21 मार्च 2014
संपादकीय
जिस रफ्तार से एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में लोग जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि पार्टियों के भीतर इसके खिलाफ बगावत हो, या न हो, देश के लोकतंत्र में ऐसी बेशर्मी, या मौकापरस्ती, या धोखाधड़ी, के खिलाफ एक बगावत जरूर होनी चाहिए। लोगों के विचार बदल सकते हैं, उनकी नीतियां बदल सकती हैं, अपनी पार्टी से उनको चिढ़ हो सकती है, दूसरी पार्टी उनको अधिक पसंद आ सकती है, और ऐसे में दलबदल एक पूरी तरह से लोकतांत्रिक हक है, लेकिन इसके बाद नई पार्टी की टिकट पर चुनाव लडऩे के लिए कुछ समय की रोक जरूर रहनी चाहिए। ऐसा होने पर लोग पार्टी छोडऩे के पहले सोचेंगे, पार्टियां ऐसे लोगों को ऐन चुनाव के पहले, चुनाव लड़वाने के लिए लेने के पहले सोचेंगी, और राजनीति में गंदगी, खरीद-फरोख्त कुछ कम होगी।
लोकतंत्र में दरअसल बहुत सी बातें परंपरा के आधार पर चलनी चाहिए, लेकिन हकीकत इससे ठीक उल्टे है, और भारतीय लोकतंत्र में तो परंपरा दूर रही, कानून को भी बेवकूफ बनाने के लिए नेता और पार्टियां आखिरी दम तक कोशिश करते हैं। यह उम्मीद अब किसी से नहीं की जा सकती कि भ्रष्ट को, संदिग्ध आरोपी को, बुरे इंसान को पार्टी टिकट न दे। अकाली दल जैसी पार्टियों ने तो कई टिकटें देकर संसद में कुछ लोगों को महज इसलिए भेजा कि उनके परिवार के लोगों ने इंदिरा की, या कुछ और लोगों की हत्या की थी। जिस लोकतंत्र में ऐसी गैरजिम्मेदारी को रोकने का न कानून है, न ऐसी कोई परंपरा है, उस लोकतंत्र में दलबदल को अगर घटाना है, तो दलबदल के बाद नई पार्टी, नए निशान पर चुनाव लडऩे के लिए कुछ बरस की रोक रहनी चाहिए।
हमने कुछ दिनों पहले ही इस मुद्दे को छेड़ा था, और हमारा यह भी मानना है कि जज रहे हुए लोग, सीएजी की कुर्सी पर बैठे हुए लोग, फौज से रिटायर हुए लोग, नौकरशाह रहे हुए लोग, ऐसे लोगों पर नौकरी छोडऩे या रिटायर होने के बाद कुछ बरस तक चुनाव न लडऩे की एक रोक रहनी चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि अभी-अभी भाजपा में गए भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह राजनीति में उतरते ही जिस अंदाज में सरकार के खिलाफ बोलना शुरू कर चुके थे, उससे लगता था कि यह देश की सुरक्षा के लिए, और फौज के माहौल के लिए ठीक बात नहीं है। अब अगर कल के दिन सीबीआई का मुखिया राजनीति में उतर आए, तो वह बहुत सी गोपनीय जानकारियों का राजनीतिक इस्तेमाल कर सकता है। कुछ महीने पहले ही भाजपा में शामिल हुए भूतपूर्व गृहसचिव ने जिस अंदाज में अपने गृहमंत्री रहे हुए कांग्रेसी नेता पर हमले किए, उससे भी सरकार के कामकाज, और उसकी जिम्मेदारियों की साख गिरी थी।
हो सकता है कि देश के कानून के तहत सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों में यह फेरबदल करना होगा कि कौन-कौन सी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के कितने बरस तक चुनाव लडऩे पर रोक रहेगी। कुछ लोगों को हमारी यह सलाह अलोकतांत्रिक लग सकती है, और यह लग सकता है कि यह उन अफसरों या जजों के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है, लेकिन हमारा यह मानना है कि नौकरी देते समय ही अगर ऐसी शर्त रख दी जाए, तो फिर लोग यह तय कर सकते हैं कि वे सरकारी नौकरी में जाएं, या राजनीति में जाने का अपना रास्ता खुला रखें। लोकतंत्र को आज जिस गैरजिम्मेदारी के साथ लिया जा रहा है, वह बिल्कुल भी ठीक नहीं है। सिर्फ जीत की संभावना को देखते हुए राजनीति की जा रही है, और उसी वजह से उसमें बेहिसाब समझौते हो रहे हैं। चुनाव सुधार के लिए बहुत मुद्दों पर कानून बनाने की बात हो रही है, और यह मुद्दा उसमें जोड़ा जाना चाहिए कि पार्टी छोडऩे के बाद कितने वक्त तक लोगों को दूसरे निशान से चुनाव लडऩे न मिले।

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