संपादकीय
21 फरवरी 2018

केरल की एक मलयालम फिल्म के कुछ सेकेंड के एक सीन से दुनिया भर में छा गई एक अभिनेत्री प्रिया प्रकाश और फिल्म के खिलाफ भारत में जगह-जगह मुस्लिम समाज के कुछ लोगों ने रिपोर्ट लिखाना शुरू किया कि इस गाने में मोहम्मद पैगंबर का अपमान हुआ है। ऐसी रिपोर्ट देश भर में बिखरे हुए इतनी अलग-अलग जगहों पर की गई कि इन लोगों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई कि अलग-अलग राज्यों की ऐसी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट भी एक साथ सुने। इस पर अदालत ने राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि फिल्म में यह गाना गाते हुए दिखने वाली इस अभिनेत्री और फिल्म के निर्देशक के खिलाफ अब इसे लेकर और कहीं एफआईआर दर्ज न की जाए। फिल्म के डायरेक्टर का कहना है कि केरल का मुस्लिम समुदाय 40 बरस से इस गाने को गाते आ रहा है, और यह शादी के जलसों में गाया जाने वाला एक बेहद आम गाना है, इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है। लोगों को याद होगा कि अभी-अभी इस फिल्म के गाने में यह अभिनेत्री एक स्कूली छात्रा के किरदार में आंख मारते दिखती है, और कुछ सेकेंड का वह हिस्सा दुनिया भर में सबसे तेजी से मशहूर होने वाला वीडियो क्लिप बन चुका है। ऐसी चर्चा में आने के बाद इस तरह की फिल्मों खिलाफ अदालत तक दौड़ लगाने की कई वजहें हो सकती हैं, इनमें से एक वजह यह हो सकती है कि ऐसी पिटीशन लगाकर लोग खुद खबरों में आना चाहते हैं, एक दूसरी वजह यह हो सकती है कि फिल्म के निर्माता ही फिल्म को खबरों में बनाए रखने के लिए किसी से ऐसी पिटीशन लगवाएं, लेकिन इनके अलावा और भी वजहें हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आज ही पीएनबी घोटाले को लेकर दायर की गई एक पब्लिक इंटरेस्ट पिटीशन को देखकर कहा है कि यह पब्लिक इंटरेस्ट नहीं, पब्लिसिटी इंटरेस्ट पिटीशन दिख रही है। अदालत के इस रूख के अलग-अलग कम से कम दो किस्म के असर हो सकते हैं। पहला तो यह कि जनहित याचिका लेकर लोग अदालत तक कम जाएं, और जनहित के मुद्दे ऐसे में छूट भी सकते हैं। दूसरा असर यह हो सकता है कि जो लोग किसी बदनीयत को पीआईएल की खाल पहनाकर अदालत का वक्त खराब करते हैं, वैसे लोगों का हौसला पस्त भी हो सकता है। इस मलयालम फिल्म को लेकर दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि कोई मासूम सी हरकत किस तरह लोगों को छू सकती है, मशहूर हो सकती है। और दूसरी बात यह कि लोगों का बर्दाश्त कितना कम हो चला है कि मोहम्मद पैगंबर के लिए जो गाना दशकों से गाया जा रहा है, वह आज लोगों को अपमानजनक लगने लगा है, या लोग कम से कम ऐसा कह रहे हैं। जब देश भर में अलग-अलग जगह सैकड़ों या हजारों अदालतों में किसी मुद्दे को लेकर रिपोर्ट लिखाई जा सकती है, तो ऐसे में उसके खिलाफ किसी तरह की राहत महज सुप्रीम कोर्ट से ही मिल सकती है। फिल्म उद्योग से जुड़े हुए संपन्न लोग तो ऐसी दौड़ लगा सकते हैं, लेकिन अगर यह सोचें कि किसी छोटे अखबार या किसी छोटे लेखक के खिलाफ इसी तरह का अभियान धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता के तहत छेड़ दिया जाए, तो वैसे लोग तो सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने की ताकत भी नहीं रखते जहां आने-जाने का खर्च ही बहुत होता है, और वकीलों की फीस भी भारी-भरकम होती है। इसलिए लोकतंत्र में ऐसी मुकदमेबाजी के मुकाबले बेहतर नौबत तो यह रहती कि लोग कुछ तो अपना बर्दाश्त बढ़ाते, और कुछ ऐसा सामाजिक रास्ता भी निकलता जो कि मुकदमेबाजी से नीचे लोगों के टकराव को सुलझा सके। लोकतंत्र में जहां हर किसी को अदालत तक दौड़ लगाने की आजादी है, वहां पर हमारी यह बात कागजी अधिक लगेगी, लेकिन जिंदगी और दुनिया को बेहतर बनाने वाली हर सूझबूझ शुरूआत में कागजी ही लगती है, शायद कागजी ही रहती है। (Daily Chhattisgarh)

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