26 मार्च 2014
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र इस समय जारी हो रहा है, और उसमें अगले पांच बरस के लिए सौ किस्म के वायदे देश से किए जा रहे हैं। वैसे देखा जाए तो पिछले पांच या दस बरसों में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए सरकार ने बहुत से ऐतिहासिक कानून, और ऐतिहासिक जनकल्याणकारी कार्यक्रम लागू किए, और भाजपा या एनडीए राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के सामने जनहित की वैसी कोई नीतियां या कार्यक्रम नहीं रख पाए। फिर भी आज जब इस पल टीवी पर कांग्रेस पार्टी का घोषणापत्र आ रहा है, तो शायद ही कोई उसे गंभीरता से देख रहा होगा।
हम पिछले दस बरसों में कांग्रेस के लिए हुए अच्छे सरकारी फैसलों, और अगले पांच बरस के लिए उसके अच्छे वायदों की बारीकियों पर यहां गौर करना नहीं चाहते। लेकिन हम इस मुद्दे पर लिख इसलिए रहे हैं कि अच्छा काम करने के बाद भी बातों में वजन क्यों नहीं आ पाता, इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। लाख रूपए की साख, गई तो फिर खाक। कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी, और उसके भीतर कुछ बहुत काबिल और बहुत अच्छे नेता-मंत्री, आजादी की लड़ाई से लेकर बांग्लादेश बनाने तक का योगदान, देश के कमजोर तबकों के लिए जनकल्याणकारी कार्यक्रम, गांधी और नेहरू की शोहरत, इन सबके बाद भी आज जब कांग्रेस का घोषणापत्र आ रहा है, तो उसकी बातों पर शायद ही कोई भरोसा करे। कांग्रेस की इस हालत से देश के लोगों को राजनीति से परे भी सबक लेना चाहिए, कि कोई अपने वक्त कितने ही बड़े और ताकतवर क्यों न हों, उनको यह नहीं मानना चाहिए कि उनकी ताकत और उनके आकार की हमेशा इज्जत होगी। इज्जत कामों को लेकर होती है, आकार को लेकर नहीं।
अब मिसाल के लिए अरविंद केजरीवाल को लें, हमारे पास उनकी आलोचना के लिए सौ मुद्दे हैं, लेकिन सड़क से आकर जिस तरह दिल्ली राज्य की प्रादेशिक संसद में उन्होंने कब्जा किया, वह देखने लायक था। उनकी पार्टी के पास महज एक झाड़ू था, लेकिन लोग जुड़ते गए, कारवां बढ़ता गया। उन्होंने देश की जनता के दिल-दिमाग में यह बात कामयाबी से बिठाई कि भ्रष्ट राजनीति में वे एक उम्मीद साबित हो सकते हैं। हमारी आज उनसे कितनी ही नाउम्मीदी हो, वे यह मिसाल तो साबित हो ही चुके हैं कि किस तरह बिना अपने किसी ढांचे के, बिना अपने इतिहास के, बिना अपने कुनबे के, बिना किसी दौलत के, महज साख से वे धरती से आसमान तक पहुंच गए थे। इस तरह साख की अहमियत को कांग्रेस को समझना था, जिसने कि पिछले दस बरसों में लगातार इसको खोते हुए अपना यह घमंड दिखाना जारी रखा कि देश के मतदाताओं की मानो यह बेबसी है कि वे नेहरू-गांधी परिवार को चुनें, कांग्रेस को चुनें।
जिंदगी के दूसरे दायरों में भी लोगों को अपनी साख का ख्याल रखना चाहिए। कारोबार की दुनिया को देखें तो ऊंची साख के लोगों को बाजार में जिस ब्याज पर पैसा मिल जाता है, खोई हुई साख के लोगों को उससे तीन गुना ब्याज पर भी रकम नहीं मिलती। इसलिए कांग्रेस की इस नौबत से हर किसी को सबक लेना चाहिए, कि आज न तो दस बरस के उसके अच्छे काम किसी को याद हैं, और न ही अगले पांच बरस के लिए उसके वायदों को कोई सुनना चाहते। कांग्रेस के गलत काम उसके बीते कल और आने वाले कल के चेहरे पर कालिख पोत गए हैं, और इस चुनाव में जो आसार दिखते हैं, वे 2014 में इस कालिख के धुलने के नहीं दिखते। कांग्रेस के अलावा केजरीवाल को देखकर भी लोगों को जिंदगी में सीखना चाहिए, और मोदी युग में भाजपा के दिग्गजों का क्या हाल हो रहा है, उनकी पार्टी का क्या हाल हो रहा है, उसे देखकर भी सबक लेना चाहिए। राजनीति के सबक राजनीति से परे भी काम के होते हैं।

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