दिल्ली सीएम की बैठक में सीएस पर हमला?

संपादकीय
20 फरवरी 2018


दिल्ली सरकार में वैसे तो अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक लगातार केंद्र सरकार और एक विशेष दर्जे के इस राज्य में अधिक अधिकारों से संपन्न लेफ्टिनेंट गवर्नर के साथ उनका टकराव चलते आ रहा है, लेकिन कल रात जो हुआ वह आजाद हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है। मुख्य सचिव के आरोप के मुताबिक मुख्यमंत्री के घर रात में एक बैठक में उनकी पार्टी के विधायकों ने उनसे न सिर्फ बदसलूकी की, बल्कि उनसे हाथापाई भी की। यह आरोप लगाते हुए राज्य के तमाम आईएएस अफसर हड़ताल पर चले गए, और आम आदमी पार्टी ने इस आरोप को गलत बताया है कि उसके विधायकों ने मुख्य सचिव पर कोई हमला किया। अब इस तनातनी के बीच यह बात उठ रही है कि मुख्यमंत्री-निवास पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच की जाए। मुख्यमंत्री निवास की रिकॉर्डिंग जारी की गई है जिसमें मुख्य सचिव इत्मीनान से निकलकर जाते दिख रहे हैं। इस एक घटना को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग बयान हैं, जिनकी हकीकत अधिक जांच से साबित हो सकेगी, लेकिन एक दूसरा मुद्दा जो सामने है वह यह कि मुख्यमंत्री, मंत्री, या विधायकों के सवालों का जवाब देने से मुख्य सचिव ने मना कर दिया था, और कहा था कि वे केवल लेफ्टिनेंट जनरल के प्रति जवाबदेह हैं, और उन्हें ही रिपोर्ट करेंगे। ऐसा कहा जा रहा है कि इसके बाद वे बैठक से उठकर जाने लगे और सत्तारूढ़ विधायक उन्हें रोकने लगे, तो जो स्थिति बनी उसे मुख्य सचिव ने हाथापाई बताया और उसकी रिपोर्ट की।
दिल्ली सरकार का बुनियादी ढांचा ऐसा है कि वहां के अधिकतर स्थानीय काम निर्वाचित म्युनिसिपलों के मार्फत होते हैं, वहां की पुलिस केंद्र सरकार के मातहत है, वहां शहरी ढांचे के कई बड़े प्रोजेक्ट केंद्र सरकार के तहत आते हैं, और सुप्रीम कोर्ट तक टकराहट पहुंचने पर भी यही स्थापित हुआ है कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार को दूसरे राज्यों की तरह पूरे अधिकार हासिल नहीं हैं। ऐसे में जब केंद्र सरकार और उसके मनोनीत एलजी के साथ राज्य सरकार और उसके मुख्यमंत्री के वैचारिक मतभेद लगातार चलते हों, तो यह एक राज्य की व्यवस्था चलने लायक नौबत नहीं कही जा सकती। यह टकराहट केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन से चली आ रही है, और इसका कोई भी अंत उसी दिन होते दिखता है जब दिल्ली की पूर्ण राज्य के दर्जे की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो। दिक्कत यह है कि जो पार्टी दिल्ली सरकार में रहती है, वह तो यह मांग करती है, लेकिन जब वही पार्टी केंद्र में चली जाती है तो वह दिल्ली पर से अपना काबू छोडऩे के लिए राजी नहीं होती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। इतने टकराव के साथ कोई राज्य काम नहीं कर सकता, और दिल्ली के खास हालात गिनाते हुए उसके हक केंद्र अपने पास बनाए रखे, उसका भी कोई जायज तर्क नहीं बनता। यह कहना कि देश की राजधानी की पुलिस राज्य के काबू में नहीं छोड़ी जा सकती, ठीक नहीं है। केंद्र और दिल्ली में चाहे जिन पार्टियों की सरकारें रहें, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए, और दिया ही जाना चाहिए। फिलहाल कल रात की घटना को लेकर मुख्य सचिव और आम आदमी पार्टी के बयानों में से सच्चाई किसमें है, इसकी जांच के लिए मुख्यमंत्री निवास पर लगे कैमरों की सारी रिकॉर्डिंग जब्त कर लेनी चाहिए। अगर सच में ऐसा हमला हुआ है, तो वह बहुत शर्मनाक बात है, और इसे लेकर न केवल हमलावर विधायकों की तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए, बल्कि उनकी विधानसभा की सदस्यता बर्खास्त भी होनी चाहिए। और अगर यह आरोप झूठा है, तो ऐसी ही कार्रवाई आरोप लगाने वाले अफसर या अफसरों के खिलाफ भी की जानी चाहिए। फिलहाल हम इस मामले की सच्चाई पर दूर बैठकर कोई अटकल लगाना नहीं चाहते, और इसकी ईमानदारी से जांच होनी चाहिए। और आगे ऐसी नौबत न आए उसके लिए फिलहाल कड़ी कार्रवाई के साथ-साथ आगे के लिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भी देना चाहिए। यह भी हैरानी की बात है कि आमतौर पर बड़बोले रहने वाले केजरीवाल इतने गंभीर आरोपों के कई घंटे बाद भी चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि हालात का तकाजा है कि वे अपने घर की, अपनी बुलाई हुई बैठक पर लगाए गए इतने गंभीर आरोपों पर तुरंत सामने आकर सब कुछ साफ करें। (Daily Chhattisgarh)

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