बेकसूरों और बेबसों की कब्र की मिट्टी, साजिश का बारूद नहीं है

27 दिसंबर 2013
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगों के शिकार अल्पसंख्यक मुस्लिम  लोगों को राहत शिविर में लगातार मरते देखते हुए यह देश चल रहा है। बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े कारखानेदार, बड़े-बड़े अफसर अपने रोज के काम में लगे हुए हैं। दंगों के बाद के इन दसियों हजार लोगों की यह बदहाली, और मौत, देश की सबसे बड़ी अदालत की निगरानी में, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की मिलीजुली जिम्मेदारी के तहत, देश के दो संभावित प्रधानमंत्रियों, राहुल गांधी और मुलायम सिंह यादव के बावजूद चल रही है। ठंड से लोग मर रहे हैं और वहां के अफसर एक जुर्म की तरह का बयान दे रहे हैं कि ठंड से मौत नहीं होती। इसके पहले मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वहां कोई दंगा प्रभावित नहीं है, और जो लोग वहां टिके हुए हैं वो कांग्रेस और भाजपा के षडय़ंत्रकारी हैं जो कि उत्तरप्रदेश की सपा सरकार को बदनाम करने की साजिश में हिस्सेदार हैं। और अब वहां से खबरें आ रही हैं कि पुलिस जबर्दस्ती लोगों को राहत शिविरों से घर भेज रही है, कहीं किसी कब्रिस्तान में तंबू लगाकर रह रहे लोगों के खिलाफ अवैध कब्जे का केस दर्ज किया जा रहा है। 
ऐसा देश चल रहा है, ऐसा लोकतंत्र चल रहा है, और जो लोग इन राहत शिविरों में दफन हो रहे हैं, वे तकरीबन बेनाम हैं, बेचेहरा हैं, और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के लिए चुनाव के पहले तक वे शायद बेमतलब भी हैं। यह देश एक भयानक लोकतंत्र हो गया है, जहां पर मुलायम सिंह यादव अपने बेटे के हाथ एक खिलौने की तरह देश का सबसे बड़ा प्रदेश देकर इसे लोहिया का समाजवाद, और इसे धर्मनिरपेक्षता भी साबित कर रहे हैं। दूसरी तरफ अपने गांव में वे अंतरराष्ट्रीय स्पोटर््स कॉम्पलेक्स बनवा रहे हैं, और उसमें देर होने पर एक अफसर को निलंबित करवा रहे हैं। दूसरी तरफ उनका एक दूसरा अफसर ठंड से मौतों को नामुमकिन बता रहा है। यह बहुत अजीब सा देश है, और यह बहुत अजीब सा उत्तरप्रदेश भी है जहां पर लोग इस तरह के काम करके, इस तरह की बातें करके, चुन भी लिए जाते हैं, और बाकी हिन्दुस्तान के भी प्रधानमंत्री बनने के काबिल अपने को मानते हैं, बताते हैं, और मनवाते हैं। 
कई बार हमको लगता है कि सरकार और संसद के साथ-साथ देश की अदालतें भी एक सीमा से अधिक लोकतंत्र की बदहाली को रोक नहीं पा रही हैं। ठंड में दर्जनों बच्चों की मौत दंगा राहत शिविरों में हो चुकी है, और इस उत्तरप्रदेश की अनगिनत इमारतों में इनके लिए जगह भी नहीं है। यह किस तरह का लोकतंत्र है जहां पर अखबारों में कुछ खबरों, और कुछ बयानों से परे राहत शिविरों की ऐसी मौतों को रोकने के लिए और कुछ भी नहीं हो सकता। इस लोकतंत्र को हांकने वाले लालबत्ती ताकतें अगर इन मौतों को नहीं रोक सकतीं, तो वे लालबत्तियां भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक ताकत का प्रतीक नहीं हैं, वे इस लोकतंत्र की देह और आत्मा को बेचने वाले पेशे का प्रतीक हैं। आजादी के बाद पौन सदी होने को है, लेकिन इस मुल्क में अलग-अलग तबके हैं, उनके अलग-अलग हक हैं, और इन फासलों के बीच खाई सी गहराई है। एक बार भी यह लगता है कि बाकी देश में जहां-जहां सत्ता ने इस तरह का हाल करके रखा है, वहां-वहां जिम्मेदार लोगों के मुंह पर झाड़ू पडऩी चाहिए, और एक ऐसी सरकार आनी चाहिए जो कि हो सकता है कि तस्वीर बदलने की एक कोशिश करें, हो सकता है कि उसे ठंड से मरते हुए बच्चे षडय़ंत्रकारी न लगें। हम चाहते हैं कि एक-एक बार ऐसे तमाम बददिमाग नेताओं की पार्टियों को, ऐसे अफसरों को झाड़ू से बुहारकर घूरे पर डाला जाए। पिछले चार-छह दिनों को अगर देखें तो मुलायम सिंह यादव और उनके अफसर झाड़ू से सम्मानित करने के सबसे बड़े हकदार लग रहे हैं। जिन सत्तारूढ़ लोगों को बेकसूर और बेजुबान, सरकारी नालायकी और साम्प्रदायिकता के शिकार लोगों की कब्र की मिट्टी साजिश का बारूद लगती है, उनके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

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