ताकतवर लोगों के मुकदमे देखें तो लोकतंत्र बोगस लगता है...

27 मार्च 2014
संपादकीय
भारतीय क्रिकेट को नियंत्रित करने वाली संस्था बीसीसीआई खबरों में हैं, और दुनिया के सबसे व्यस्त और बोझ से लदे हुए भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के भीतर भी हैं। दुनिया के कुख्यात मुजरिमों के साथ मिलकर भारत में क्रिकेट मैचों को फिक्स करने, और सट्टेबाजी का धंधा करने में देश के बड़े-बड़े दिग्गज और क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी पकड़ाए जा चुके हैं, और यह पूरी तरह उजागर हो चुका है कि खेल के नाम पर जुर्म का यह धंधा बीसीसीआई जैसी संस्था के मातहत चल रहा है, और इसके मुखिया का दामाद इसमें पकड़ा जा चुका है। इससे परे भी देखें तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के बड़े पदाधिकारियों में कांग्रेस, भाजपा और एनसीपी, जैसी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता शामिल हैं, और शायद यही वजह है कि किसी राजनीतिक मंच पर क्रिकेट के नाम पर चल रहा यह जुर्म जूते नहीं खाता। अब जाकर सुप्रीम कोर्ट की दखल इस मामले में हुई है, वरना बीसीसीआई अपने आपको भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक आजाद टापू की तरह बताता है, और अपने पर सूचना का अधिकार भी लागू नहीं होने देता है। 
आज हम न चाहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए एक दूसरे मामले को देखते हैं जिसमें दुनिया के इतिहास की सबसे महंगी जमानत-शर्त सुब्रत राय सहारा पर लगाई गई है। पिछले दो बरसों में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अपनी जुबानी अपनी बेबसी जाहिर की है कि सहारा कंपनी के मालिक सुब्रत राय अदालत की एक नहीं सुन रहे हैं, अदालत का अपमान कर रहे हैं। अब सहारा और बीसीसीआई इन दोनों को देखें, तो सरकार से लेकर संसद तक, और सेबी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, किसी का भी कोई बस जब इन पर चलते नहीं दिखता है तो यह साफ होता है कि देश का जो कानून गरीबों के लिए है, उस कानून का कोई असर सबसे अमीर तबके पर नहीं है। इन्हीं के टक्कर का एक दूसरा मामला विजय माल्या का है, जिसने कि अपनी किंगफिशर एयरलाईंस के कर्मचारियों को बरसों से तनख्वाह नहीं दी है, और जो अपनी शान-शौकत की अश्लील और हिंसक फिजूलखर्ची के साथ खबरों में बना हुआ है, और उस पर देश का कोई मजदूर कानून मानो लागू ही नहीं होता है। 
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि अमीरों के साथ, बड़े ओहदों पर बैठे हुए ताकतवर लोगों के साथ लड़ाई लडऩा उनके मुकाबिले कमजोर लोगों की ताकत के बाहर है। इन मामलों से यह साफ होता है कि ऐसे लोगों के साथ लड़ाई लडऩा एक किस्म से सुप्रीम कोर्ट की ताकत से भी कुछ हद तक बाहर ही है। सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई के अध्यक्ष श्रीनिवासन को सीधे हटाने के बजाय जब इस्तीफा देने का वक्त और मौका देता है, जब वह सुब्रत राय सहारा को बरसों तक मौका देता है, तो लोगों को यह लगता है कि क्या आम लोगों के मामलों में भी, देश की सबसे निचली अदालतें भी इस तरह की कोई रियायत कभी दिखाती हैं? एक तरफ संजय दत्त जैसे ताकतवर और रईस को लगातार एक के बाद एक पैरोल मिलते चलती है, तो दूसरी ओर उसी के साथ गिरफ्तार, और उसी की तरह की सजा पाए हुए मरणासन्न लोग जेल में बिना पैरोल पड़े हुए हैं। हमने उस वक्त भी लिखा था कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल आरोपों में गिरफ्तार, विचाराधीन कैदी, जिसे कि सजा भी नहीं हुई थी, उस सोनी सोढ़ी को अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए भी जेल से बाहर आने को जमानत नहीं मिली थी। और दूसरी तरफ संजय दत्त जैसे लोग सजा पाने के बाद भी लगातार पैरोल पर महीनों तक बाहर रहते हैं। 
ऐसा लोकतंत्र गरीबों के नजरिए से, कमजोर लोगों के नजरिए से, एक बिल्कुल बोगस बात रह गया है। ऐसा लोकतंत्र सिर्फ अमीरों की सेवा-खातिरी करता है, और मौका मिलते ही गरीबों पर उसी तरह टूट पड़ता है, जिस तरह सड़क पर किसी गरीब पर खफा होने पर पुलिस की लाठियां टूट पड़ती हैं। ऐसा लोकतंत्र देख रहा है कि पैसों का नंगा नाच इस देश में धड़ल्ले से चलता है, और उसके साथ-साथ चलते हुए जुर्म पर काबू पाने में सुप्रीम कोर्ट को किस तरह बरसों लग जाते हैं। 

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