई इशारा करना केजरीवाल की बेइंसाफी है, और जैसा कि हमने कुछ दिन पहले ही यहां लिखा था, केजरीवाल को अन्ना से अपने भूतपूर्व संबंधों और भूतपूर्व प्रेम से परे देखना चाहिए। 
लेकिन जिन लोगों को यह लग रहा है कि दिल्ली में सरकार बनने में यह लंबी देर लग रही है, उनको केजरीवाल के तौर-तरीकों को बर्दाश्त इसलिए करना चाहिए, कि वे कम से कम खरीद-फरोख्त से सरकार नहीं बना रहे, वे अब तक भ्रष्टाचार के आरोपों से बचे हुए हैं, और भारत की राजनीति में यह एक ताजी हवा का झोंका है। लेकिन हम आज उनके तौर-तरीकों के बारे में जब लिख रहे हैं, तो उनको भी यह बात समझनी चाहिए कि जनता का फैसला एक बार हो जाने के बाद संसदीय लोकतंत्र में हर मुद्दे पर फिर जनमतसंग्रह के लिए दौडऩा, संसदीय लोकतंत्र के तालमेल और आपसी समझ, सामूहिक जनकल्याण के विकल्पों को अछूत मानने जैसा है। अपनी छवि और अपनी साख को बाकी राजनीतिक दलों से ऊपर रखने के लिए, बिल्कुल बेदाग रखने के लिए वे जनता से राय मांगने का जो काम कर रहे हैं, वह बेमतलब है। उनको ऐसा करने का हक तो पूरा है, लेकिन यह सिलसिला उनकी लोकप्रियता को ही खत्म करेगा, और इससे धीरे-धीरे संसदीय लोकतंत्र में उनको बाकी पार्टियों के मजबूरी और बेबसी के मिल रहे समर्थन की संभावना भी खत्म हो जाएगी। लोकतंत्र में एक-दूसरे को अछूत मानकर राजनीति नहीं की जा सकती। नीतियों और सिद्धांतों का विरोध एक अलग बात होती है, लेकिन व्यापक जनकल्याण के लिए लोगों को साथ आकर काम करना आना चाहिए, और अरविंद केजरीवाल अभी इस बात को सीखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। फिलहाल खरीद-बिक्री पर चलता भारत का संसदीय लोकतंत्र यह एक नया ढर्रा देख रहा है, और आगे इसका क्या होता है, यह आने वाले दिन बताएंगे।

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