30 मार्च 2014
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी अपने जनसंघ के दिनों से लेकर अब तक के सबसे तेज, और शायद पहले, अंधड़ से गुजर रही है। यह पहला ही मौका है जब पार्टी ने किसी को इस तरह प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया है, और पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के बहुत से महत्वाकांक्षी नेता एक प्रादेशिक नेता की इस ताजपोशी को देखते ही रह गए। इसके बाद भी यह सिलसिला आगे बढ़ा और भाजपा के भीतर दिग्गजों की बदलती सीटों से लेकर उनकी कटती उम्मीदवारी तक, बहुत से फैसले ऐसे हुए कि लोगों को लगा कि ये नरेन्द्र मोदी के मनमाफिक काम किया जा रहा है। यह सिलसिला अडवानी को नए ढांचे में उनकी जगह दिखाने से शुरू हुआ था, और उन्हीं पर जाकर खत्म भी हो गया। इस चुनाव में लालकृष्ण अडवानी को भी जब उनकी मर्जी की सीट से टिकट नहीं मिली, और मन मसोसकर उनको मोदी के गुजरात से ही लडऩे को बेबस किया गया, तो पार्टी पर मोदी का एकाधिकार पूरी तरह कायम हो गया।
दरअसल भारतीय जनता पार्टी जनसंघ से लेकर आज तक, अपने इतिहास की सबसे मजबूत स्थिति में है। देश में सरकार बनाने के लिए एक गठबंधन के नेता के रूप में उसकी संभावनाएं इतनी मजबूत इसके पहले कभी नहीं थीं। और दूसरी दरअसल बात यह है कि केन्द्र की किसी सरकार की इतनी बदहाली पहले कभी नहीं थी। किसी राज्य में ऐसे दंगों के बाद उसके दागों से चुनावों में उबरना भी इसके पहले कभी नहीं हुआ था, और लगातार तीन चुनाव जीतकर वैसे गहरे दागों को धोने का काम भी पहले कभी नहीं हुआ था। नरेन्द्र मोदी की शक्ल में भाजपा, और भारत की राजनीति एक अभूतपूर्व आंधी को देख रहे हैं और इससे चुनावी नतीजों के आसार का अंदाज भी लोग लगा रहे हैं।
हम अभी चुनावी नतीजों पर अटकलबाजी करना नहीं चाहते, क्योंकि 2004 में भी जब अटल सरकार के प्रचार अभियान इंडिया शाइनिंग की चकाचौंधी में सभी आंखों को कमल खिलता दिख रहा था, तब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए जीतकर आई थी, और दस बरस से सत्ता पर है। इसलिए मोदी की आंधी कितनी कारगर होती है यह आने वाले दिन बताएंगे। लेकिन एक बात साफ है कि इन चुनावों में अगर भाजपा की लीडरशिप में सरकार बनती है, तो देश और पार्टी दोनों पर मोदी की अकेले की ऐसी मर्जी हावी रहेगी, जैसी किसी ने देखी-सुनी नहीं होगी। ऐसी नौबत से परे कुछ लोगों को एक छोटी सी ऐसी संभावना दिखती है कि चुनाव के बाद भाजपा के साथी दल मोदी से परे किसी दूसरे नाम पर ही सहमत हों, और मोदी को नकार दें।
जो भी हो, भाजपा एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जो खुद उसके ही काबू से परे है। आज पार्टी मोदी के कंधों पर सवार होकर संसद तक पहुंचने के फेर में है, और ऐसे में बाजार की जुबान में मोदी को पार्टी की सोल डिस्ट्रीब्यूटरशिप दे दी गई है, तो उसमें अटपटा कुछ नहीं है।

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