5 दिसंबर 2013
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के जम्मू में एक आमसभा में जब यह भाषण दिया कि कश्मीर की धारा 370 पर विचार-विमर्श होना चाहिए, तो देश में बहुत से तबके भड़क गए। यह बहस होने लगी कि कश्मीर के मामलों में, उसके एक बहुत गंभीर और नाजुक पहलू पर इस तरह राजनीतिक आमसभा में बयान देना और विवाद छेडऩा ठीक था या नहीं था। इस पर भी बहस होने लगी कि भाजपा की यह पुरानी घोषित नीति है कि धारा 370 को खत्म करना चाहिए, और अब अगर मोदी उस पर बहस की जरूरत बता रहे हैं, तो यह भाजपा के पुराने चले आ रहे रूख में नरमी है, या गरमी है? लोगों को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि भाजपा ने अपनी घोषित नीति और रणनीति के बाद भी मोदी के विचार-विमर्श की जरूरत के इस बयान को अपने पुराने फैसले को कमजोर करने वाला क्यों नहीं माना? और लोगों को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि भाजपा की अगर खुद की घोषणा के बाद उनका प्रधानमंत्री-प्रत्याशी अगर उस घोषणा को बहस और विचार-विमर्श के लिए खोलना चाह रहा है, तो यह अच्छा है या बुरा है?
हम सिर्फ इसी एक मुद्दे की बात नहीं कर रहे, लेकिन आज हकीकत यह है कि भारत की राजनीति में नेताओं के बीच और पार्टियों के बीच कड़वाहट इतनी अधिक हो चुकी है, कि मुद्दे धरे रह जाते हैं, और उन्हें बोलने वाले मुंह हमले का शिकार होने लगते हैं। मोदी के साथ दिक्कत यह है कि मुसलमानों के लिए उनका रूख इतिहास में इतने बड़े हर्फों में दर्ज हो चुका है कि जब कभी वे मुसलमानों से जुड़ी कोई भी बात करेंगे, तो ऐसी बात के वर्तमान और भविष्य को मोदी के इतिहास से जोड़े बिना कभी नहीं देखा जाएगा। यही वजह है कि जब मोदी जम्मू की आमसभा में जाकर वहां से जुड़े हुए एक मुद्दे पर भाजपा के पुराने रूख को नर्म सा करते हुए उस पर चर्चा की बात करते हैं, बहस की बात करते हैं, तो भी सारे भाजपा विरोधी उन पर टूट पड़ते हैं। लोकतंत्र की यह नौबत ठीक नहीं है। जब लोग इंसाफपसंद न रह जाएं, तर्कसंगत न रह जाएं, जब नाजुक और जरूरी मुद्दों पर बातचीत का भी माहौल न रह जाए, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान किसी नेता या पार्टी को नहीं होता, लोकतंत्र को होता है। चाहे गांधी की हत्या हो, चाहे बाबरी मस्जिद को गिराना हो, चाहे सिक्ख विरोधी दंगे हों, चाहे गुजरात के दंगे हों, चाहे कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को निकालने का मुद्दा हो, चाहे कश्मीर की धारा 370 हो, किसी भी मुद्दे पर किसी को भी बातचीत, विचार-विमर्श, और बहस से क्यों कतराना चाहिए? जब बातचीत नहीं होती तो लोग एक-दूसरे को बाहुबल से चित्त कर देने का ही रास्ता देखते हैं। यह नौबत ठीक नहीं है।
चाहे कुछ राज्यों के चुनाव ही सामने क्यों न हों, चाहे भाजपा की अगुवाई वाली अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने धारा 370 के खिलाफ अपने 6 बरस में कुछ न किया हो, किसी भी मुद्दे पर बातचीत तो कभी भी हो सकती है। और हम जहां कुछ मामलों में किसी बात को कहने वाले मुंह को अनदेखा करके सिर्फ बात को देखने को बेहतर समझते हैं, वहीं पर कुछ दूसरी बातों को बोलने वालों से जोड़कर न देखने को भी बेहतर समझते हैं। मोदी की कही बात को लेकर मोदी पर टूट पडऩे की जरूरत इस मुद्दे पर नहीं है। कश्मीर से जुड़े हुए बहुत से मामले तो ऐसे हैं जिन पर भारत का पाकिस्तान से बात करना अभी बचा है। ऐसे में अपने देश के भीतर अगर बातचीत से भी कश्मीर की बेहतरी का रास्ता नहीं निकाला जा सकता, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान खुद कश्मीर का है। और इस बात को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा कि किस तरह कश्मीर से वहां के पंडितों को बाहर निकाला गया, और वे अपने ही देश में शरणार्थी बनकर पड़े हुए हैं। ऐसे 70 हजार परिवार आज अगर अपनी जमीन पर लौट नहीं पा रहे हैं, तो फिर इस देश की सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रदेश की सरकार दोनों को अपनी इस कमजोरी के बारे में सोचना चाहिए। यह बात हमको अधिक अहमियत वाली आज इसलिए भी लग रही है कि चार दिन पहले ही इन 70 हजार परिवारों के लिए 20-20 लाख रूपए मुआवजे की घोषणा हुई है। उनको घर छोड़े 25 बरस होने को हैं, और कश्मीर से जुड़ी बातें इनसे भी जुड़ी हुई ही रहेंगी। दूसरी तरफ कश्मीर में गरीबी और फटेहाली का बुरा हाल है, जबकि उस राज्य की संभावनाएं असीमित हैं। इसलिए मोदी की कही किसी बात को सिर्फ चुनावी नारा कहना ठीक नहीं है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मतदान के पहले यह बात नहीं कही है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के दौरे पर जाकर यह बात कही है, तो उसे प्रसंगहीन मानना ठीक नहीं है। कश्मीर से जुड़े हुए सारे नाजुक मामलों पर देश, और उस प्रदेश, साथ-साथ सभी संप्रदायों के व्यापक हित को देखते हुए जरूरी बात होनी ही चाहिए। ऐसी बात न होने का नुकसान कश्मीर की आम जनता भुगत रही है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें