तेईस बरस की उम्र में गांधी और नेहरू भी, भगत सिंह जितने ऊंचे नहीं पहुंचे थे

23 मार्च 2014
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
आज भगत सिंह के शहादत दिवस पर भारत भर में जगह-जगह उनको याद किया जा रहा है। और भारत से बाहर पाकिस्तान में भी वामपंथी विचारधारा के बहुत से लोग हैं जो भगत सिंह के नाम पर वहां पर एक चौराहे का नाम रखने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। ऐसे में इन दोनों देशों की आजादी में भगत सिंह का जो योगदान था, वह गांधी और नेहरू जैसे दिग्गजों के नाम के आगे दब गया, और बहुत से लोग भगत सिंह के गैरअहिंसक तौर-तरीकों को सही नहीं भी मानते थे, और इसलिए उनका मूल्यांकन इतिहास में कम किया गया। लेकिन हम इस शहादत से परे के एक पहलू पर बात करना चाहते हैं जिसे समझना आज की नौजवान पीढ़ी के लिए बहुत जरूरी है।
जिस वक्त भगत सिंह को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के बाद कैद, अदालती सुनवाई, और फांसी हो चुकी थी, तब वे कुल 23 बरस के थे। आज हम हिन्दुस्तान में इस उम्र की नौजवान पीढ़ी को अगर देखें, तो उसकी अधिकतर जानकारी मोबाइल फोन के सबसे ताजा मॉडल तक सीमित रहती है, और उसी के इर्द-गिर्द रहती है। इस उम्र तक आम और अधिकतर हिन्दुस्तानी नौजवान अपनी कॉलेज की किताबों को भी ठीक से नहीं पढ़ते हैं। दुनिया की राजनीतिक विचारधाराओं, और दुनिया के हालात की समझ तो छोड़ ही दें, औसत हिन्दुस्तानी नौजवान को अपने देश के आज के हालात की समझ भी कम ही है, और किसी को इस बात का अफसोस भी नहीं है। दरअसल न तो आज की हिन्दुस्तानी नौजवान पीढ़ी के सामने आजादी की लड़ाई जैसी कोई चुनौती है, और न ही भगत सिंह या गांधी जैसे कोई प्रेरणास्रोत हैं। उसके सामने भ्रष्टाचार और चापलूसी से जुटने वाली नौकरी की संभावना है, और उससे भी अधिक बेरोजगारी की आशंका है। इसलिए उसकी जिंदगी की सोच सिर्फ शहरी और आधुनिक सामानों की सहूलियत तक होकर रह गई है। 
इस बात पर हम जोर देकर इसलिए कहना चाह रहे हैं कि 23 बरस की उम्र में फांसी पर चढऩे के वक्त उस वक्त का भगत सिंह जितना लिख गया था, उतना तो आज 23 बरस की उम्र वाले नौजवान पढ़ भी नहीं पाते हैं। देश में शायद एक फीसदी नौजवान भी ऐसे नहीं होंगे, जो कि भगत सिंह के लिखे हुए का एक फीसदी भी पढ़े होंगे, भगत सिंह के पढ़े हुए का मुकाबला तो दूर रहा। राजनीतिक समझ और आर्थिक-सामाजिक जिम्मेदारी से अनजान नौजवान पीढ़ी देश के लिए कुछ कुर्बान भी नहीं कर सकती। भगत सिंह ने उस वक्त उस उम्र में, बिना इंटरनेट और कम्प्यूटर के, महज किताबों के साथ और खतो-किताबत से जितना पढ़ा था, समझा था, समझाया था, और लिखा था, वह हैरतअंगेज काम था। उस वक्त वामपंथ की जो समझ भगत सिंह की थी, उस वक्त साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई की जो समझ उनकी थी, उस वक्त धर्म और ईश्वर के खिलाफ जो समझ उनकी थी, और उनके भीतर जितने ऊंचे दर्जे का नास्तिक सिर उठाए खड़ा था, उसकी कोई मिसाल हिन्दुस्तान में नहीं है। सच कहें तो किसी दूसरे से तुलना करने की नीयत न होने पर भी, आज अगर हम उस शहीद की तुलना करना ही चाहें, तो 23 बरस की उम्र में गांधी और नेहरू भी भगत सिंह के मुकाबले किसी किनारे नहीं पहुंचे थे, भगत सिंह का जो योगदान उस कच्ची उम्र में देश के लिए था, गांधी-नेहरू शायद उस उम्र में कानून की पढ़ाई करने में लगे हुए थे। 
लेकिन आज भारत और पाकिस्तान में भगत सिंह की शहादत को याद करके उनके बुतों पर फूल चढ़ाने से, और उनको समझे बिना आज का दिन गुजार देने से बड़ी बेइज्जती उनकी कुछ नहीं हो सकती। अगर भगत सिंह को याद ही करना है, उनकी शहादत की इज्जत करनी है, तो भगत सिंह के लिखे हुए को पढऩे की जहमत उठानी चाहिए, और उनका लिखा हुआ हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, और उर्दू, कम से कम इतनी जुबानों में तो चारों तरफ मौजूद है। आज की नौजवान पीढ़ी मरने तक अनपढ़ ही रहेगी, अगर वह भारत और पाकिस्तान में जीते हुए, भगत सिंह को पढ़े बिना, जाने बिना, उस शहीद को समझते हुए अपने रौंगटे खड़े होते हुए देखे बिना अगर बूढ़ी हो जाती है, तो यह उसके लिए धिक्कार की बात है। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान इतनी कम उम्र का इतना हौसलामंद, इतना समझदार, और इतनी बड़ी राह दिखाने वाला और कोई इंसान नहीं है, इसलिए जिसने भगत सिंह को नहीं पढ़ा, उसने कुछ नहीं पढ़ा। 

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