8 दिसंबर 2013
संपादकीय
देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से उत्तर-पूर्व के मिजोरम को छोड़कर बाकी चार के नतीजे अभी आ रहे हैं, और छत्तीसगढ़ सहित बाकी तीनों राज्यों में भी भाजपा की सरकार साफ दिख रही हंै। मिजोरम में मतगणना कल होने वाली है, क्योंकि वहां शायद इतवार को पूरा प्रदेश छुट्टी मनाता है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सरकार की तगड़ी वापिसी हो रही है, और इस तीसरी पारी में वहां भाजपा के वोट, भाजपा की सीटें सब कुछ बढ़ते दिख रहे हैं। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को एकदम जड़ से उखाड़कर फेंककर भाजपा वहां सत्ता पर आ चुकी है, और कांग्रेस की हार वहां पर देखने लायक है। तीसरा राज्य है दिल्ली जहां पर शीला दीक्षित की अगुवाई में कांग्रेस ने तीन कार्यकाल पूरे किए थे, लेकिन इस बार कांग्रेस विरोधी वोटों के आप पार्टी में जाने के बाद भी भाजपा वहां अपने खुद के दम पर बहुमत के करीब पहुंच चुकी है। छत्तीसगढ़ में ऐसी कांटे की टक्कर सीटों के रूझान में दिख रही थी, कि यहां दोपहर तक कहना फिलहाल थोड़ा मुश्किल लग रहा था, लेकिन अभी शाम 4 बजे उतार-चढ़ाव का हिसाब निकालें, तो भाजपा की सरकार तीसरी बार बनते दिख रही है।
छत्तीसगढ़ को छोड़कर हम बाकी तीन राज्यों पर अगर एक नजर डालें तो जो एक बात उभरकर आती है, वह है कांग्रेस के खिलाफ जनता का तगड़ा वोट है। इन तीन में से दो राज्य कांग्रेस के हाथ से पूरी तरह और बुरी तरह निकल गए हैं। जिन लोगों को दिल्ली में भाजपा की जीत का आंकड़ा कम लगता है, उन लोगों को यह देखना चाहिए कि यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ सबसे ऊंचा झंडा लेकर चल रहे, सबसे अधिक जोरों का नारा लगा रहे अरविंद केजरीवाल कांग्रेस से नाराज वोटों को भाजपा की तरफ जाने से रोकते हुए खुद ले गए। अब अगर कांग्रेस विरोधी वोटों का यह बंटवारा नहीं होता, तो भाजपा की जीत और बहुत बड़ी होती, और कांग्रेस की हार और बहुत बड़ी दिखती। राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा एकदम आमने-सामने रहे, इसलिए वहां पर कांग्रेस की शिकस्त अधिक साफ दिख रही है।
इन चुनावों को बहुत से लोग 2014 के लोकसभा संसदीय चुनाव के पहले का सेमीफाइनल मानकर चल रहे थे, लेकिन मतदान के पहले के जो ओपीनियन पोल सामने आए थे उनके रूझान को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने इन चुनावों को राष्ट्रीय स्तर के किसी महत्व का मानने से इंकार कर दिया था, और इस तरह उसने अपने राष्ट्रीय नेताओं को किसी शर्मिंदगी से दूर रखने की बचाव-तैयारी पहले ही कर ली थी। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही अपने प्रधानमंत्री-प्रत्याशियों को इन चुनावों में झोंका था, उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थीं।
अब तक मिले नतीजों के मुताबिक दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस के हाथ से सरकारें जा चुकी हैं, लेकिन भाजपा की सरकार का तीसरा कार्यकाल मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की अगुवाई में जितने बड़े दम-खम के साथ आ चुका है, उससे एक बात साफ होती है कि इन सभी चारों राज्यों में जनता ने सत्ता के खिलाफ एकमुश्त वोट नहीं दिया है, और मध्यप्रदेश में दो पारियों के बाद भी भाजपा की सीटें बढ़ी हैं, और वोट बढ़ गए हैं। सरकारें अगर गई हैं तो कांग्रेस की दिल्ली और राजस्थान की सरकारें गई हैं, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापिसी हो रही है, तीसरी बार इस पार्टी की सरकारें बनने जा रही हैं।
कांग्रेस को यह सुझाने के लिए हमारी जरूरत नहीं है कि इन नतीजों को उसे लेकर बैठना चाहिए, और पूरे देश के बारे में, अपनी पार्टी के बारे में, अपनी सरकारों के बारे में ईमानदारी और कड़ाई से आत्ममंथन करना चाहिए। इसी पल हम यह भी सुझाना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा, इन दोनों को ही इसी के टक्कर का आत्ममंथन करना होगा कि दस बरस सत्ता या विपक्ष में रहने के बाद आज उनकी नौबत ऐसी टक्कर की क्यों है? क्यों भारतीय जनता पार्टी इससे बेहतर नहीं कर सकती थी, जबकि उसके मुख्यमंत्री अपनी सरकार के साथ इतनी सीटों से बेहतर प्रदर्शन के लायक काम करते दिख रहे थे। और कांग्रेस को भी यह सोचना चाहिए कि भाजपा के इतने मंत्रियों और विधायकों की बदहाली के बावजूद कांग्रेस उसका फायदा क्यों नहीं उठा सकी।
नतीजे अभी चढ़-उतर रहे हैं, इसलिए इस बारे में और अधिक कुछ कहना ठीक नहीं है, लेकिन आखिरी में एक नजर में तस्वीर यह बनती है कि इन चारों प्रमुख राज्यों में कांग्रेस का दीवाला सा निकला दिख रहा है, और भाजपा में दो राज्य तो उससे छीन लिए हैं, दो राज्यों में वह अपनी सरकार कायम रखने में कामयाब दिख रही है। तो कांग्रेस को रायपुर से लेकर भोपाल तक, और जयपुर से लेकर दिल्ली तक आत्ममंथन की जरूरत है।

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