12 मार्च 2014
संपादकीय
बस्तर में कल के नक्सल हमले के बाद आज छत्तीसगढ़ पहुंचे केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने शायद अपनी आदतन लापरवाही से एक बात कही, जो कि उनको सार्वजनिक या संवैधानिक रूप से भारी भी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि जवानों की शहादत का नक्सलियों से बदला लिया जाएगा। हम उनकी इस एक लाईन पर यह पूरी जगह खराब करना नहीं चाहते, लेकिन नक्सल हमले के इस पहलू से हम आज की बात शुरू करना जरूर चाहते हैं। सुशील कुमार शिंदे हिन्दी अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन लोग भी उन्हें लापरवाह बातों के लिए उतनी ही अच्छी तरह जानते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कुचल देने की धमकी दी थी, लेकिन बाद में बात बढ़ जाने पर उन्होंने उसे सोशल मीडिया के बारे में कही गई बात बताकर पीछा छुड़ाया था। अब वे नक्सलियों से बदला लेने की बात कैमरों पर कह गए हैं।
ऐसी हिंसा करने वाले नक्सलियों से किसी तरह की हमदर्दी, या उनके साथ किसी रियायत की हमारी नीयत नहीं है, लेकिन लोकतंत्र में हर बात की एक सीमा होती है, किसी के जुर्म पर उसे सजा देने की भी एक सीमा होती है। और भारतीय लोकतंत्र सरकार को अपने किसी नागरिक से बदला लेने की इजाजत नहीं देता, चाहे वे किसी धर्म के नाम पर आतंकी हिंसा करने वाले लोग हों, चाहे वे नक्सलियों जैसे हथियारबंद आंदोलनकारी हों, चाहे वे प्रधानमंत्री के हत्यारे ही क्यों न हों। लोकतंत्र बदले की भावना पर काम नहीं करता। नक्सली जितने भी बुरे हों, वे हिन्दुस्तानी हैं, हिन्दुस्तान की जमीन पर हिंसा कर रहे हैं, और हिन्दुस्तानी कानून उनसे निपटने की ताकत रख सकता है, अगर सरकार की यह ताकत हो कि उन्हें पकड़कर अदालत तक पहुंचाए। गृहमंत्री शिंदे की बात से हम खुद एक यह मतलब निकालते हैं कि नक्सलियों के खिलाफ पुलिस और सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई हो। लेकिन ऐसी कड़ी कार्रवाई ही लोकतांत्रिक सरकार बदले की भावना से नहीं कर सकती। अगर बदला भुनाने के लिए बंदूकों की कार्रवाई करनी है, तो ऐसी कार्रवाई नक्सली करते ही रहते हैं, वैसे में सरकार और नक्सलियों के बीच, लोकतांत्रिक ताकतों, संवैधानिक संस्थाओं, और लोकतंत्र उखाड़ फेंकने के लिए लगे हुए हथियारबंद लोगों के बीच फर्क ही क्या रह जाएगा? इसलिए हम केन्द्रीय गृहमंत्री की ऐसी सोच, ऐसी भाषा, और ऐसे बयान पूरी तरह अलोकतांत्रिक पाते हैं, और उनको अपना यह बयान वापिस लेना चाहिए। इस वक्त जब हम यह बात लिख रहे हैं, उस वक्त हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार के भीतर कुछ लोग इस बात का नोटिस ले भी चुके हों।
अब हम इसी हमले से जुड़े हुए एक दूसरे पहलू पर बात करना चाहते हैं जिसे लेकर दिल्ली से लेकर रायपुर तक बहुत सी खबरें और बहसें हवा में तैर रही है। इनमें यह है कि केन्द्र सरकार से छत्तीसगढ़ सरकार को नक्सल खतरे, और हमले को लेकर ऐसी खुफिया जानकारी भेजी गई थी, और उस पर राज्य कार्रवाई कर पाया या नहीं। दूसरी बहस यह छिड़ी है कि छत्तीसगढ़ के खुफिया विभाग ने बस्तर के इन जिलों को समय रहते खुफिया जानकारी भेजी या नहीं। दोनों ही सरकारों की अपनी मशीनरी को सुधारने के लिए तो यह जांच जरूरी है कि अगर कोई चूक हुई है, तो वह कहां पर हुई है। लेकिन ऐसे किसी नतीजे के सामने आने के पहले आज जिस तरह की बहस चल रही है, उससे ऐसा लगता है कि पुलिस या खुफिया तंत्र नक्सल खतरे को लेकर लापरवाह थे। बहस में शामिल लोगों को हम याद दिलाना चाहेंगे कि नक्सल मोर्चे पर जिनकी जिंदगियां दांव पर लगी होती हैं, उनसे लापरवाह होने की उम्मीद रखना गलत होता है। आखिरकार उनकी लापरवाही से सबसे पहले उनकी खुद की जिंदगी जाती है, इसलिए वे लोग वैसे मुश्किल हालात में किस तरह काम करते हैं, किस तरह पहले अपनी जान बचाते हैं, फिर दूसरों की जान बचाते हैं, इसको वे ही लोग जानते हैं। और आज छत्तीसगढ़ पुलिस की जो खुफिया जानकारी मौजूद है, वह बताती है कि राज्य बस्तर के नक्सल खतरे के किसी भी पहलू को लेकर लापरवाह नहीं था। इसी तरह हम यह भी मानते हैं कि जिन लोगों की जिंदगी उस जंगल-जमीन पर धमाकों के बीच चल रही थी, वे लोग भी अपनी क्षमता की हद तक तो लापरवाह नहीं रहे होंगे। इसलिए ऐसे हर मौके पर लापरवाही और जिम्मेदारी तय करने की हड़बड़ी मीडिया और नेताओं को, बयानबाजों को नहीं करनी चाहिए। आने वाली जांच सारी बातों को सामने रखेगी, और शहादत के मौके पर, एक मुश्किल लड़ाई के मौके पर सनसनीखेज खबर बनाने के लिए, चुनावी राजनीति का हिसाब तय करने के लिए अटकलबाजी से खड़े किए गए आरोप ठीक नहीं हैं। उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए जो अपनी जिंदगी खोकर आज तक मीडिया और राजनीति को धमाकों से दूर रखे हुए हैं, और जिंदा रखे हुए हैं।

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