न हटने पर आमादा गांगुली को पद से निकाल फेंकने की जरूरत

16 दिसंबर 2013
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए ए.के. गांगुली ने अपनी एक प्रशिक्षु वकील के साथ जो बर्ताव किया, और इस बर्ताव को जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बनाई हुई एक जांच समिति ने भी गलत ठहराया, अपनी जांच रिपोर्ट दी, उसके बाद भी कुछ बातें हैरान करने वाली थीं। उनमें से एक तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही इस हाल तक के साथी के खिलाफ कोई कार्रवाई खुद करना जरूरी नहीं समझा, जबकि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट से नीचे की अदालतें भी खुद होकर पुलिस को जुर्म दर्ज करने के लिए कहती ही रहती हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत की इस शर्मनाक चुप्पी, और मुंह चुराने के बाद एक दूसरी भयानक बात यह रही कि इन आरोपों से जांच में भी दोषी पाए गए ए.के. गांगुली ने हर तरफ की मांग के बाद भी पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर अपनी मौजूदा नियुक्ति से इस्तीफा देने से साफ इंकार कर दिया। 
यहां पर सवाल सबसे पहले तो गांगुली की नैतिकता का उठता है जिन्होंने कि अपनी एक प्रशिक्षु के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ इस तरह की हरकत की, और सेक्स-हमला किया। दूसरी बात संवैधानिक उठती है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराया। तीसरी बात यह उठती है कि सारी जानकारी उजागर हो जाने के बाद, दोषी ठहराए जाने के बाद भी गांगुली इस तरह से एक संवैधानिक पद पर चिपके रहने पर अड़ा हुआ है। यह संवैधानिक पद उसे सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से रिटायर होने की वजह से मिला था, और जैसा कि नाम से जाहिर है, इस कुर्सी की जिम्मेदारी लोगों के मानवाधिकार की रक्षा है। ऐसा जज जो खुद सेक्स-हमले का दोषी पाया गया है, जिसके पास अपनी सफाई के लिए कुछ नहीं है, वह आज न तो शर्म में डूबकर इस कुर्सी को छोडऩे के लिए तैयार है, और न ही अपनी ऐसी हिंसक सोच का मानवाधिकार-रक्षा की जिम्मेदारी के साथ एक सीधे टकराव को मानने के लिए तैयार है। 
संवैधानिक पदों पर जो लोग रहते हैं, उनको हटाने का तरीका खासा लंबा और जहमत भरा है। आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि जो लोग इतनी ऊंची कुर्सियों तक पहुंचते हैं, या मनोनयन से बिठाए जाते हैं, वे लोग सार्वजनिक जीवन में सिर्फ पेशेवर मुजरिम की तरह कानून की आड़ लेकर अपने जुर्म को छुपाने के बजाय खुद होकर ऐसी जगहों से हट जाएं। लेकिन गांगुली ने ऐसी नौबत ला दी है कि उसको हटाने के लिए अब पश्चिम बंगाल की सरकार, या देश के प्रधानमंत्री को दखल देकर राष्ट्रपति को यह मामला भेजना पड़ेगा, और इसको हटाने का काम करना पड़ेगा। 
संवैधानिक पदों से बर्खास्तगी के लिए भारत में महाभियोग जैसी जो प्रक्रिया है, उसके बारे में भी हो सकता है फिर सोचना पड़े, अगर अधिक लोग गांगुली जैसे निकलने लगें। आज देश का माहौल आधी सदी पहले के आजाद भारत जैसा नहीं है, जब बहुत किस्म के सामंती जुर्म सत्ता की ताकत की आड़ में खप जाते थे। देश में आज महिला अधिकारों को लेकर, लोकतांत्रिक बारीकियों को लेकर एक बहुत अलग किस्म की जागरूकता आई हुई है, और समाज के भीतर एक बड़ी सक्रियता भी आई हुई है। इसलिए अब लोगों को पुराने वक्त सरीखी आड़ नसीब नहीं है। गांगुली ने जो किया है, वैसा करने वाले सैकड़ों और लोग हो सकते हैं, लेकिन मिसाल तो उन्हीं मामलों से कायम होती हैं जो कि उजागर होते हैं, जिनको लेकर शिकायत होती है, जिन पर जांच होती है, जिनमें कुसूर पाया जाता है। जब बात यहां तक पहुंचती है तो फिर उससे जो मिसाल बनती है, या बनने का मौका आता है, उसी से समाज के भीतर एक जागरूकता आती है। मुजरिम बनने की खामियां रखने वाले लोगों की आंखें भी इससे खुलती हैं, और जुर्म का शिकार होने वाले लोगों को भी शिकायत का हौसला इससे मिलता है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे कुसूर और सजा के मामले बढ़ते हैं, वैसे-वैसे समाज के दूसरे लोगों में चौकन्नापन आता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तो बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी दिखाई है, उसके मुकाबले हमको यह देखना होगा कि केन्द्र सरकार की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी सरकारी वकील इंदिरा जयसिंह ने हौसले के साथ इस मामले को उठाया है, और गांगुली को हटाने की कोशिश शुरू की है। आज इंदिरा जयसिंह के साथ और लोगों को भी खड़े होने की जरूरत है। 

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