देखें, क्या कोई ऐसी पहल करते हैं?

12 फरवरी  2018

जिंदगी में कई बार ऐसी दुविधा आ खड़ी होती है कि सही क्या होगा, और गलत क्या, यह तय करना आसान नहीं रह जाता। गाडिय़ों के धुएं से भरे हुए चौराहों पर लालबत्ती की कतार में भीख मांगते लोगों को भीख दी जाए या न दी जाए, यह तय कर पाना कुछ मुश्किल हो रहा था कि फिर पढऩे में आया कि भारत के सड़क कानून में इस बात पर अब बड़ा जुर्माना लगाया गया है कि अगर आप चौराहों पर लोगों को भीख देते हैं। इस कानून के बाद अब यह दुविधा तो खत्म हो गई, और यह लगा कि भाड़े पर दुधमुंहे बच्चों को लाकर उन्हें पोटली में टांगकर धुएं के बीच भीख मांगने का धंधा शायद कुछ कम होगा।
लेकिन भीख मांगने का कारोबार तकरीबन हर जगह यह सवाल खड़े करता है कि क्या इसकी इजाजत दी जाए? जब एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री बरसों पहले वामपंथी राज वाले बंगाल में आए थे, तो उन्हें राजधानी कोलकाता एक बेहतर शहर लगे, इसलिए उस शहर से सारे भिखारी बाहर कर दिए गए थे, और बेघर लोगों को भी फुटपाथों से हटाकर बाहर निकाल दिया गया था। अभी कुछ महीने पहले जब अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की बेटी एक कारोबारी सेमीनार में हैदराबाद आई, तो उस वक्त भी हैदराबाद शहर को साफ और भिखारीमुक्त दिखाने के लिए पुलिस ने गाडिय़ों में भरकर भिखारियों को बाहर निकाल दिया था।
मेरे सामने इन दिनों यह दुविधा रोज सुबह आकर खड़ी होती है जब अपने शहर के सबसे बड़े तालाब के इर्द-गिर्द के साफ-सुथरे घेरे पर सुबह की सैर के दौरान भीख मांगते बहुत ही छोटे-छोटे बच्चे दिखते हैं। इनका डेरा उस जगह पर रहता है जहां पर मछलियों को आटा या डबलरोटी खिलाने के लिए संपन्न लोगों की भीड़ लगी रहती है, और हर सुबह कई सौ पैकेट ब्रेड सौ-दो सौ फीट के एक किनारे पर ही पानी में जाते दिखती है। चूंकि इसी जगह लोग घर से लाई चाय पीते भी बैठते हैं, वहीं पर डबलरोटी खरीदकर मछलियों को डालते हैं, इसलिए इसी जगह कुछ परिवारों के दर्जन भर से अधिक बच्चे पूरे वक्त ब्रेड मांगते खड़े रहते हैं। दया रखने वाले लोग इन बच्चों को डबलरोटी भी दे देते हैं, बिस्किट के पैकेट भी खरीद देते हैं, और सफाई के राष्ट्रीय अभियान की तस्वीरें खिंचवाने के लिए कुछ मिनटों की फोटोग्राफी के लिए जुटे हुए बैंकों के कर्मचारी भी अपने लिए लाए फूड-पैकेट इन बच्चों को दे देते हैं। नतीजा यह निकलता है कि इस जरा सी जगह पर बिना किसी मेहनत के ये छोटे बच्चे अपने लिए और अपने परिवार के लिए दिन भर का खाना जुटा लेते हैं। बच्चों को कमाऊ बनाकर उनके दम पर बिना काम किए बैठे रहने वाले मां-बाप की समझ शायद इतनी नहीं है कि वे अपने बच्चों को पेट भरने का रास्ता तो दिखा रहे हैं, लेकिन उनके आगे बढऩे की संभावनाएं खत्म करके वे अपना खुद का पेट भी भर रहे हैं।
अब इस नौबत में मन में दो सवाल उठते हैं, कि क्या बिना कोई काम करते, बीड़ी-सिगरेट पीते बैठे इन बच्चों के बाप को इसी तरह जिम्मेदारी से आजाद रखा जाए, और नंगे घूमते छोटे-छोटे बच्चों को कमाऊ संतान बने रहने दिया जाए? या फिर इस नौबत में दखल देकर इन परिवारों को यहां से बेदखल किया जाए ताकि उनके मां-बाप भी अपनी जिम्मेदारी समझ सकें, पूरी कर सकें, और ये बच्चे भी कुछ काम करके कमाना सीखें? फिर यह भी लगता है कि यहां कम से कम इन बच्चों को भरपेट खाना मिल जाता है जो कि किसी और जगह मांगी गई भीख के मुकाबले शायद अधिक पौष्टिक भी होता होगा। तो क्या उन्हें ऐसा खाना पाने के मौके से हटाकर उनका कोई भला हो सकता है? या फिर क्या यह सिलसिला जारी रखने से उनका कोई भला हो सकता है?
