खुशियों और हक के रंग बिखेरने न संसद की जरूरत पड़ी, न सुप्रीम कोर्ट की

18 मार्च 2014
संपादकीय

भारत के वृन्दावन को यूं तो हिन्दू धर्म के सबसे रसिक और रंगारंग भगवान कृष्ण के नाम से जाना जाता है। लेकिन मंदिरों और प्रतिमाओं से परे, वृन्दावन की असल जिंदगी की हकीकत सभी रंगों से दूर, सफेद रंग की कैद में रखी गई महिलाओं की है, जो कि पति को खोने के बाद विधवा कहलाते हुए बची जिंदगी जिंदा लाश की तरह विधवाश्रमों में छोड़ दी जाती हैं। उनके लिए बाकी के दिन मौत का इंतजार करने के रहते हैं, न ठीक से पहनना, न ठीक से खाना, न ठीक से रहना। 
पिछले कुछ बरसों में धीरे-धीरे करके वृन्दावन की इन दबी-कुचली महिलाओं की तस्वीरें खबरों में आती रही हैं, और कल जो अच्छी खबर आई, वह यह कि इन महिलाओं को होली में शामिल करने की एक पहल हुई है। देश भर में साफ-सुथरे सार्वजनिक शौचालयों का आंदोलन चलाने वाली सुलभ इंटरनेशनल के मुखिया डॉ. बिन्देश्वरी पाठक ने यह काम किया है, और यह हिन्दुस्तान की हिन्दू संस्कृति की हैवानियत को सुधारने की एक पहल है, और इसमें हर किसी को साथ देना चाहिए। सामाजिक सुधार जो कि हिन्दू समाज में सौ बरस पहले सार्वजनिक रूप से शुरू हुए थे, वे कानून की मदद से महिलाओं को सती होने से तो बचा पाए, लेकिन बालविवाह रोकने और विधवा विवाह शुरू करने जैसे सुधार नहीं हो पाए। वक्त के साथ धीरे-धीरे हालात थोड़े से सुधरे, लेकिन कम उम्र लड़कियों और पति खो बैठी महिलाओं के लिए हिन्दू समाज के दिल में कोई अधिक रहम नहीं जुट पाई। 
एक महिला के पति के गुजर जाने से उसे जिंदा लाश बना देने वाला समाज उस महिला के योगदान को भी नहीं पा सकता, और ऐसी हिंसक और अमानवीय परंपरा को, रस्म-रिवाज को जिंदा रखकर लोग अगली पीढिय़ों तक उसे विरासत में भी छोड़ जाते हैं। हमारा मानना है कि कानून और समाज, इन दोनों ही मोर्चों पर एक बहुत ही आक्रामक तरीके से सुधार की जरूरत है। भारत में महिलाओं के साथ हिंसा सिर्फ बलात्कार में नहीं होती, अजन्मी बेटी को गर्भ में ही मार डालने से लेकर विधवा कही जाने वाली महिला को मरने तक मरे जैसा रखने की कई किस्म की हिंसा भारत में प्रचलन में है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और यह बात सिर्फ हिन्दू धर्म के भीतर हो, ऐसा भी नहीं। जब एक मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके जायज हक दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था, तो एक नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक बहुमत वाली पार्टी ने संसद के भीतर उस फैसले को पलटने के लिए संविधान को ही बदल दिया था। इसलिए औरत के हक छीनने के लिए वह पार्टी भी अगुवा बन गई थी, जो कि इंदिरा गांधी की पार्टी थी। इसलिए दूसरी बहुत सी पार्टियों से बहुत सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। यही वजह है कि दशकों से महिला आरक्षण की चर्चा ही चल रही है, और संसद के भीतर एक तरफ सोनिया गांधी मुखिया रहती है, तो दूसरी तरफ सुषमा स्वराज, और इसके बाद भी महिलाओं को संसद-विधानसभा आरक्षण नहीं मिल पाता। 
डॉ. बिन्देश्वरी पाठक ने वृन्दावन में सुधार का जो काम शुरू किया है, उससे देश के बहुत से दूसरे लोगों को सबक लेना चाहिए, नसीहत लेनी चाहिए। देश भर में जगह-जगह, अलग-अलग धर्म और जातियों में महिलाएं बेइंसाफी झेलती हैं, यह तस्वीर बदलनी चाहिए। और वृन्दावन में सफेद कपड़ों पर खुशियों और हक के रंग बिखेरने के लिए न संसद की जरूरत पड़ी, न सुप्रीम कोर्ट की। एक सामाजिक पहल से यह सुधार शुरू हुआ है। इसे देश भर में आगे बढ़ाने की जरूरत है। 

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