गरीब के नोटदान के फैसले से वोटदान का अंदाज भी लगाकर सुधरने की जरूरत...

30-12-2013
संपादकीय 
छत्तीसगढ़ के पहले चिकित्सा दीक्षांत समारोह में राज्यपाल शेखर दत्त ने एक घटना का जिक्र किया कि किस तरह एक छत्तीसगढ़ी किसान अपनी जिंदगी भर की कमाई 21 लाख रूपए राज्य सरकार को अस्पताल के लिए देनी तय की थी। बाद में उसने यह रकम एक स्कूल के लिए दे दी। उस किसान से कुछ महीने पहले की अपनी बातचीत की चर्चा करते हुए शेखर दत्त ने बताया कि अभनपुर का यह किसान पहले गांव में अस्पताल चाहता था लेकिन फिर उसने स्वास्थ्य विभाग का कामकाज देखकर इरादा बदल दिया। उसकी जिंदगी भर की मेहनत की कमाई का सदुपयोग हो, इसलिए उसने इसे स्वास्थ्य विभाग को न देकर शिक्षा विभाग को दिया। राज्यपाल ने बताया कि उसने कुछ महीने पहले के शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कार्यकाल से प्रभावित होकर अपना फैसला बदला।
छत्तीसगढ़ के जिस डी के अस्पताल में इस राज्य का पहला चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल चलता था, उसे भी एक दानदाता, दाऊ कल्याण सिंह, ने दिया था। और सन् 2000 में जब राज्य बना, तब यही अस्पताल भवन राज्य सरकार का मंत्रालय बना, और अब तेरह बरस बाद एक बार फिर वह दानदाता की भावना के मुताबिक अस्पताल बना है। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह रायपुर में सब्जी बेचने वाली बिन्नी बाई ने अपने बुढ़ापे में बड़ा दान देकर इसी डी के अस्पताल के मरीजों के साथ के लोगों के लिए धर्मशाला बनवाई थी।
इन दो-तीन बातों के साथ आज हम यहां यह याद दिलाना चाहते हैं कि जब कभी समाजसेवा के काम के लिए भरोसेमंद लोग आगे आते हैं, तो उनको दान या चंदे की कमी नहीं रहती। लोग जुटते जाते हैं और काम आगे बढ़ते जाता है। समाजसेवा से परे भी आज दिल्ली में आम आदमी पार्टी के चंदे का जो पारदर्शी हिसाब जनता के बीच है, वह बताता है कि किस तरह दिल्ली में केन्द्रित इस पार्टी के इस दिल्ली चुनाव के लिए दिल्ली के बाहर के उन बहुत पढ़े-लिखे, कामयाब और पेशेवर, आमतौर पर राजनीति को गंदा समझने वाले, उससे दूर रहने वाले, लोगों ने चंदा भेजा। अब ऐसी भी खबरें हैं कि बड़ी-बड़ी नौकरियों और कामकाज को छोड़कर लोग इस पार्टी से जुड़ रहे हैं, और इसे शायद जरूरत के लायक पैसे की कभी कमी नहीं रहेगी। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपने हिमायतियों के नाम अपील जारी की थी कि उनके पास चुनाव का पूरा खर्च आ चुका है, और लोग अब चंदा न भेजें।
जिस देश में कारगिल के शहीदों की पत्नियों को मकान देने के नाम पर देश का सबसे आदर्शहीन घोटाला होता है, उस देश में लोग अगर किसी नेक काम के लिए चंदा देने की सोचें भी, तो किसको दें? आज सरकार और बाजार से मिले सैकड़ों करोड़ के दान-अनुदान से चलने वाले ट्रस्ट और संगठनों में से कुछ अगर बेईमानी करते हैं, तो उससे दान की पूरी सोच जख्मी होती है। लोगों का उत्साह और हौसला टूटता है। हमको प्रधानमंत्री राहत कोष में पहुंचने वाले दान के आंकड़े नहीं मालूम हैं, और न ही बहुत से राज्यों में मुख्यमंत्री राहत कोष या सहायता कोष में पहुंचने वाले आंकड़े। लेकिन हमारा पुख्ता अंदाज है कि जिस प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की, जिसकी सरकार की, साख बेहतर होगी, उसको लोग अधिक दान खुलकर देंगे। और अगर कोई पीएम-सीएम राहत कोष को चाहे ईमानदारी से चलाते हों, अगर वे सरकारी कामकाज में बेईमानी के लिए जाने जाते हैं, तो उनको कोई गरीब तो ट्रस्ट के लिए भी अपनी रकम नहीं भेजेंगे।
इसलिए सार्वजनिक जीवन में जो लोग किसी ट्रस्ट में काम करते हों, या राजनीतिक दल के हों, उनको जनता के पैसों में बेईमानी करने से उतनी रकम नहीं मिल सकती, जितनी कि ऐसी बेईमानी के बीच ईमानदारी के लिए मशहूर किसी मुखिया को मिल सकती है। छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के बताए हुए उनके अनुभव, और दिल्ली में आम आदमी पार्टी का गढ़ा गया इतिहास, इन दोनों से हर किसी को साख की सबक लेनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवा का हाल पिछले दस बरसों में सबके सामने है। हमारे पास भी इसके बारे में लिखने को कुछ भी नया नहीं बचा है। और पुराने लिखे हुए का कोई असर होने का कोई आसार भी नहीं बचा है। लेकिन राज्य सरकार को इस बारे में ईमानदारी से सोचना चाहिए कि उसके कामों की साख जनता के दिल पर किस तरह से दर्ज होती है। उस छोटे से किसान ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई दान में देने का फैसला कर लेने के बाद भी अगर सरकार के सबसे बड़े जनसुविधा के विभाग, स्वास्थ्य विभाग को न देना तय किया, तो उसकी भावना राज्य सरकार के लिए एक सर्टिफिकेट है, और उस पर क्या लिखा है, यह सबको मालूम है, क्यों लिखा है, यह भी सबको मालूम है। लेकिन जिस तरह स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान में फेल पर्चों में पास होने के लिए एक पूरक परीक्षा होती है, एक श्रेणी सुधार का मौका रहता है, उस तरह राज्य सरकार को, खासकर उसके स्वास्थ्य विभाग को कोशिश करनी चाहिए। वरना आज तो उस किसान ने एक विभाग की जगह दूसरे विभाग को अपना नोटदान किया है, कल के दिन अगर इसी आधार पर वह एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी को अपना वोटदान करने को मजबूर होगा, तो क्या होगा? और हम पिछले कुछ दिनों में कई बार जो बात राज्य की भाजपा सरकार को याद दिला चुके हैं, उसे आज यहां पर फिर दुहराने की जरूरत है, कि राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी का है, एक फीसदी से भी कम का है। और भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक झाड़ू ने आधी और एक सदी पुरानी पार्टियों के दबदबे को बुहारकर अभी-अभी फेंका है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें