11 दिसंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनने के मौके पर हम कुछ दिनों तक लगातार इस जगह पर उससे जुड़े मुद्दों पर ही लिखना चाहते थे, और कल सुप्रीम कोर्ट का एक ऐसा आदेश आया है कि उस पर भी लिखना था, यह एक ऐसा मामला है जिस पर ये दोनों जरूरतें पूरी हो रही हैं, और हम हिन्दुस्तान की लालबत्ती सोच और छत्तीसगढ़ की नई सरकार, इन दोनों पर एक साथ लिख पा रहे हैं।
हमारे नियमित पाठकों को मालूम होगा कि हम हर कुछ महीनों में लालबत्तियों के खिलाफ और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कुख्यात और बदनाम हो चुके, जनता के बीच नफरत का सामान बन गए वीआईपी नाम के शब्द के खिलाफ लिखते आए हैं, और जब सुप्रीम कोर्ट ने लालबत्ती के बारे में कुछ महीने पहले भी नोटिस जारी किए थे, तब हमने अदालत के खिलाफ भी लिखा था। आज भारतीय लोकतंत्र के लिए बुरा यह है कि अदालत अपनी सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ पाई है, और हमारे लिए आज लिखने का एक अच्छा मुद्दा फिर तैयार है।
लोकतंत्र के भीतर इस तरह की सोच पर हमें तरस आता है और शर्म भी आती है कि देश की जनता ऐसे प्रतिनिधियों को ढोने के लिए बेबस है जो कि अपने-आपको जनता से बिल्कुल ही अलग, बिल्कुल ही ऊपर देखना चाहते हैं। यह सोच हमें मनुवादी जिंदगी जीते भारत के उस हिस्से की लगती है जहां पर कि अपने-आपको ऊंची जाति का मानने वाले लोग कुछ दूसरों को नीची जाति का मानते हुए उन पर जुल्म करते हैं, उनके दूल्हों को घोड़ों पर नहीं चढऩे देते, उन्हें जूते पहनकर नहीं चलने देते और गांवों में उनको ऐसी जगहों पर ही बस्तियां बनाने देते हैं जहां पर तथाकथित ऊंची जात के गुरूर वाले लोगों की बस्तियों से निकली नालियों का पानी बहकर पहुंचता हो।
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि एक निर्वाचित नेता को जनता से इस कदर कटने की जरूरत क्या है, वह जनता के मन में अपने लिए नफरत खड़ी करने से बिना डरे कैसे रहता है, और लोकतंत्र के भीतर सत्ता-सवर्णों का एक नया दर्जा कैसे बनाया जा सकता है? यह एक भयानक हालत है जिसके पीछे सत्ता की अंधी ताकत से उपजी बददिमागी है और जो देश के भीतर राजा और प्रजा जैसे दो अलोकतांत्रिक और सामंती फर्क वाले दर्जे खड़े कर रही है। हमें उन जजों और अफसरों पर भी तरस आता है जो कि लालबत्ती जलाकर या सायरन बजाते हुए या पायलट गाड़ी सामने-सामने चलवाकर जनता के बीच से आते-जाते हैं। हम इसे सुविधा नहीं एक आतंक मानते हैं और उसका कोई तर्क हमें नहीं दिखता सिवाय इसके कि सत्ता पर काबिज लोग धीरे-धीरे करके अपने लिए सुविधाएं और खास अधिकार जुटाते चलते हैं। इस पर रोक न लगे इसलिए ऐसे तमाम हक सत्ता पर बैठे लोग, संसद को चला रहे लोग जजों को भी देते चलते हैं, वरना बड़ी अदालत का एक जज क्यों सायरन बजाते हुए कहीं आए-जाए?
