पुराने पेड़ों की फिक्र तो ठीक है लेकिन...

संपादकीय
3 फरवरी 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच सड़क किनारे के दो बहुत पुराने और बहुत विशाल पेड़ों को काटा गया। अब सड़कें चौड़ी हो चली हैं, और कई जगहों पर पेड़, कई जगहों पर मंदिर और मजार ट्रैफिक के आड़े आने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के बाद देश भर में जगह-जगह ऐसे मंदिर-मजार हटाए भी गए हैं, और बहुत सी जगहों पर हटाने का हौसला नहीं जुटा है, और नए धर्मस्थान बनते भी चल रहे हैं। लेकिन आज बात पुराने पेड़ और नए शहर की है। इन दो पेड़ों को काटकर गिराने और हटाने को खबरों में खूब जगह मिली है, और अखबारों ने इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया है कि सैकड़ों बरस पुराने ये पेड़ काट दिए गए, शहर का इतिहास मिटा दिया गया।
पेड़, पत्थर, जंगल, और नदी या तालाब होते ही पुराने हैं। बहुत से मामलों में ये सैकड़ों, हजारों, या लाखों बरस पहले के होते हैं। इन सबके साथ इतिहास जुड़ा होता है। और इतिहास के साथ वर्तमान जुड़े रहता है, वर्तमान के साथ भविष्य जुड़ा होता है। लोगों का यह अफसोस जायज है कि एक बड़ा पीपल या बरगद कितने टन के एसी जितनी ठंडक देता है। लेकिन शहरीकरण के साथ-साथ किसी एक पेड़ से चिपककर रह जाना ठीक नहीं है, खासकर अगर वह पेड़ ऐसा न हो कि जिसके नीचे बुद्ध बैठे हों। शहर का वर्तमान यह कहता है कि अगर आज की जिंदगी के लिए किसी प्रतिमा को किनारे करना हो, किसी पेड़ को काटना हो, किसी मंदिर-मजार को हटाना हो तो उसे न्यायसंगत और तर्कसंगत तरीके से देखना चाहिए। जो पेड़ सड़कों के चौड़े होते-होते सड़कों के बीच आ गए हैं तो उनको हटा देना शहर की बाकी हरियाली के लिए, शहर की बाकी कुदरत के लिए बेहतर बात होगी। ऐसे पेड़ों की वजह से अगर रास्ता जाम होता है, तो वहां पर गाडिय़ों के धुएं से जो प्रदूषण बढ़ता है उसे ऐसे दसियों पेड़ मिलकर भी ठीक नहीं कर सकते। इसलिए पेड़ हों या मंदिर-मजार, जब ये दिक्कत बनने लगें तो इनको हटा देना ठीक है। इंसान के अपने शरीर में भी कई ऐसे मौके आते हैं जब कोई एक दांत अधिक खराब हो जाता है, या उसमें खाना अधिक फंसने लगता है, तो उसे निकालने की नौबत आ जाती है। अगर शरीर के किसी हिस्से में कैंसर हो जाता है तो उससे मोह को छोड़कर उसे काटना भी पड़ता है।
दरअसल धरती, कुदरत, और पर्यावरण बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं होते। अगर शहर में दस-बीस पुराने पेड़ों को काटने से आज की जिंदगी आसान हो सकती है, ट्रैफिक जाम घट सकता है, प्रदूषण कम हो सकता है, तो उन पेड़ों को हटाकर उनकी जगह किसी दूसरे हिस्से में अधिक संख्या में पेड़ लगाए जा सकते हैं। दरअसल हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के वक्त ही ऐसी शहरी योजना बनी थी कि उस वक्त लगाए गए पेड़ काटने की नौबत अब तक नहीं आती है, लेकिन बाद में मनमाने अंदाज में बसाए गए शहरों में बहुत सी चीजों को बदलना पड़ता है, और समय के साथ बदलना कुदरत ही सिखाती है। पहाड़ से उतरती हुई नदी चट्टान से टकराकर अपना सिर नहीं फोड़ लेती, वह चट्टान के दाएं-बाएं से निकलकर बहते हुए आगे बढऩे की समझदारी दिखाती है। पेड़ों की जड़ों को देखें तो वे दीवारों की दरारों के बीच से भी निकल जाती हैं, पानी कहीं दूर होता है, तो वहां तक भी पहुंच जाती हैं। कुदरत किसी एक पेड़ से चिपककर ऐसे रहने की वकालत नहीं करती जिससे नफा कम हो रहा हो, नुकसान अधिक।
यह एक अच्छी बात है कि एक पुराने पेड़ के कटने पर भी लोग उसकी फिक्र कर रहे हैं। लेकिन ये दो पेड़ शहर के बीच थे इसलिए इनकी फिक्र कुछ अधिक हो रही है, ठीक उसी तरह जिस तरह की दिल्ली शहर की छोटी-छोटी बातों पर देश के तथाकथित नेशनल मीडिया की नींद हराम हो जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में ही हम राजधानी रायपुर के आबाद हिस्से के किनारे-किनारे जाकर देखें तो वहां पर हजारों पेड़ों को काटा गया ताकि सड़कों को चौड़ा किया जा सके। अब इन पेड़ों की इतनी फिक्र नहीं हो पाई जितनी कि शहर के बीच के पेड़ों की हुई है। खैर, सुप्रीम कोर्ट ने पेड़ों के काटने पर मुआवजे की शक्ल में कई गुना अधिक पेड़ लगाने की एक शर्त रखी हुई है, और अगर सरकार ईमानदारी से उस हुक्म पर अमल करे, तो धरती पहले से अधिक हरी-भरी भी हो सकती है। हम ऐसे पेड़ों को बचाए और बनाए रखने के हिमायती नहीं हैं जो कि शहरी जिंदगी में सिर्फ दिक्कत और खतरा बन गए हैं, और जिनका ऐतिहासिक महत्व महज उनकी उम्र है जो कि पेड़ों की दुनिया में बड़ी आम उम्र भी है। इसलिए भावनाओं में अधिक डूबने के बजाय मीडिया और समाज के जागरूक लोगों को चाहिए कि यह पता लगाएं कि सुप्रीम कोर्ट मुआवजा-वृक्षारोपण के लिए कड़ी शर्तों के साथ जो सैकड़ों करोड़ रूपए देता है उसमें से कितना हिस्सा निहायत गैर-वृक्षारोपण पर खर्च हो रहा है। (Daily Chhattisgarh)

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