अरविंद केजरीवाल रात-दिन अपनी ही कब्र खोद रहे हैं..

14 मार्च 2014
संपादकीय
कुछ महीने पहले भी हमने अरविंद केजरीवाल की नाजायज बयानबाजी को लेकर, और उनके बेसिर-पैर के तौर-तरीकों को लेकर कई बार यहां पर लिखा था, और लिखते-लिखते हम खुद ही थक गए थे, क्योंकि उनके अलोकतांत्रिक बयान और वैसे ही रूख की खबरें रोजाना आती थीं। अभी फिर वे उसी तरह की हरकतों पर उतरे हुए हैं, और भारत के चुनावी लोकतंत्र उनसे जो संभावनाएं बंधी थीं, ये सारी की सारी खत्म होते दिख रही हैं। ऐसा लगता है कि सामने कुछ श्रोता, कुछ कैमरे, और कुछ माईक देखते ही वे आपा खो दे रहे हैं, और उटपटांग बातें करने लगे हैं। 
कल टीवी की खबरों में उन्हीं की आवाज में, उन्हीं की रिकॉर्डिंग जो हमको सुनने मिली, उसके मुताबिक उन्होंने देश के मीडिया को बिका हुआ कहा, और कहा कि यह बहुत बड़ी साजिश है, उनकी सरकार बनती है तो इसकी जांच होगी। मीडिया वालों के साथ सभी दोषियों को जेल भेजेंगे। केजरीवाल ने कहा कि पिछले एक साल में आपलोगों के दिमाग में मोदी...मोदी....मोदी भर दिया गया है। कुछ चैनल वाले कह रहे हैं कि करप्शन खत्म हो गया है। राम राज्य आ गया है। गुजरात में ये हुआ...वो हुआ। जानते हैं क्यों? पैसे दिए गए हैं। टीवी चैनलों को मोदी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए पैसे मिले हैं। पिछले 10 साल में गुजरात में 800 किसानों ने आत्महत्या कर ली। ये कोई नहीं बताएगा। अडाणी को एक रुपये में जमीन दे दी गई। ये किसी चैनल ने नहीं दिखाया। अरविंद ने सिक्योरिटी ले ली है। उसने सिक्योरिटी नहीं ली है। जेड सिक्योरिटी ले ली... वाई सिक्योरिटी ले ली। अरे, भाड़ में गई तेरी सिक्योरिटी। मोदी के बारे में कोई सच नहीं बताएंगे।
दरअसल पहले दिन से ही अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों का यह रूख रहा है कि भारतीय लोकतंत्र में वे ही अकेले ईमानदार हैं, और बाकी तमाम लोग बेईमान हैं। बाकी लोगों में भी उन्होंने सारी-सारी पार्टियों को, सभी बड़े नेताओं को, और पूरे के पूरे मीडिया को भ्रष्ट, बेईमान, और बिका हुआ कहना जारी रखा। यह सिलसिला वे लोकसभा चुनाव तक जारी रखेंगे, और यही उनके लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। देश की जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि हर तबके में कुछ अच्छे लोग हैं, और कुछ खराब लोग हैं, यही हाल मीडिया का भी है। आज जो अरविंद केजरीवाल पूरे देश के मीडिया पर एकमुश्त तोहमत लगा रहे हैं, वे इस बात को भूल रहे हैं कि उनको खुद को देश की बाकी राजनीति मीडिया की उपज कहती है। लोग यह मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल को जीरो से हीरो बनाने का काम मीडिया ने ही किया था। और उसी मीडिया की पीठ पर मुफ्त की सवारी करते हुए वे दिल्ली के मुख्यमंत्री के दफ्तर तक पहुंचे थे, यह एक अलग बात है कि उनकी राजनीति और उनका मिजाज किसी काम को करने में भरोसा नहीं रखते, किसी भी काम का विरोध करने में भरोसा रखते हैं। 
हम इस बात से इंकार नहीं करते कि मीडिया का कुछ हिस्सा बेईमान हो सकता है, होगा, और बड़े नेताओं, बड़ी पार्टियों के असर में आकर खबरों में ऊंच-नीच करता होगा, लेकिन इससे परे भी ईमानदार हिस्से की मीडिया में कोई कमी नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि संसद में भी ईमानदार हैं, जजों में भी ईमानदार हैं, और अपनी खुद की नौकरी वाले जिस आयकर विभाग को केजरीवाल बार-बार भ्रष्ट साबित करते हैं, उस आयकर विभाग में भी ईमानदार लोग रहते हैं, हैं। हमारी केजरीवाल के साथ आपत्ति यही है कि वे बिना किसी बुनियाद के, बिना किसी सुबूत के, किसी को भी संदेह का लाभ दिए बिना, पूरे-पूरे तबके को एकमुश्त बेईमान करार देते हैं, और अपने आपको, अपनी पार्टी और अपने साथियों को ईमानदारी का अकेला ठेकेदार बताते हैं। उनकी सारी बातें लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत न्याय पाने के हक से दूर रखने वाली रहती हैं, और वे मानों नक्सलियों की तरह सड़क पर अपनी मर्जी का फैसला करके, अपने शक के आधार पर किसी का भी गला रेतने में लगे रहते हैं। यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है, और केजरीवाल रात-दिन अपने इन तौर-तरीकों से अपनी ही कब्र खोद रहे हैं। 

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