25 मार्च 2014
संपादकीय
कल के कल कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा दोनों की शर्मिंदगी देखने लायक थी। एक तरफ श्रीराम सेने नाम के धर्मान्ध और हिंसक हिन्दू संगठन के मुखिया को भाजपा में प्रवेश देने के आधे घंटे के भीतर ही देश भर से उसके विरोध को देखते हुए पार्टी से निकालना पड़ा, और मानो इसके मुकाबले कांग्रेस पार्टी पीछे रहना नहीं चाहती थी, तो उसने कर्नाटक में लड़के-लड़कियों पर हमला करने वाले इसी संगठन के एक दूसरे हिंसक पदाधिकारी को कांग्रेस में एक जिला स्तर पर प्रवेश दिया।
दरअसल ये दोनों पार्टियां, बाकी कुछ और पार्टियों के साथ-साथ इतनी हड़बड़ी में हैं, कि इनके नीति-सिद्धांत सारे के सारे धरे रह गए हैं। एक-एक करके अपनी पार्टी के हर कुख्यात और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए लोगों को या तो ये पार्टियां टिकट दे रही हैं, या पार्टी के भीतर वापिस दाखिला दे रही हैं, और बहुत से मामलों में तो ये दोनों ही फायदे कुछ बदनाम नेता पा रहे हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी से लेकर जदयू तक, और लालू यादव के राजद तक से निकलकर लोग सीधे भाजपा में जा रहे हैं, भाजपा के लोग धर्म निरपेक्ष पार्टियों में जा रहे हैं। कुल मिलाकर हालत यह है कि चुनाव की इस आंधी में जिसके हाथ जो लग रहा है, उसे ही थामकर लोग गंगा पार करने की कोशिश कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है जब जनता को अपने नेताओं से उनकी नीतियों को लेकर, उनके पुराने बयानों को लेकर, उनके कस्मों-वायदों को लेकर सवाल करने चाहिए। अकेले मीडिया से सवाल पूछने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
हमने दल-बदल के खिलाफ कानून को संसद और विधानसभाओं से बाहर चुनाव नियमों तक बढ़ाने के बारे में लगातार लिखा है। लेकिन जब लोग चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, और किसी पार्टी में आ-जा रहे हैं, उसका प्रचार कर रहे हैं, तो उन पर चुनाव आयोग की बंदिश भी उम्मीदवार के रूप में तो लागू नहीं हो सकती। ऐसे में जनता के बीच से लोगों को, जनसंगठनों को कड़वे और कड़े सवाल लेकर सामने आना चाहिए, जनता के सवालों को अगर मीडिया न भी छापे, तो भी उन्हें पोस्टर और पर्चे बनाकर, आमसभाओं में जाकर सवाल उठाकर, या जनचर्चा में इन बातों को फैलाकर लोकतंत्र में विचारों की आजादी का इस्तेमाल करना चाहिए।
मीडिया या ऐसे दूसरे औजार, लोकतंत्र में सिर्फ औजार हैं। और किसी को औजार नसीब न हों, तो उनको अपने आपको बेबस और कमजोर नहीं समझना चाहिए। नए-नए औजार बनाए जा सकते हैं। अभी कुछ दिन पहले ही एक खबर आई थी कि कैसे एक जेल में वहां के कैदी पखाना पोंछने के कागज के रोल पर अखबार निकालते थे, और एक-दूसरे तक लिखा हुआ वह अखबार पहुंचाते थे। आज तो इंटरनेट और एसएमएस, फोन और उसके दूसरे मुफ्त के एप्लीकेशनों की मेहरबानी से लोग अपनी बातों को मीडिया के बिना भी दूर-दूर तक पहुंचा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि मीडिया जैसे-जैसे एक बड़ा कारोबार बनते गया है, उसकी कारोबारी मजबूरियां उसकी आजादी और उसकी निष्पक्षता को खत्म करती चली गई हैं। ऐसे में जनता को मीडिया के हिस्से अब तक चले आ रहे जिम्मे का कुछ हिस्सा खुद भी उठाना पड़ेगा।
आज चुनाव की आंधी के बीच पार्टियों से बहुत से सवालों के जवाब मिलने वाले नहीं हैं। लेकिन जनता को आपस में ऐसे सवाल उठाकर, उनके जवाब सोच-विचार कर, उन पर लोकतंत्र और जनता के हित का, अपने इलाके और अपनी आने वाली पीढिय़ों के हित का फैसला लेना चाहिए। पूरे देश में कोई आंधी चल रही हो, ऐसा मानकर किसी एक निशान पर वोट देने के बजाय, लोगों को अपने इलाके से बेहतर लोगों को चुनकर भेजना चाहिए। और सिर्फ बड़े उम्मीदवारों को चुनने की बेबसी लोकतंत्र में नहीं रहती, लोकतंत्र में लोग कम चर्चित, छोटी पार्टियों के, या निर्दलीय उम्मीदवारों को भी वोट देकर अच्छे लोगों को वजनदार साबित कर सकते हैं, और दूसरी तरफ अब तो वोटिंग मशीन पर सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के लिए नोट का बटन भी है। इसलिए आज राजनीतिक गंदगी के बीच लोगों को हवा साफ करने की कोशिश अपने स्तर पर भी करनी चाहिए।

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