सड़क पर हड़बड़ी की जरूरत तो आग बुझाने जाती दमकल, मरीज को या घायल को लेकर जाती एम्बुलेंस, किसी अपराध को रोकने या अपराधी को तलाशने के लिए जाती पुलिस को ही पड़ सकती है। जजों, मंत्रियों, अफसरों, सांसदों या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे लोगों की जिंदगी में ऐसी कौन सी हड़बड़ी है जो कि रोज मजदूरी करने आते-जाते, सड़क से गुजरते किसी बूढ़े या कमजोर इंसान के हक को कुलचते हुए भी जरूरी है? साइकिल पर जाते हुए मजदूरों की जिंदगी की जरूरत, लालबत्ती और सायरन से लैस जिंदगियों से कम क्यों आंकी जाती है? एक मंत्री के लिए मंत्रालय या बंगले पहुंचना, रफ्तार से पहुंचना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी स्कूल जाती एक बच्ची का समय पर पहुंचना है। आम लोगों को रोककर खास लोगों को लालबत्ती, सायरन, पायलट गाड़ी के सहारे पहले आगे निकालना, चौराहों पर लालबत्ती से छूट देना पूरी तरह सामंतवाद है और इसकी कोई जगह लोकतंत्र में नहीं होनी चाहिए।
आज हमको इस बात पर बहुत अफसोस है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ पाया, और एक पाखंडी शब्द-संवैधानिक पद, उछालते हुए उसने देश के हाईकोर्ट तक के जजों को, मंत्रियों और राज्यपालों को, और हर प्रदेश की राजधानी में औसतन दर्जनों लोगों को लालबत्तियां दे दी हैं। यह बहुत ही खराब फैसला है, और देश के मुख्य न्यायाधीश को यह जवाब देना चाहिए कि उनका काम सड़क किनारे फेरी लगाने वाले इंसान से अधिक महत्वपूर्ण कैसे है? फेरी वाले की जिंदगी में उसका अपना काम उतना ही मायने रखता है, उससे अधिक मायने रखता है, जितना मायने एक राष्ट्रपति के लिए उसका काम रखता है, या मुख्य न्यायाधीश के लिए उसका काम रखता है।
यहां पर हम छत्तीसगढ़ सरकार को आज तीसरे कार्यकाल के मौके पर यह याद दिलाना चाहते हैं कि भाजपा के पीछे जिस आरएसएस का हाथ रहा है, और जिसकी मेहनत के बिना भाजपा छत्तीसगढ़ में यह चुनाव नहीं जीती होती, उसकी सोच एक सादगी की सोच है। इस पूरे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सादगी की सोच रही है। और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने आज यह चुनौती और संभावना दोनों एक साथ हैं कि वे किफायत का एक नया सिलसिला शुरू करें, अपनी सरकार के बददिमाग लोगों की सामंती सोच को खत्म करके उनको इन पांच बरसों में जनता के पांच कदम करीब लाने की कोशिश उनको करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी अदालत से खारिज होने के लायक है, और सिर पर लाल कलगी का हक सिर्फ मुर्गों को होना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को, भाजपा को, और प्रदेश के मंत्रियों को यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के सबसे बड़े नेता, गुजर चुके लखीराम अग्रवाल ने 2003 में भाजपा सरकार बनने के वक्त सार्वजनिक रूप से कहा था कि भाजपा सरकार को लालबत्तियां खत्म कर देनी चाहिए। हम इस प्रदेश में राज्यपाल शेखर दत्त से भी यह उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की बनाई लिस्ट के अधिकारों का इस्तेमाल करने के बजाय, उनको आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का इस्तेमाल करना चाहिए, और लालबत्ती-सायरन का अलोकतांत्रिक-सामंती आतंक खत्म करना चाहिए। संविधान या किसी अदालत ने अगर कोई अलोकतांत्रिक अधिकार दिए हैं, तो भी लोकतांत्रिक सोच वाले लोग उन अधिकारों के इस्तेमाल के बिना भी रह सकते हैं, और जनता की नजर में अधिक इज्जत के हकदार बन सकते हैं।
आज छत्तीसगढ़ सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी यह जीत स्थायी नहीं है, और भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी है, एक फीसदी भी नहीं। और इस देश की राजधानी में अभी-अभी यह साबित हुआ है कि किस तरह एक झाड़ू, लंबी-चौड़ी जीत को, दसियों फीसदी वोटों को झड़ाकर फेंक सकती है। छत्तीसगढ़ की सरकार, यहां के संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग उस लालबत्ती, सायरन, और खास दर्जे की हवस को छोड़ें, जो कि सिर्फ कुर्सी के चलते हासिल हैं, और ऐसे इंसान बनने की कोशिश करें, जो कुर्सी के बाद भी इज्जत के हकदार रहते हैं। जनता के मन में हर सायरन, हर लालबत्ती, और हर बार चौराहों पर रोके जाने पर लोकतंत्र के इन बड़े चेहरों के लिए जो हिकारत और नफरत उठ खड़ी होती है, उसका असर जरूर होता होगा।

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