औरतों की बदहाली, और नवरात्रि

संपादकीय
31 मार्च 2014

देश में आंध्र प्रदेश, मणिपुर, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में नए साल की शुरुआत के साथ ही चैत्री नवरात्रि का पर्व आज से शुरू हो रहा है। देवी के शक्ति स्वरूप की पूजा के लिए तरह-तरह के अनुष्ठान करके देश का एक बड़ा वर्ग इन नौ दिनों में अपने-अपने परिवार के लिए सुख-सफलता, स्वास्थ्य, और तरह-तरह की कामना करता है। रात-रात भर जागकर देवी की मूर्ति, तस्वीरों के आगे भजन, दिन-दिन भर पूजा का यह सिलसिला 8 वें या 9 वें दिन कुमारी कन्याओं को भोजन करवाकर, उन्हें दक्षिणा देकर, उनका सम्मान कर के पूरा होता है। पर त्यौहार की यह भावना यह भक्ति रोजमर्रा के जीवन में उतरती शायद नहीं दिखती। देश में औरतों की हालत पर गौर करें, तो लगता है कि क्या साल में दो बार इस तरह देवी के रंग में रंगने का कोई असर हम पर पड़ता है?
अभी दो दिन भी नहीं हुए, दिल्ली में फिर एक बार एक महिला से सामूहिक बलात्कार, और दो से छेड़छाड़ की खबर आई। सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को बीरभूम सामूहिक बलात्कार पर उसके रवैये के लिए फटकारा। मजलूम अकेली लड़कियों के बलात्कार की ही बात नहीं है- बॉलिवुड की सबसे कामयाब अभिनेत्रियों में शुमार होती कैटरीना कैफ ने कहा कि वक्त के साथ बॉलीवुड फिल्मों में बहुत कुछ बदला, सिवाय अभिनेत्रियों को दिए जाने वाले मेहनताने के। देश सबसे बड़ी दलित नेता मानी जाती मायावती हो, या सोनिया गांधी, या हेमामालिनी, किसी के भी खिलाफ मनमानी जुबान बोलने  से लोगों को गुरेज नहीं दिखता। सोचकर ताज्जुब होता है कि, क्या यही देश है, जो साल में दो- दो बार औरत के शक्ति स्वरूप की पूजा करता है?
भारत में औरतों के साथ जन्मने से भी पहले से लेकर, मौत की दहलीज तक पहुंचने तक भेदभाव, दुव्र्यवहार होते रहता है। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे काफी नहीं हो, तो पति की मौत के बाद उनकी अकेली बच गई पत्नियों को या तो वृन्दावन का रास्ता दिखा देने, या घर से बाहर फेंक दिए जाने की घटनाओं पर इस देश में किसी को ताज्जुब नहीं होता। यह सब इसके  बावजूद है कि देश  के एक बड़े हिस्से में वह कभी शक्ति  के रूप में,तो कभी लक्ष्मी के रूप में, तो कभी सरस्वती के रूप में पूजी जाती है।
त्यौहार जब केवल मनाने की खातिर मनाए जाते हंै, उनका सार जीवन में जब उतारा नहीं जाता, तो जनजीवन से उनका सरोकार खत्म हो जाने, और उनके  केवल आडम्बर तक ही सीमित रह जाने का डर पैदा हो जाता है। औरत केवल दुर्गा या लक्ष्मी के रूप में ही वरदान नहीं देती, भला नहीं करती- एक बेटी के रूप में, एक पत्नी, बहन, और मां के रूप में उसका योगदान इतना तो होता ही है, कि उस पर देवी की किसी मूर्ति या फोटो जितनी श्रद्धा दिखाई जाए। जरूरत बस उसकी कीमत आंकने की है, उसकी हिस्सेदारी मानने की है।
नये साल की शुरुआत अगर औरतों के प्रति नजरिये में इस सुधार के साथ की जाए, तो नवरात्रि  के पर्व को एक नई सार्थकता, और  जन जन की आस्था को एक नई ताकत मिलेगी। वर्ना हर साल  राक्षसों को मारने की ताकत रखने वाली, सारी दुनिया का पेट भरने वाली  के रूप में उसका गुणगान करने का, दशहरे पर रावण मारने का, और रामनवमी पर रामजन्म मनाने का यह सिलसिला यंू ही जारी रहेगा, और  देश में  यूं ही बदस्तूर जारी रहेंगे, उनकी इज्जत लूटने, उनकी हत्या करने, और उनके साथ भेदभाव करने जैसे राक्षसी ज़ुल्म।

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