छत्तीसगढ़ के नतीजे, तिलक का चावल, और उसके पीछे का चेहरा भी

9 दिसंबर 2013
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार 
कल के चुनावी नतीजों पर अलग-अलग कुछ टुकड़ों में बात करनी होगी। इसमें से छत्तीसगढ़ पर आज बात करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यही एक राज्य ऐसा था जहां पर कांग्रेस के सत्ता में आने की कोई संभावना थी, और वह अगले पांच बरस के लिए खत्म हो गई। दूसरे जिन राज्यों में जहां भाजपा एक आंधी की तरह सीटें पा चुकी है, वहां पर कांग्रेस की कोई संभावना थी भी नहीं। जहां तक हमारा सवाल है, तो राजनीतिक विश्लेषकों के बीच शक की गहरी धुंध में भी हमने इस अखबार में और बाहर भी छत्तीसगढ़ के इसी नतीजे का अंदाज बताया था। लेकिन कल दोपहर छत्तीसगढ़ में वोटों की गिनती के बीच जिस तरह के चढ़ाव-उतार और कांटे की टक्कर दिख रही थी, वह शाम होने के पहले ही किस तरह, और क्यों भाजपा की तरफ आकर थम गई, उस पर सोचना-विचारना भाजपा और कांग्रेस के लिए तो जरूरी है ही, छत्तीसगढ़ की सरकार और जनता के लिए भी जरूरी है, और सबसे अधिक,  छत्तीसगढ़ के लोकतंत्र के लिए जरूरी है।
सीटों के आधार पर इस राज्य में जितने तरह के विश्लेषण हुए, उनमें से इतनी अधिक सीटें हैरान करते हुए जीत से हार, और हार से जीत में तब्दील हो गई, कि पूरे प्रदेश में किसी एक पार्टी की जीत का अंदाज गलत साबित होना अधिक आसान था। और हुआ भी वही। लेकिन हमारा विश्लेषण जिन मुद्दों पर टिका हुआ था, वे सीटों से परे के थे, और हमारा अंदाज भी सीटों की गिनती से परे का था, और किसी एक पार्टी को, भाजपा को, बहुमत देने वाला था। इन मुद्दों में दो बातें सबसे अधिक असर डालने वाली हमको कल भी लगती थीं, और आज भी लगती हैं। एक तो यह कि आबादी के सबसे गरीब पचास फीसदी हिस्से के लिए पिछले दस बरसों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने एक निजी एजेंडा की तरह एक के बाद एक जो कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, वे अपने पूरे आकार में, और अमल में, अभूतपूर्व थीं। सबसे गरीब, के सबसे करीब, इसको उन्होंने एक नारा तो नहीं बनाया, लेकिन कुछ मौकों पर इसे कहा, और आम वोटरों के बीच उनकी यही पहचान इन दस बरसों में बनते-बनते अब पुख्ता हो गई है। हमारा एक मोटा अंदाज यह है कि जो वोट पड़ते हैं, उनमें शायद तीन चौथाई वोट, आबादी के इसी आधे गरीब हिस्से के रहते हैं। इसलिए रमन सिंह को इस तबके का सहारा पूरे प्रदेश में इतना रहा, कि उनके पार्टी के मंत्रियों, विधायकों, और नेताओं से नाराज मतदाताओं के बीच भी गरीबी की रेखा के नीचे वाली आधी आबादी का बोलबाला रहा। इतने गरीब लोगों के पास अलग से कोई जुबान नहीं होती, और उसे जब वोट की मशीन की आवाज के मार्फत अपनी आवाज उठाने का मौका मिलता है, तो किसी भी दूसरे आय वर्ग के मुकाबले इसके वोट अनुपात से बहुत अधिक होते हैं। इस तबके के लिए रमन सिंह ने सिर्फ चावल की रियायत दी हो ऐसा भी नहीं है। ये रियायतें बहुत तरह की थीं, लेकिन शहरी-संपन्न मीडिया ने इस पूरे के प्रतीक के रूप में महज चावल को चर्चा में रखा, और इससे कांग्रेस के नेताओं को यह धोखा भी हुआ कि देश के किसी राज्य में चावल की हांडी एक बार से ज्यादा कामयाब नहीं हुई है। दरअसल छत्तीसगढ़ में नीचे की आधी आबादी के लिए रियायतें चावल से परे भी बहुत सी थीं। और रमन सिंह के अनगिनत उम्मीदवारों के खिलाफ भारी नाराजगी के बावजूद अगर इस राज्य में आज भाजपा की सरकार बनी है, तो वह कमल छाप पर नहीं, रमन छाप पर बनी है।
दूसरा मुद्दा इस जीत के पीछे का जो है वह रमन सिंह के चेहरे का है। आज की राजनीति में जितने तरह की बुरी और गलत बातें, जितने तरह के जुर्म और भ्रष्टाचार, जितने तरह का घमंड, और बदमिजाजी-बदजुबानी, बहुत आम बातें हो चुकी हैं, रमन सिंह की पहचान इनसे पूरी तरह परे की है। इनका चेहरा छत्तीसगढ़ में भाजपा के सारे प्रचार पर लगभग अकेला ही छाया हुआ था, और यह फैसला उनकी पार्टी का रहा हो, या उनका खुद का, यही उनकी पार्टी के काम आया। एक तरफ कांग्रेस पार्टी चुनाव के पहले के कई महीनों से लेकर, वोटों की गिनती के बाद तक इसी अंतद्र्वद्व में लगी हुई थी, और लगी