संपादकीय
11 फरवरी 2018

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अबूधाबी में पहले हिन्दू मंदिर का शिलान्यास किया है। यह मंदिर स्वामीनारायण सम्प्रदाय बना रहा है जिसके इसी तरह के बड़े-बड़े मंदिर गुजरात, दिल्ली, और कुछ दूसरे देशों में भी हैं। जाहिर है कि इस सम्प्रदाय को दान में मिलने वाली रकम बड़ी होती होगी, और इसी वजह से बड़ी लागत वाला यह मंदिर बन रहा है जिसे एक खबर में हजार करोड़ रूपए लागत का बताया जा रहा है।
जैसा कि सभी धर्म और सम्प्रदाय दावा करते हैं कि वे समाज के भले के लिए काम करते हैं, तो ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि इतने महंगे धर्मस्थान बनाने के बजाय क्या वह सम्प्रदाय इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल सीधे-सीधे जनता के काम आने वाले किसी अस्पताल के लिए नहीं कर सकता था? जिस हिन्दुस्तान से स्वामीनारायण सम्प्रदाय शुरू हुआ है, उसी हिन्दुस्तान में कुपोषण, गरीबी, और बीमारी का इतना बुरा हाल है, फुटपाथों पर लोग मर जाते हैं, उनके पास सर्दी में सिर छुपाने को जगह नहीं है, और धर्म-सम्प्रदाय इस तरह का बड़ा खर्च करते हैं। धर्म से जुड़े लोगों का एक तर्क यह भी रहता है कि दानदाता धर्मस्थान के लिए तो दान देने के लिए तैयार हो जाते हैं, वे किसी अस्पताल के लिए उतनी आसानी से दान नहीं देते।
अब सवाल यह उठता है कि जिस ईश्वर को सर्वत्र मौजूद, सर्वज्ञ, और सर्वशक्तिमान माना जाता है, वह ईश्वर भी अगर अपने भक्तों और अपने एजेंटों को अपने ही बनाए हुए इंसानों की बेहतरी के रास्ते पर नहीं चला सकता, तो फिर उसकी ताकत क्या है? वह किस तरह सबका भला करने वाला कहा जा सकता है? फिर बड़े-बड़े रिकॉर्ड बनाने वाले धर्मस्थान और स्मारक बनाना लोगों को अपनी शान के लिए भी ठीक लगता है, और सम्प्रदायों को भी, संगठनों को भी। गुजरात में साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक की लागत से सरदार पटेल की प्रतिमा बन रही है, महाराष्ट्र में इसी किस्म की लागत से शिवाजी की प्रतिमा बनाई जा रही है। मध्यप्रदेश आदि शंकराचार्य की प्रतिमा बनाने में जुट गया है, और उत्तरप्रदेश में भगवा सरकार सौ मीटर ऊंची राम की प्रतिमा बनाने जा रही है। एक गरीब देश जहां पर लोग बेरोजगार हैं, जहां सरकारी रियायती अनाज के बिना लोग भूखे मर जाएं, जहां पर अस्पतालों से लेकर जेल तक अपनी क्षमता से कई गुना अधिक लोगों से जूझ रहे हैं, वहां पर इस तरह का विकराल और दानवाकार खर्च बेदिमागी का काम है, चाहे वह किसी धर्म या संगठन के लोग करें, चाहे किसी जाति के लोग करें। और यह एक जुर्म सरीखा काम है, अगर यह जनता के पैसों से सरकारें कर रही हों।
जो लोग अपने आपको दुनिया के भले का काम करने वाले मानते हैं, या ऐसा दावा करते हैं, उन्हें ऐसी भयानक फिजूलखर्ची से बचना चाहिए। किसी भी ईश्वर, गुरू, या नेता का सम्मान उसके मानने वाले भक्तों और अनुयायियों के कामकाज से ही होता है। और समाज में भूख और बीमारी को देखते हुए जो लोग ऐसे राजसी खर्च करते हैं, वे ऐसे सम्मान को घटाते ही हैं। सैकड़ों बरस पहले जब कोई लोकतंत्र नहीं था, उस वक्त दुनिया भर में जहां कहीं भी राजाओं ने ऐसे महंगे धर्मस्थल बनवाए, तो उस वक्त उनकी कोई लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं थी। लेकिन आज जब दुनिया में एक सभ्य लोकतंत्र राज कर रहा है, तब हर किसी से पूछा जाना चाहिए कि भूखों के समंदर के बीच, बीमारों के समंदर के बीच, एक टापू सरीखे महल में क्या उनका ईश्वर सचमुच ही इतना खुश रह पाता है? हमारा तो यह भी मानना है कि दुनिया में जहां भी लोकतंत्र है, वहां सरकारों को धर्मस्थानों की व्यवस्था इस तरह करनी चाहिए कि उनकी कमाई का अधिकतम इस्तेमाल सीधे जनकल्याण के कामों पर हो। फिलहाल शायद हजार करोड़ की लागत से बनने वाले स्वामीनारायण सम्प्रदाय के इस मंदिर के शिलान्यास के मौके पर इस सम्प्रदाय से यह पूछना चाहिए कि जनकल्याण पर उसका कितना खर्च होता है? और यह सवाल बाकी धर्मों और बाकी सम्प्रदायों से भी पूछना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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