कांग्रेस को ऐतिहासिक चुनौती, और उसकी ऐतिहासिक गलतियां

29 दिसंबर 2013
संपादकीय
बीच में कई दिन लगातार दूसरे मुद्दे इतने अधिक हावी रहे कि कांग्रेस की बहुत सी बातों पर हमको लिखने का मौका ही नहीं मिला। ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस ने मौका नहीं दिया, लेकिन कभी अरविंद केजरीवाल, तो कभी कोई और अधिक जरूरी मुद्दा सामने खड़े होकर कांग्रेस को धकेलकर पीछे करते रहा। आज जब बाकी मुद्दों से जरा सी सांस मिली है, तो फिर कांग्रेस की बारी है। 
महाराष्ट्र में देश के सबसे आदर्शहीन आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट को महाराष्ट्र की कांग्रेस अगुवाई वाली कांग्रेस-एनसीपी केबिनेट ने जिस तरह से खारिज किया, उसने मानो अपने ही भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के ताजा सार्वजनिक रूख और हाल ही में घोषित नीति-सिद्धांतों को खारिज कर दिया। अब यहां पर यह भी याद रखने की बात है कि महाराष्ट्र के जिस मंत्रिमंडल ने तथ्यों और सच से भरी हुई इस आदर्श जांच रिपोर्ट को खारिज किया, उसके मुखिया, कांग्रेस के मुख्यमंत्री, पृथ्वीराज चौहान भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले महाराष्ट्र में सामने आने के बाद कांग्रेस की इज्जत बचाने के अंदाज में प्रधानमंत्री कार्यालय से महाराष्ट्र भेजे गए थे। उनको एक धीमा ही सही, लेकिन ईमानदार माना जाता था। और उनकी ईमानदारी उस दिन साबित हुई जिस दिन उन्होंने कांग्रेस की ऐतिहासिक बेईमानी को उजागर करने वाली आदर्श जांच रिपोर्ट को खारिज करने का काम किया। 
हिन्दुस्तान में किसी केबिनेट का फैसला वैसे तो लोकतंत्र का अंत नहीं होता, और उसके खिलाफ अदालत के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं, लेकिन अभी तो सवाल यह है कि जिस पार्टी का भविष्य दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस में अपराधियों को बचाने वाला अध्यादेश, यूपीए मंत्रिमंडल से मंजूर हो जाने के बाद भी फाड़कर फेंक देता है, और न सिर्फ कांग्रेस बल्कि पूरा यूपीए गठबंधन अपने ही फैसले को फटे कागज के इन टुकड़ों की इज्जत करते हुए, वापिस ले लेता है, वह पार्टी आदर्श की जांच रिपोर्ट को खारिज करते हुए क्या कर रही है?! दूसरी बात यह कि पिछले बरस लोकपाल को खतरनाक बताते हुए संसद में विरोध करने वाले राहुल गांधी इस बार जब देश का रूख देखते हुए संसद में लोकपाल को पास करवाने की अगुवाई करते हैं, तो उनकी पार्टी अपने ही मुख्यमंत्रियों के भयानक भ्रष्टाचार वाली जांच रिपोर्ट कैसे खारिज कर सकती है?!
इसलिए आज कांग्रेस पार्टी का हाल बेकाबू सा दिख रहा है। एक पार्टी के रूप में, यूपीए सरकार के मुखिया के रूप में, राज्यों में सरकार की शक्ल में, उत्तरप्रदेश के दंगा शिविरों की मौतों जैसे मामलों में केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी की शक्ल में, जगह-जगह कांग्रेस पार्टी एक गैरपार्टी जैसा बर्ताव कर रही है। उसके नेता राहुल गांधी अपनी पार्टी से बाहर काम कर रहे एक नेता की तरह काम कर रहे हैं, जो कि एक बाहरी व्यक्ति की तरह कांग्रेस की खामियों को सुधारने का काम तब करते हैं जब कांग्रेस भयानक खामियां कर चुकी होती है। 
पाठकों को याद होगा कुछ अरसा पहले हमने सोनिया गांधी की इस बात के लिए तारीफ की थी कि समलैंगिकता को जुर्म बताने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उन्होंने एक राष्ट्रीय नेता की हैसियत से खुलकर विरोध किया था, और एक सुधारवादी, आधुनिक, वैज्ञानिक, लेकिन अलोकप्रिय, रूख को सामने रखा था। लेकिन वह मामला सुप्रीम कोर्ट का था, वहां से फैसला आने से पहले कांग्रेस या उसकी अगुवाई वाली यूपीए सरकार के पास और कोई चारा, उस वक्त, नहीं था। इसलिए फैसला आने के बाद भी उन्होंने जब दूसरी पार्टियों के दकियानूसी रूख के खिलाफ एक वैज्ञानिक नजरिया सामने रखा था, तब हमने उनकी तारीफ की थी। 
लेकिन आज महाराष्ट्र के मामले में एक बार फिर कांग्रेस की ऐसी नौबत सामने आई है, जिसमें इस पार्टी के भीतर के ढांचे में जगह-जगह शून्य नजर आता है। एक ऐसा खोखलापन जो कि दाएं हाथ को बाएं हाथ तक खबर भेजने से रोक देता है। आज के मुश्किल वक्त में इस पार्टी को अपने तौर-तरीकों को एक संगठित संगठन की तरह करना होगा, उसके बिना इसका कोई भविष्य नहीं हो सकता। और यह हिन्दुस्तान के लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक हादसा होगा कि संगठन के ढांचे के भीतर ऐसे शून्य के चलते इतनी बड़ी पार्टी हाशिए पर चली जाए। कांग्रेस को अपनी ऐतिहासिक भूमिका को, ऐतिहासिक जिम्मेदारी को, और ऐतिहासिक चुनौती को सिर्फ इसलिए अनदेखा नहीं कर देना चाहिए, क्योंकि इस पार्टी के मुखिया के रूप में एक परिवार के फैसलों और सोच को किसी तरह की कोई चुनौती, उससे भी कम, कोई भी असहमति नहीं झेलनी पड़ती। जब असहमति की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है, तो कोई भी संगठन, कोई भी संस्था ऐतिहासिक गलतियां करने की खतरनाक कगार पर पहुंच जाती है। 
आज हिन्दुस्तान की जनता किसी भी पार्टी को गलत काम करते, और फिर उसके नेता को उसकी मरम्मत करते देखना नहीं चाहती। ऐसा सिलसिला लोकतंत्र का अपमान भी रहता है। महाराष्ट्र के आदर्श घोटाले ने पहले ही कांग्रेस की खासी बदनामी कर दी है, और अब उस बदनामी को बूट तले कुचलकर खत्म कर देने की कोशिश से वह बदनामी और अधिक बढ़ी है। ऐसा मुमकिन नहीं है कि महाराष्ट्र केबिनेट का फैसला होने के पहले कांग्रेस हाईकमान से कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने चर्चा न की हो, उसके बाद अगर ऐसी नौबत सामने आई है, तो कांग्रेस को एक गहरे आत्मचिंतन की जरूरत है। 

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