हुई है, कि छत्तीसगढ़ में इस पार्टी का चेहरा कौन है? और जो चेहरे बारी-बारी से, खुद के सोचे-समझे या मीडिया के अपने फैसले से जनता के सामने रमन सिंह के मुकाबले पेश किए जाते रहे, उन चेहरों से रमन सिंह की तुलना  में कोई पहेली नहीं बची थी, जनता के सामने फैसला साफ था। इस बात का असर कम या अधिक कितना हुआ है, इसको नापने का कोई पैमाना कभी नहीं बन पाएगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह तुलना पूरे वक्त जुबानी चर्चा में भी रही, और मीडिया में भी। यह चर्चा अभी हम कांग्रेस के संदर्भ में नहीं कर रहे, क्योंकि उसके बारे में आने वाले दिनों में इसी जगह अलग से लिखा जाना है, लेकिन भाजपा की जीत के पीछे की जो वजहें हमको चुनाव हफ्तों पहले से साफ दिखने लगी थीं, उनमें से यह भी एक थी।  सीटों का विश्लेषण करने जो लोग बैठेंगे, उनको जगह-जगह, अलग-अलग सीटों पर हमारे इन दो तर्कों के खिलाफ देने के लिए मिसालें बहुत सी मिल जाएंगी। लेकिन हम यहां सीटों का विश्लेषण नहीं कर रहे, और जब कोई सीटों से ऊपर उठकर एक व्यापक नजरिए से, आसमान में तैरते पंछी की आंखों से धरती को देखने की तरह, इस राज्य में इन नतीजों के पीछे की बुनियादी बातों को देखेंगे, तो उनको ऐसे मुद्दे दिखेंगे, जो कि सीटों को करीब से देखते हुए नहीं दिख पाएंगे। 
लेकिन कांग्रेस की चर्चा आज यहां न करते हुए भी भाजपा की जीत के मायने निकालते हुए इस जीत की कुछ वाहवाही केन्द्र की यूपीए सरकार को भी देनी पड़ेगी। हमने बार-बार यह लिखा था, और जगह-जगह कहा भी था कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी को देश की यूपीए सरकार के दस बरस के बुरे कामों, और भ्रष्टाचार, महंगाई और अहंकार, इन सबका दाम चुकाना होगा। रमन सिंह की यह जीत उनकी खूबियों के किसी टापू की तरह अलग से नहीं देखी जा सकती। उनके अपने मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ छत्तीसगढ़ की जनता के मन में परले दर्जे की जो नाराजगी थी, उसके मुकाबले छत्तीसगढ़ में भाजपा को दिल्ली की यूपीए का सहारा मिला। राजनीतिक विश्लेषण में सत्ता से नाराजगी का जो अंग्रेजी शब्द एंटी-इंकम्बेंसी इस्तेमाल किया जाता है, वह छत्तीसगढ़ में, और हमारा अंदाज है कि बाकी तीन राज्यों में भी, यूपीए सरकार के खिलाफ खूब चला, और उसका दाम कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुकाना पड़ा। इसीलिए कांग्रेस की हार उम्मीद से दुगुनी रही। 
इस विधानसभा चुनाव से छत्तीसगढ़ में भाजपा और खासकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए एक बहुत बड़ा सबक भी निकलकर आया है। दस बरस के अच्छे कामकाज के बाद भी अगर इन चुनावों में उनको कांग्रेस की टक्कर के ही अच्छे और बुरे तौर-तरीके इस्तेमाल करके चुनाव जीतना पड़ा है, जब उनको अपनी निजी सरकारी कामयाबी, और निजी राजनीतिक-व्यक्तिगत साख दांव पर लगाकर अपने डूबे हुए लोगों को उबारना पड़ा है, तो पांच बरस बाद फिर ऐसी नौबत न आए, इसके लिए उनको बहुत गहरे आत्ममंथन और आत्मचिंतन की जरूरत है, सुधार की भी। आत्मविश्लेषण सिर्फ हारने वाले के लिए जरूरी नहीं होता, हार से बचने वाले, या उतनी ही जीत पर थम जाने वाले के लिए भी जरूरी होता है। छत्तीसगढ़ में आने वाले दिन पहले दस बरसों के मुकाबले भाजपा के लिए अधिक आत्मविश्वास और आत्मसंतुष्टि के हो सकते हैं, और ऐसे ही दिन अधिक खतरनाक भी होते हैं। 
फिलहाल आज का दिन अधिक नसीहत का मौका नहीं है, और यह दिन मुख्यमंत्री के लिए एक ऐसे संकल्प का दिन होना चाहिए कि बीते दस बरसों की कमियां और खामियां वे आने वाले पांच बरसों में दूर कर ही लेंगे। और भारतीय चुनावी लोकतंत्र में 1825 दिनों के कार्यकाल का पहला दिन शायद आज-कल में डॉ. रमन सिंह के लिए शुरू हो जाएगा, और पहले दिन से ही उन्हें 1825वें दिन बेचैनी और धुंध न रहने देने के लिए मेहनत से काम शुरू कर देना चाहिए। 
आज छत्तीसगढ़ की चुनावी नतीजे को लेकर अगर कोई हमसे एक लाईन में पूछे कि यह चावल का असर था, या चेहरे का, तो हमारा कहना यही होगा कि यह माथे पर लगे तिलक के चावल, और उसके पीछे के चेहरे का मिलाजुला असर था। 

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