शिकायत मिलने पर ही सरकार कार्रवाई करे, ऐसा ठीक नहीं...

03 मार्च 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के अखबारों में रोज बहुत सी ऐसी खबरें छपती हैं जिनके बारे में अफसरों से उनका पक्ष जानने पर संवाददाता को जवाब मिलता है कि उनके पास शिकायत आएगी, तो वे कार्रवाई करेंगे। कुछ अखबार स्टिंग ऑपरेशनों के अंदाज में अफसरों से सवाल-जवाब रिकॉर्ड भी करते हैं, और उसे ज्यों का त्यों छाप भी देते हैं।  सरकार के सामने ऐसी खबरों से अपने खुद के इंतजाम को परखने, और उसे सुधारने का एक मौका जुटता है, और बहुत से अफसर खबरों को लेकर अपने विभाग की, अपने मातहत लोगों की गलतियों, या उनके गलत कामों की जांच भी करते हैं, और कार्रवाई भी करते हैं। 
लेकिन जो लोग जनता से जुड़ी हुई कुर्सियों पर बैठे हैं, उनके जवाब की यह बात हमारी समझ से परे रहती है कि उनके पास कोई शिकायत आएगी, तो वे उस पर कार्रवाई करेंगे। हमारी सामान्य समझबूझ यह कहती है कि जब कोई अखबारनवीस किसी अफसर से किसी गड़बड़ी के बारे में पूछताछ करते हैं, तो उस अफसर को पहली खबर तो मिल ही जाती है। और सरकारी कामकाज ऐसी खबर मिलने के बाद किसी भी अफसर या कर्मचारी को खुद होकर ही यह परखना चाहिए कि यह खबर सही है या नहीं, और अगर गलती या गलत काम की खबर या सूचना सही है, तो उस पर कार्रवाई करना उनकी जिम्मेदारी भी बन जाती है। सरकार के किसी भी ओहदे पर बैठे हुए लोगों को उनके अधिकार क्षेत्र, या उनकी जिम्मेदारी के दायरे की गड़बड़ी पता लगने पर उनको खुद होकर उस पर कार्रवाई करनी चाहिए। इसलिए अखबारी खबरों में यह सरकारी पक्ष बड़ा अटपटा लगता है कि कोई शिकायत मिलेगी तो उस पर कार्रवाई की जाएगी।
सरकार के काम को लेकर हमारा यह मानना है कि जिस तरह के कानून बनाकर सरकार पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि वह जनता की मांगी गई सूचना दे। उसी तरह सरकार को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐसी जानकारी को खुद होकर परख लेना चाहिए, और उसके खरे उतरने पर उसे ही शिकायत मान लेना चाहिए। भारत में अदालतें भी खुद होकर बहुत सी खबरों को जनहित याचिका मान लेती हैं, और उन पर कार्रवाई शुरू कर देती हैं। छत्तीसगढ़ में नए मुख्य सचिव ने लोकसेवा गारंटी अधिनियम को प्राथमिकता के साथ लागू करने, उस पर अमल बढ़ाने, और उसे कामयाब करने की बात कही है। लोकसेवा के तहत हमारे हिसाब से यह बात भी आती है कि खबरों में, शिकायतों में, जिस तरह से भी सरकार के पास जानकारी पहुंचती है, उस पर कार्रवाई लोकसेवा का एक हिस्सा ही है। 
दरअसल संविधान के तहत कुछ कानून बनाए जाते हैं, और कुछ बातों को मान लिया जाता है कि संविधान की भावना के तहत वे लागू हैं। मिसाल के तौर पर हम सूचना के अधिकार की बात करें, तो दरअसल जनता के लिए तो यह अधिकार है, लेकिन दूसरी तरफ सरकार के लिए यह एक जिम्मेदारी है। आज तो जनता सूचना मांगती है, तब चाहे-अनचाहे सरकार उसे उपलब्ध कराती है। लेकिन सूचना के अधिकार कानून की भावना यह है कि सरकार खुद होकर सूचना जनता के सामने रखे, और उसे मांगने की नौबत ही न आए। देश और प्रदेशों की सरकारों में से बहुत सी ऐसी हैं जो कि कुछ या अधिक दूरी तक अपनी इस जिम्मेदारी को खुद होकर लागू कर चुकी हैं, और लगातार इंटरनेट पर अधिक से अधिक जानकारी डालना शुरू कर चुकी हैं। इससे जनता का मांगने का बोझ कम हो जाता है, और सरकार में पारदर्शिता बढ़ जाती है। 
छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश में आज जरूरत यह है कि सरकारें बहुत सी बातों का खुद होकर नोटिस लें, और उस पर जरूरत के मुताबिक कार्रवाई करें। मीडिया ऐसे में मुफ्त की एक खबरी एजेंसी हो जाती है, जिससे कि सरकार को उसकी अपनी खामियां या कमियां पता लगती हैं। विपक्ष और जनसंगठन भी इसी तरह सरकार के काम आ सकते हैं, और पहली नजर में वे आलोचक लग सकते हैं, लेकिन अगर सरकार जिम्मेदार रहती हैं, तो वे उन सूचनाओं को अपने खुद के लिए सुधार का एक साधन मान सकती हैं, और उसी तरह उससे फायदा पा सकती हैं। जिस बात से हमने शुरू किया है, उसी पर खत्म करें, तो हम अफसरों की ऐसी प्रतिक्रिया को ठीक नहीं मानते, कि कोई शिकायत आएगी तो उस पर कार्रवाई होगी। कार्रवाई तो पहली सूचना पर भी हो सकती है, कम से कम जांचने-परखने की कार्रवाई तो हो ही सकती है। मुफ्त में सूचना क्या बुरी हो सकती है?

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