सैनिटरी पैड पर टैक्स एक नाजायज फैसला

संपादकीय
9 फरवरी 2018


महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सैनिटरी पैड पर 12 फीसदी जीएसटी के सवाल पर कहा कि पहले इस पर 18 फीसदी टैक्स था जिसे 12 फीसदी किया गया है जो सही है। उन्होंने कहा कि अभी सैनिटरी पैड की मार्केट में ज्यादातर मल्टीनैशनल कंपनियां हैं, टैक्स कम करने से उनका कब्जा ही ज्यादा हो जाएगा। जो छोटे ग्रुप सैनिटरी पैड बनाते हैं वह टैक्स के दायरे में नहीं आते हैं। 
मेनका गांधी के इस बयान की जटिलता को समझने की जरूरत है। किसी भी लड़की या महिला को सम्मान के साथ जीने के लिए उसकी माहवारी के दिनों में सैनिटरी पैड एक जरूरी सामान है जो कि किसी मरीज के लिए जान बचाने वाली दवाई की तरह होता है, या स्कूल जाने वाले आम बच्चे के लिए पढ़ाई की किताब-कॉपी जैसा होता है। इस सामान को टैक्स के दायरे में लाना प्रतीक के रूप में भी बहुत गलत बात है, क्योंकि आज केन्द्र सरकार बेटी बचाओ के नारे को अपना झंडा बनाकर चल रही है, और उसी बेटी के लिए जो सबसे जरूरी सामानों में से एक है उस पर टैक्स लगा रही है। अब इस बयान और मुद्दे को हमने जटिल इसलिए कहा है कि अगर मेनका गांधी का कहना सही है और इसे टैक्समुक्त करने पर मल्टीनैशनल कंपनियों को ही मुनाफा होगा, वे बाजार पर अपनी पकड़ इतनी बढ़ा लेंगी कि नए छोटे समूहों को पैर टिकाने की संभावना भी नहीं बचेगी, तो बाजार के इन तौर-तरीकों को समझने की जरूरत है, और हो सकता है कि बड़ी कंपनियों के बनाए सिनेटरी नैपकिन पर टैक्स लगाना समझदारी की बात हो। लेकिन साथ-साथ यह भी देखने की जरूरत है कि बड़े और महंगे ब्रांड का क्या कोई सस्ता या स्थानीय विकल्प बाजार में मौजूद है? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि बाजार में छोटी कंपनियों या एनजीओ के बनाए हुए सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध ही न हों, और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार कायम हो, और वह भी टैक्समुक्त न हो।
जब हम कहते हैं कि एक प्रतीक के रूप में भी यह सामान टैक्समुक्त होना चाहिए, तो उसका मकसद महिलाओं के मुद्दों को महत्व देना है। केन्द्र सरकार ने पिछले दिनों एक अच्छा काम किया है जो कि गर्भवती महिला कर्मचारियों को प्रसूति के वक्त मिलने वाले अवकाश को बढ़ाकर छह महीने कर दिया है। यह फैसला पहली नजर में महिलाओं के हक का लगता है। लेकिन बाजार की हकीकत अगर देखें, तो इससे एक खतरा भी खड़ा होता है कि क्या रोजगार देने वाले लोग इस वजह से महिला कर्मचारियों को काम पर रखने से कतराने तो नहीं लगेंगे? जिस तरह किसी सामान को लेकर बाजार की हकीकत को देखना होता है, उसी तरह रोजगार को लेकर भी इसे देखने की जरूरत होती है। सरकार तो एक कमरे के भीतर बैठकर टैक्स का रेट तय कर लेती है, कर्मचारियों या मजदूरों के हक के नियम तय कर लेती है, लेकिन उन पर अमल के समय असल दिक्कत आकर खड़ी होती है, और ऐसे में कई बार सरकारों को नियमों में, टैक्स में बार-बार फेरबदल भी करना पड़ता है। 
हम फिर शुरुआती मुद्दे पर लौटें, तो आज देश में सेनेटरी नैपकिन को बनाने के लिए कुटीर उद्योग जैसी छोटी यूनिट को बढ़ावा देने की जरूरत है, और इसके लिए छोटी मशीनें, कच्चे माल, और सरकारी खरीदी में बढ़ावा देने की भी। आज भी देश में हैंडलूम उद्योग काफी हद तक सरकारी खरीदी पर जिंदा रहता है, और इसी तरह सरकार, केन्द्र और राज्य सरकारें दोनों ही, गरीब लड़कियों और महिलाओं को रियायती दर पर या मुफ्त इस जरूरी सामान को देने का इंतजाम कर सकती हैं, और इसके लिए छोटी इकाईयों से खरीदी कर सकती है। जब तक ऐसी छोटी इकाईयों का उत्पादन इतना नहीं बढ़ जाता कि उससे गरीब और मध्यम वर्ग की जरूरत पूरी हो सके, तब तक बड़ी कंपनियों के मुनाफे को भी अनदेखा करते हुए इसे टैक्स फ्री करने के तरीकों को देखना चाहिए। अब सरकार संपन्न तबके को टैक्स लगाने, या इन कंपनियों से टैक्स वसूलने का कोई दूसरा जरिया ढूंढे, लेकिन इस सामान पर टैक्स हटाना चाहिए। जब बाजार में सस्ता सामान आ जाए, तभी बड़ी कंपनियों को मुकाबले से बाहर रखने के लिए उन पर टैक्स लगाना जायज होगा। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

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