रमन का तीसरे कार्यकाल का आखिरी बजट नीचे के तबकों के अधिक कल्याण पर केन्द्रित

संपादकीय
10 फरवरी 2018


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह बारह बरस से वित्तमंत्री भी हैं, और अपने तीसरे कार्यकाल का यह आखिरी, बारहवां बजट पेश करते हुए उन्होंने राज्य में बड़े पैमाने पर जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर खर्च की योजना पेश की है। उनके लगातार चुनाव जीतने और जिताने के पीछे इन जनकल्याणकारी कार्यक्रमों का खासा हाथ रहा है। छत्तीसगढ़ की राशन व्यवस्था और यहां की धान खरीदी को बाकी पूरे देश में एक आदर्श योजना माना जाता है, और बाकी राज्य सरकारें भी यहां आकर इनसे सीखने की कोशिश करती आई हैं। आज के बजट में मुख्यमंत्री ने गर्भवती महिलाओं, बच्चों, आंगनबाडिय़ों, पोषण आहार, बच्चियों को सैनिटरी नैपकिन जैसी कई बातों पर नया और अतिरिक्त खर्च सामने रखा है। इसी तरह आदिवासी और जंगली इलाकों में लघु वनोपज इक_ा करने वाले गरीब लोगों को वनोपज खरीदी पर बोनस देने की घोषणा की है। बजट को विधानसभा में देखने-सुनने वालों का यह अंदाज है कि इसका बड़ा फोकस सरकार के कम वेतन वाले छोटे पदों के कर्मचारियों को बड़ा फायदा देने पर रहा है, और सरकारी योजनाओं में काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भी इस बजट में अधिक वेतन-भत्ते मिलने की बात है। 
राज्य में सरकार की आय भी पिछले बरस के मुकाबले करीब 10 फीसदी अधिक होने का अंदाज है, और यह चुनाव का बरस होने के बावजूद घाटा बढ़ाने के बजाय कुल खर्च भी कमाई जितना ही बढ़ाया गया है जो कि अगली सरकार के लिए एक अच्छी स्थिति होगी। छत्तीसगढ़ के पिछले एक बरस के आर्थिक विकास के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बेहतर दिखते हैं। फिर जिस मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य बना, उस मध्यप्रदेश के आज के आंकड़ों के मुकाबले भी छत्तीसगढ़ की एक बहुत अच्छी स्थिति सामने आ रही है जो कि छोटे राज्यों के तर्क की बड़ी दमदार मिसाल है। यह राज्य एक ही पार्टी और एक ही मुख्यमंत्री की अगुवाई में लगातार पिछले चौदह बरस में देश में सबसे अधिक तरक्की करने वाले राज्यों में शामिल हुआ है, बहुत से दूसरे राज्यों से बहुत आगे हैं, और इस बार के बजट में उन्हीं तमाम पैमानों पर राज्य को और आगे बढ़ाने की कोशिश दिख रही है। 
मुख्यमंत्री ने इस बात को अच्छी तरह समझा है कि किसी राज्य के विकास के लिए उद्योग और व्यापार जितने महत्वपूर्ण रहते हैं, उतने ही महत्वपूर्ण राज्य के इंसान भी रहते हैं, और उनकी सामाजिक स्थिति, उनका खानपान, उनके बच्चों का पोषण आहार, यह सब भी किसी राज्य की मानव शक्ति को बढ़ाने के लिए बहुत जरूरी होता है। इसलिए इस बार फिर छत्तीसगढ़ का बजट ऐसा दिख रहा है कि उससे राज्य का मानव सूचकांक और ऊपर जा सकेगा, मां और बच्चों की सेहत बेहतर हो सकेगी। लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि राशन पर एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक, अभूतपूर्व रियायत जब मुख्यमंत्री ने तय की थी, तो उन्हीं की सरकार के मंत्री और अफसर इसे सरकार के दीवालिया हो जाने का रास्ता मान रहे थे। लेकिन छत्तीसगढ़ में कुपोषण के मोर्चे पर हालत जितनी सुधरी है, उससे राज्य की उत्पादकता का अब सीधा रिश्ता बना हुआ दिखता है, और इसलिए इस बार भी बजट में जब गरीबों की, ग्रामीणों और आदिवासियों की बेहतरी पर एक जोर दिया गया है, तो उसे राज्य सरकार की सोच की निरंतरता ही माना जाएगा, महज चुनावी लुभावनी योजना नहीं। 
लेकिन हम पिछले कई बरसों से बजट के मौके पर दो बातें उठाते आए हैं। पहली बात तो यह कि राज्य सरकार की योजनाओं पर अमल में खासा बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में चले जाता है। इतने बरसों से इस नौबत को देखते हुए मुख्यमंत्री को यह चाहिए था कि सरकारी भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने, उसकी रोकथाम करने, और उस पर कार्रवाई करने की एजेंसियों को एकदम से मजबूत किया जाता, उनका ढांचा बड़ा किया जाता, और इसकी लागत भ्रष्टाचार में कमी से ही निकल जाती। लेकिन ऐसा कोई क्रांतिकारी कदम मुख्यमंत्री अपने मौजूदा कार्यकाल के इस आखिरी बजट में भी नहीं उठा पाए। दूसरी बात यह कि राज्य में जनता को लूटने और ठगने की साजिशें बड़े पैमाने पर चल रही हैं, और हर बरस छत्तीसगढ़ की जनता के हजारों करोड़ रूपए डूब रहे हैं। अगर प्रदेश में आर्थिक अपराधों पर निगरानी रखने के लिए कोई खुफिया एजेंसी रहती, तो वह लोगों की रकम डूब जाने के पहले ऐसे लोगों की जानकारी पुलिस को दे पाती, और रकम गायब हो जाने के पहले कार्रवाई हो पाती। हम बजट में ऐसी किसी नई एजेंसी की उम्मीद भी कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने पुलिस विभाग के तहत महज एक प्रकोष्ठ बनाने की घोषणा की है, जो कि वित्तीय कंपनियों पर नजर रखेगा। इस मामले में जरूरत पुलिस की तो बाद में आती है, एक खुफिया निगरानी की जरूरत पहले पड़ती है, जो कि बजट या सरकार के नियमित फैसलों में हो नहीं पाया है। 
बजट से परे की बात यह है कि चुनाव के बरस में सत्ता पर बैठे हुए लोग चुनाव का खर्च जुटाने के लिए कई किस्म का भ्रष्टाचार करेंगे, और करीब 10 फीसदी बढ़ा हुआ बजट करीब 10 फीसदी अतिरिक्त भ्रष्टाचार में भी जा सकता है। मुख्यमंत्री को इस बरस के बाकी महीनों में इस हिसाब से भी काम करना चाहिए कि सरकारी बजट की बर्बादी न हो, उसमें लूटपाट न हो, और ऐसा होने पर सत्तारूढ़ पार्टी को चुनावी नुकसान तो झेलना ही पड़ता है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

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