राह का रोड़ा बनने के बजाय मील का पत्थर बनें अडवानी

20 मार्च 2014
संपादकीय
दिल्ली में इस वक्त भाजपा के सबसे बुजुर्ग नेता लालकृष्ण अडवानी की टिकट को लेकर हवा में असमंजस तैर रहा है। पार्टी ने उन्हें गुजरात से लडऩे को कहा है, और वे मध्यप्रदेश से लडऩा चाहते हैं। इसके पीछे की राजनीति को समझना एक बात है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जिस तरह वक्त के साथ कुदरत नए पत्ते लाती है, और पुराने पत्तों को जाना होता है, उसी तरह राजनीति में भी होता है, और कभी-कभी यह अधिक तकलीफ की बात भी होती है। 
अब भाजपा की राजनीति को देखें, तो यह जाहिर है कि उसने अपना सब कुछ मोदी के नाम पर दांव पर लगा दिया है। और उतनी ही जाहिर यह बात भी है कि मोदी के अलावा इस पार्टी के पास इस बार चुनाव जितवाने की ताकत रखने वाला इतना बड़ा कोई दूसरा नेता नहीं था। अब यह एक अलग बात हो सकती है कि भाजपा की सीटें कमल छाप पर बढ़ जाएं, और एनडीए के भागीदारों की कुल सीटें कम हो जाएं, क्योंकि या तो भागीदार कम हो सकते हैं, या फिर मोदी की अगुवाई में उन भागीदारों की सीटें कम हो सकती हैं। लेकिन यह एक राजनीतिक अटकल की बात है, और हम इस जगह उस पर अपनी सोच खर्च करना नहीं चाहते। अब ऐसे में जिन लालकृष्ण अडवानी ने मोदी के खिलाफ पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया था, उन्हें गुजरात से ही फिर टिकट देने के कई मतलब हैं। वे अपनी जीत के लिए मोदी के मोहताज भी रहेंगे, और पूरे चुनाव के दौरान मोदी की वाहवाही करना उनकी मजबूरी भी रहेगी। दूसरी तरफ वे अगर अपनी पसंद की मध्यप्रदेश की सीट से चुनाव लड़ते हैं, तो मोदी के पार्टी के भीतर के आतंक, उनके दबदबे, और उनके असर से परे रहकर भी मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मदद से वे चुनाव जीत सकते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रधानमंत्री पद के लायक समझी जाने वाली सुषमा स्वराज मध्यप्रदेश से लोकसभा में पहुंचने की कोशिश कर रही है। अब मोदी के लिए यह बात पार्टी के भीतर और जनता के बीच में हेठी की होती कि अडवानी उनका गुजरात छोड़कर शिवराज के मध्यप्रदेश जाते, जो शिवराज सिंह भाजपा और एनडीए के भीतर मोदी के एक विकल्प के रूप में भी गिने जाते हैं।  इस नौबत से मोदी को कुछ ठेस भी लगती, और हो सकता है कि मोदी से परे भी भाजपा के बाकी कुछ नेता इस मौके पर अडवानी और मोदी के बीच मोदी की जीत दर्ज करवाना चाहते हों, और देश के सामने इस बात को रखना चाहते हों। 
आज हकीकत यह है कि नरेन्द्र मोदी के सामने भाजपा के भीतर किसी भी नेता की कोई हस्ती नहीं रह गई है, और पहले पार्टी ने उनको अपने कंधे पर चढ़ाया, और अब पार्टी मानो उनके कंधे पर सवार होकर संसद की तरफ बढ़ रही है। राजनीति में एक वक्त ऐसा आता है जब बुजुर्गियत के मुकाबले जीत की संभावना को भी तौला जाता है। और यह शायद भाजपा के भीतर की एक अधिक पारदर्शी, और अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था है, कि कांग्रेस के मुकाबले, या घरों से चलती हुई दर्जन भर और बड़ी पार्टियों के मुकाबले, इस पार्टी में लीडरशिप को लेकर चर्चा तो होती है। यही वजह है कि अब तक मोदी और अडवानी दोनों की अहमियत पर चर्चा हो रही है, और बैठकें हो रही हैं। 
अब सवाल लालकृष्ण अडवानी का है कि गुजरात से ही टिकट मिलने पर उनको क्या करना चाहिए? हो सकता है कि जब तक हमारी लिखी यह बात छपने के लिए जाए, अडवानी का फैसला, या अडवानी पर फैसला सामने आ सकता है। लेकिन हम ऐसी किसी खबर से परे, यह सोचते हैं कि आज अगर अडवानी को एक टिकट का मोहताज होना पड़ रहा है, तो अब उन्हें अपने बुढ़ापे को खराब करने के बजाय चुनाव नहीं लडऩा चाहिए, और अपनी बची-खुची इज्जत को लेकर घर बैठना चाहिए। ऐसा करने वाले वे पहले नेता नहीं होंगे, न अपनी पार्टी के भीतर, न भारतीय राजनीति में। लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, और पार्टी के सामने झुककर, उनके सामने डाली गई गुजरात की सीट को वे मंजूर करते हैं, तो वे एक बड़ी बेइज्जती के ही हकदार माने जाएंगे। एक वक्त आता है जब नई पीढ़ी के लिए, दूसरे नेताओं के लिए, दूसरे गुटों के लिए रास्ता खाली करना पड़ता है। लालकृष्ण अडवानी को अगर राह का रोड़ा माना जा रहा है, या वे सचमुच राह का रोड़ा बन गए हैं, तो उनको अब राह के किनारे मील का पत्थर बनने के लिए हाशिए पर जाकर बस जाना चाहिए। 

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