इस तरह के बहुत से सवाल हर सुबह घेरते हैं, पीछा करते हैं, और सोचने पर मजबूर करते हैं। इस साफ-सुथरी जगह पर ये बच्चे, और उनके मां-बाप भी, गंदगी से दूर हैं, भूख और कुपोषण से दूर हैं, यह बात तो है, लेकिन साथ-साथ यह बात भी है कि ये एक बेहतर भविष्य की संभावनाओं से भी दूर हैं। यही काम करते रहने से ये बच्चे आगे चलकर कुछ बेहतर शायद नहीं कर पाएंगे, और दूसरी तरफ यह भी है कि मेरी नजरों से दूर, ऐसी सार्वजनिक जगह से दूर भी हो सकता है कि ये बच्चे किसी गंदी बस्ती में इसी तरह जीते हों, और शायद इतना खाना भी न पाते हों।
यह सोचते-सोचते और इस तरह की कुछ दूसरी जगहों को, कुछ दूसरे लोगों को देखते हुए यह लगता है कि क्या सरकार और समाज की जिम्मेदारी मछलियों, कुत्तों, और गायों के साथ-साथ उनके हिस्से के कुछ खाने को ऐसे बेघर गरीबों को दे देने से पूरी हो जाती है? क्या इनके लिए संगठित रूप से कुछ किया जा सकता है? या फिर सरकार की आज भी ऐसी योजनाएं हैं जिनमें इन लोगों के लिए रोटी, कपड़ा, और मकान का इंतजाम हो सकता है? क्या इन बच्चों को मां-बाप से दूर करके किसी बेहतर माहौल में रखना बेहतर होगा? इनके मां-बाप को किस तरह किसी काम में लगाया जा सकता है? क्या सरकार इस तरह के बिखरे हुए लोगों के लिए कोई संगठित कोशिश कर सकती है, या फिर भारत सरीखे देश में यही ढीली-ढाली नौबत ही जारी रहेगी?
बच्चों के आज, और उनके कल, इन दोनों को अलग-अलग देखें तो उनका भला दो अलग-अलग बातों में दिखता है। और इन दोनों के बीच उनके लिए क्या कुछ छांटा जा सकता है, यह तय कर पाना आसान नहीं होता है। फिर यह भी लगता है कि तालाब की मछलियां, जो कि तालाब की ही काई या पानी के पौधों को खाकर मजे में रह सकती हैं, क्या उन्हें हर दिन एक-दो क्विंटल डबलरोटी खिलाना समझदारी की बात है? क्या इससे मछलियों का सचमुच कोई भला होता है, या फिर ऐसा करके लोगों को ही मन की तसल्ली मिलती है, मछलियों को कुछ नहीं मिलता? क्या कोई ऐसी कोशिश हो सकती है कि मछलियों के नाम पर जिन संपन्न लोगों की जेब से हर दिन पचीस-पचास रूपए निकलते हैं, क्या उन सबको जोड़कर कुछ ऐसा हो सकता है कि इसी जगह पर बेघर बच्चों को बिठाकर महज उन्हें खिला दिया जाए, न कि दूर बैठे उनके मां-बाप को खिलाने के लिए इन बच्चों के हाथ में डबलरोटी थमाई जाए?
यह बात तय है कि सरकार या समाज, इनके भीतर अगर सरोकार की नीयत से कोई पहल या कोशिश होती है, तो उसमें कई लोगों को जोड़ा जा सकता है, कई लोग खुद होकर भी देश भर में जगह-जगह ऐसी पहल करते हैं जो कि कामयाब भी होती है। ऐसा लगता है कि जो लोग अपने मन की तसल्ली के लिए मछलियों को महंगी डबलरोटी खिलाने का निहायत गैरजरूरी काम करते हैं, उन लोगों की दया को किसी बेहतर दिशा में मोड़ा जा सकता है, किसी बेहतर मकसद के लिए उसका इस्तेमाल किया जा सकता है, और उन्हें तसल्ली का अहसास भी कराया जा सकता है। जगह-जगह एक अकेले चने ने भाड़ फोडऩे की कोशिश की, और कामयाब भी हुए। मेरे ही अपने शहर में एक-दो नौजवानों ने बढ़ते कदम नाम की एक संस्था बनाई थी जो कि संस्था कम थी, अभियान अधिक थी। उसने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार का काम शुरू किया, और लोगों को मेडिकल कॉलेज को देहदान करने के लिए प्रेरित भी किया। धीरे-धीरे यह संस्था बिना किसी कमाई के, बहुत से लोगों को अपने साथ जोड़ पाई है, और बहुत सा काम कर पाई है। उसकी कामयाबी लगातार जारी है, और नए-नए दायरों में बढ़ती भी जा रही है।
मछलियों और गरीब बच्चों के बीच जरूरत के आधार पर कोई ऐसी पहल करने की जरूरत है जिससे सुबह सैर पर जाने वाले हजारों करोड़पतियों में से कुछ को जोड़ा भी जा सके। देखें, क्या कोई ऐसी पहल करते हैं? (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें