02 मार्च 2014
संपादकीय
इस वक्त जब हम दोपहर को यहां लिख रहे हैं, तो देश भर में बहुत से लोग विचलित दिख रहे हैं। फिल्म अभिनेता आमिर खान का पेश किया हुआ टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते देश में बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं पर केन्द्रित था, इतवार की सुबह प्रसारित हुआ, और लोगों को शायद हिला गया है, ऐसा ट्विटर और दूसरी सोशल वेबसाईटों पर दिखाई पड़ रहा है। किसी भी फिल्म या टीवी कार्यक्रम के शुरू होने के वक्त उसे लेकर तरह-तरह की खबरें बनती हैं, ताकि उनको देख-पढ़कर दर्शक अधिक जुटें, इसलिए आमिर खान को देश की तकलीफ दिखाने के लिए हर एपिसोड में कितने करोड़ मिल रहे हैं, जैसी खबरें आ रही हैं। लेकिन हम दर्द की बिक्री को गलत नहीं मानते, क्योंकि आमिर खान का अपना पेशा है, और उनके बहुत पहले से सत्यजीत रे जैसे फिल्म निर्देशक भी अकाल पर फिल्में बनाते आए हैं, और कम या अधिक, कुछ तो कमाई उन्होंने भी पाई होगी।
आज यहां लिखने का मकसद दूसरा है, और वह यह कि जिंदगी की हकीकत को जानने, समझने, और मानने के लिए भी जिस तरह फिल्मी सितारों की जरूरत लोगों को पड़ रही है, उससे यह जाहिर है कि हिन्दुस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आसपास की जिंदगी की तकलीफों से अनजान बने रहता है। रोज बलात्कार जैसी हिंसा और जुर्म की खबरें छपती हैं, लेकिन लोग समाज की ऐसी खामी को लेकर अपने आपकी कोई भूमिका नहीं देखते, कि उनको ऐसी खामी को रोकने के लिए कुछ करना चाहिए। इसलिए जब किसी एक टीवी कार्यक्रम, या फिल्म को लेकर लोग विचलित होते हैं, तो उनकी नीयत पर शक किए बिना हमको ऐसा लगता है कि वह श्मशान-वैराग्य जैसी भावना है, जो कि कुछ घंटे या एक-दो दिन रहती है, और फिर बलात्कार को रोकने का जिम्मा सरकार या आमिर खान का मानकर उस भावना का बुलबुला बैठ जाता है।
दरअसल हिन्दुस्तान में लोगों के बीच सामाजिक चेतना, और सामूहिक जिम्मेदारी खत्म होते-होते अब वह सिर्फ अपने परिवार और अपनी आत्मरक्षा तक जाकर टिक गई हैं। दूसरों के लिए अपने आपको झोंक देने की बात लोगों को किसी और के किए हुए देखना ठीक लगता है। जिस तरह कुछ लोग क्रिकेट को सिर्फ टीवी पर देखकर अपने आपको खेल से जुड़ा हुआ मान लेते हैं, उसी तरह लोग पर्दे पर दिखती हमदर्दी को देखकर, कुछ देर को विचलित होकर, उसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी मान लेते हैं। सच तो यह है कि यह नौबत विचलित न होने से भी अधिक खराब इसलिए है क्योंकि विचलित होने पर लोगों के मन से अपनी जिम्मेदारी को लेकर आत्मग्लानि भी खत्म हो जाती है, कि वे तो बहुत विचलित हुए थे, उन्हें बहुत खराब लगा था, वे सो नहीं पाए थे, और रोना रोक नहीं पाए थे। आत्मग्लानि से, अपनी जिम्मेदारी से, इस तरह का छुटकारा पा लेना कम खतरनाक बात नहीं है।
हिन्दुस्तान में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनको लेकर असल कोशिश के बजाय पाखंड से काम चला लिया जाता है जो कि सस्ता भी पड़ता है। बहुत से लोग धर्म-कर्म, दान-पुण्य जैसी बातों पर भरोसा करते हैं, और रात-दिन अपने किए जाते गलत काम को किसी धर्मस्थान पर जाकर धो लेते हैं, कुछ गरीबों को खाना खिलाकर, गाय या कुत्ते को रोटी डालकर यह मान लेते हैं कि उनका गलत किया हुआ, इससे सही हो गया। कुछ लोग कहीं प्याऊ खोल लेते हैं, तो कहीं किसी को बैसाखियां खरीद देते हैं, और इससे उनकी आत्मा पूरी तरह धुलकर फिर से गलत करने के लिए एकदम फिट-फाट, तैयार हो जाती हैं। होता यह है कि किसी भी तरह की आस्था लोगों को असल जिम्मेदारी से बचने की राह हासिल करा देती है। धर्म हो, या आध्यात्म, इन पर जिनका भरोसा रहता है, उनका भरोसा अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पर कम ही रहता है।
ऐसे देश में एक टीवी कार्यक्रम से अगर लोगों को कुछ देर के लिए विचलित होने का मौका मिल रहा है, या वे सचमुच विचलित हो रहे हैं, तो ऐसे माहौल के बीच ऐसे मुद्दों पर एक ठोस बहस की जरूरत है, जागरूकता के अभियान की जरूरत है, जनता के बीच से आंदोलन उठने की जरूरत है, वरना तो फिर श्मशान-वैराग्य की सहूलियत हासिल है ही।

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