एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन

संपादकीय
17 फरवरी 2018


उत्तरप्रदेश में पुलिस ने घोषित और संदिग्ध मुजरिमों पर हमला बोला है, और पिछले महीने-दो महीने में 40 लोगों को मुठभेड़ में मार डाला। अब वहां हालत यह है कि जिन लोगों के खिलाफ कुछ मुकदमे चल रहे हैं, वे लोग तख्तियां लेकर घूम रहे हैं कि वे सुधर जाएंगे, उन्हें न मारा जाए। यह पूरा नजारा महाराष्ट्र में कई साल पहले के एक दौर की याद दिलाता है जब वहां माफिया किस्म के संगठित अपराध करने वाले मुजरिमों को पुलिस एनकाऊंटर में मारती थी और ऐसा करने वाले अफसरों के किरदार पर फिल्में भी बनी थीं। अब तक 56 जैसे नाम वाली फिल्म में जिस असली पुलिस अफसर पर किरदार बनाया गया था, उसे बाद में जमीन के धंधे में माफिया अंदाज में शामिल हो जाने के जुर्म में पकड़ा भी गया था, और सरकार को उसे हटाना पड़ा था। वह बात तो पुरानी हो गई लेकिन अभी हाल ही में फिलीपींस में वहां के राष्ट्रपति ने नशे का कारोबार करने के शक से घिरे हुए लोगों को मारने का हुक्म दिया, और सड़कों पर पुलिस ने इस कदर खूनखराबा किया कि वहां सरकार के मुताबिक 4 हजार और विदेशी जांच समूहों के मुताबिक 14 हजार से अधिक लोगों को पिछले एक बरस से कम समय में सड़कों पर ही मार दिया गया। 
जैसा कि हमने मुंबई की फिल्म का जिक्र किया है, सड़क और फुटपाथ पर तेज रफ्तार इंसाफ का यह सिलसिला किसी फिल्म की तरह ही दिलचस्प लगता है, और लोग इसे देखकर वाहवाही भी करते हैं, तालियां भी बजाते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक वक्त उत्तर-पूर्व में मिजोरम रहा हो, या कि बाद के बरसों में आतंक के दिनों का पंजाब रहा हो, या छत्तीसगढ़ का बस्तर रहा हो, जहां कहीं भी वर्दीधारी फौज या पुलिस को ऐसी खुली छूट मिलती है, वह ज्यादती पर उतर ही आती है। और धीरे-धीरे खुद इंसाफ करने और खुद ही सजा दे देने की बददिमागी उसी तरह वर्दी के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है जिस तरह की आज बस्तर में नक्सली जनसुनवाई में किसी को भी पुलिस का मुखबिर करार देते हैं, और मौके पर ही उसका गला रेत देते हैं। सड़क पर इंसाफ का यह सिलसिला बहुत से लोगों को इसलिए भी सुहाता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अदालतों में फैसला होने में जिंदगी गुजर जाती है, और फिर भी दस में से नौ मामलों में गुनहगार छूट भी जाते हैं। इसीलिए एक वक्त था कि मुंबई का एक माफिया डॉन, हाजी मस्तान अपने घर पर सुनवाई करता था, और लोग वहां पर रहम और इंसाफ की भीख मांगते पहुंचते थे, और माफिया की बंदूकों से इंसाफ तय कर दिया जाता था। 
उत्तरप्रदेश में जो हो रहा है, वह लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है। लोकतंत्र एक लचीली और खर्चीली, और खासी धीमी प्रक्रिया है जिसमें कोई शॉर्टकट नहीं रहते। लोकतंत्र में हर मुजरिम को सजा भी नहीं मिल पाती क्योंकि अदालतों में उनके गुनाह साबित नहीं हो पाते। ऐसे में सड़क पर इंसाफ और मुठभेड़-हत्या एक बड़ा लुभावना विकल्प लग सकता है, लेकिन तभी तक जब तक कि ऐसी पुलिस की बंदूकों का निशाना दूसरों की तरफ हो। जिस दिन ऐसी बंदूकें किसी बेकसूर की तरफ तन जाएं, उस दिन उस बेकसूर और उसके कुनबे को ताली बजाना भूल जाएगा। हैरानी की बात यह है कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार का यह बहुप्रचारित और स्वघोषित कारनामा न तो वहां के मानवाधिकार आयोग का ध्यान खींच रहा है, न ही उत्तरप्रदेश की लंबी-चौड़ी हाईकोर्ट इसका नोटिस ले रही है, और न ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस पर कुछ बोल रहा है। और तो और, उत्तर भारत के इस भयानक खूनी सिलसिले को लेकर दिल्ली में बसा राष्ट्रीय कहलाने वाला मीडिया भी कुछ नहीं कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह लोकतंत्र थका हुआ है, इसके पैरों में अब इंसाफ के लंबे सफर की ताकत बची नहीं है, या फिर जो छोटे-छोटे मुजरिम मारे जा रहे हैं, उनका कोई महत्व नहीं है। हमारा ऐसा ख्याल है कि मारे गए इन 40 मुजरिमों ने कुल मिलाकर कुछ करोड़ रूपए का ही कोई अपराध किया होगा जिससे 11 हजार करोड़ अधिक का अपराध करके एक हीरा कारोबारी देश छोड़कर जा चुका है। इस लोकतंत्र में जिंदा रहने के लिए, और जेल से बचने, देश छोडऩे के लिए बड़ा मुजरिम होना जरूरी है, छोटे मुजरिम को इसी तरह सड़क पर मार दिया जाएगा, और उसकी गिनती को जोड़कर एक और फिल्म बन जाएगी, अब तक सत्तावन। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें