तेज रफ्तार जिंदगी के खतरे बांधने वाली खबरों से लेकर दौड़कर आने वाले खाने तक

संपादकीय
13 मार्च 2014

छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मोर्चे पर 15 लोगों की शहादत के बाद जब देश के टीवी चैनलों पर इस खबर को बहुत कम जगह देकर नेताओं की बकवास को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा था तो इंटरनेट पर बहुत से अखबारनवीसों सहित दूसरे लोगों ने इसके बारे में लिखा, इसकी आलोचना की, और पूछा कि देश के लिए जान देने वाले लोगों के साथ मीडिया का यह कैसा बर्ताव है? 
बात सिर्फ टीवी चैनलों की नहीं है, अखबारों की भी है, और दर्शकों-पाठकों को यह समझने की जरूरत है कि जिंदगी के असल मुद्दों को छोड़कर गैरजरूरी बातों को खबर बनाकर दिखाने और छापने वाले मीडिया के लिए उनका क्या रूख रहता है? वैसे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद अब खबरों और मनोरंजन के बीच का फासला खत्म कर दिया गया है, और टीवी समाचार बुलेटिन बहुत कम खबरों के साथ लोगों का बहुत सारा वक्त, उनका बहुत सारा ध्यान खा जाते हैं। ऐसे में बाजार के इश्तहार भी ऐसे ही चैनलों को, या ऐसे ही प्रिंट मीडिया को अधिक मिलते हैं जो तकलीफदेह असल मुद्दों के बजाय, सतही, चटपटे, और सनसनीखेज मुद्दों को अधिक उठाते हैं। इसलिए आज दर्शक-पाठक से लेकर विज्ञापनदाता तक, और मीडिया में फैसले लेने वाले लोगों तक, कड़वे मुद्दों को कम उठाने, सुनने-देखने, या पढऩे का चलन बढ़ गया है। ऐसे में भारत के लोगों की सामाजिक समझ कम होने लगी हैं, उनकी जिम्मेदारी गायब होने लगी है, और राजनीतिक चुनाव भी मुद्दों से परे, सोच से दूर, व्यक्तियों पर केन्द्रित होने लगे हैं। 
इस चर्चा से हमको बहुत अधिक असर की उम्मीद नहीं है। लोगों का स्वाद इतना बिगड़ चुका है कि उनके दिल-दिमाग के लिए सेहतमंद चीजों को परोसने का काम मीडिया के कारोबार के लिए घाटे का हो चुका है। और यह सिलसिला बढ़ते भी चल रहा है। लोगों की पसंद को बिगाड़ो, और फिर उन्हें बिगड़ी पसंद के मनमाफिक और परोसो, और फिर यह सिलसिला चलते चले जा रहा है। लेकिन बात सिर्फ मीडिया की क्यों की जाए? यह गिरावट समाज के बाकी तबकों में भी आई है, और लोगों की जिंदगी से बहुत से दायरों में जिम्मेदारी घटती चली गई है, और कहीं पर लुभावनी, कहीं पर भ्रष्ट, और कहीं पर तात्कालिक फायदे की जिंदगी लोग अपनाते जा रहे हैं। लोग रोज की कसरत के बजाय जिंदगी के आखिर में जाकर जिस तरह वजन कम कराने की सर्जरी करवा रहे हैं, दवाइयों के सहारे सेहत को ठीक रख रहे हैं, दिल का ऑपरेशन करवा रहे हैं, लेकिन जिंदगी के ढर्रे को सेहतमंद नहीं बना रहे। उसी तरह का रवैया जिंदगी के बाकी पहलुओं के लिए भी हो गया है। 
लोग एक वक्त चूल्हे पर धीरे-धीरे पका हुआ खाना बेहतर समझते थे, अब तेज रफ्तार से पका हुआ, अधिक नुकसान करने वाला फास्टफूड, तेज रफ्तार से मोटरसाइकिल पर चलकर आधे घंटे के भीतर घर पर पहुंच जाता है, और ऐसे खाने और ऐसी रफ्तार के नुकसान से निपटने के लिए जिंदगी के आखिर में जाकर बड़ी-बड़ी अस्पतालों का सहारा भी है। ऐसा ही हाल तेज रफ्तार खबरों का हो गया है, उन खबरों में लोगों का ध्यान खींचने, और उन्हें बांधे रखने की बेबसी, जिंदगी के असल मुद्दों को उसी तरह धकेलकर दूर कर दे रही है, जिस तरह सेहतमंद सब्जियों को दूर करके बाजार से आया हुआ फास्टफूड काबिज हो गया है। 

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