संपादकीय
15 फरवरी 2018

छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी अपना इस कार्यकाल का आखिरी बजट पेश किया है और उसने शहरों के विकास और लोक निर्माण विभाग के काम के लिए हजारों करोड़ रूपए रखे हैं। इसके अधिक आंकड़ों में जाना आज का मकसद नहीं है, और यह समझने की जरूरत है कि ऐसे हजारों करोड़ रूपए के खर्च में कहां-कहां किफायत की गुंजाइश है। यह बात इसलिए जरूरी है कि सरकार के पास चाहे शहरों को सुविधापूर्ण और सुंदर बनाने के लिए हजारों करोड़ रूपए हों, और बाकी निर्माण कार्यों के लिए और हजारों करोड़ रूपए हों, इनके साथ-साथ यह हकीकत भी जुड़ी हुई है कि प्रदेश की करीब आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और एक-दो रूपए किलो चावल मिलने पर वह तीन वक्त पेट भर पाती है। इसलिए ऐसे गरीब राज्य, या कि ऐसे गरीबों वाले राज्य के खर्च को बहुत चौकन्नेपन के साथ करने की जरूरत है।
हम एक छोटी सी मिसाल को लेकर बात करना चाहते हैं, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की। चूंकि यह पूरे प्रदेश का केन्द्र है, इसलिए स्थानीय म्युनिसिपल के अलावा राज्य सरकार भी यहां पर म्युनिसिपल-सीमा में सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च करती है। ऐसे में जाहिर है कि राजधानी के कई तरह के कामकाज अतिसंपन्नता के शिकार हैं। बहुत से काम यहां इसलिए हो रहे हैं कि यहां पर शहर को स्मार्ट सिटी बनाने का काम भी चल रहा है, जिस पर और सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं। यहां आए दिन दिखता है कि सड़कों के किनारे करोड़ों रूपए खर्च करके बनाए जाते हैं, सड़कों के बीच कांक्रीट के डिवाइडर बनाए जाते हैं, और फिर कुछ महीनों के भीतर ही इनमें से कई हिस्से तोड़कर या तो केबल बिछाई जाती है, या फिर कोई पाईप लाईन डाली जाती है, या डामर की सड़क को हटाकर कांक्रीट की सड़क बनाई जाती है, और उसके ऊपर फिर दुबारा डामर की सड़क बन जाती है।
यह राज्य चूंकि आर्थिक रूप से संपन्न राज्य है, इसलिए इस बात का अहसास नहीं हो पाता कि फिजूलखर्ची और बर्बादी कितनी अधिक हो रही है। चूंकि इस राज्य में बरसों से सूखा नहीं पड़ा, चूंकि सरकार के ऊपर किसी और किस्म की कुदरती मुसीबत नहीं आई, इसलिए सरकार के पास हर काम के लिए बहुत सा पैसा दिखता है। लेकिन शहर पर खर्च करने के लिए अगर सरकार के पास बहुत पैसा है भी, तो भी उसे किफायत के साथ खर्च करना चाहिए, क्योंकि एक बार खर्च में लापरवाही की आदत अगर पड़ जाती है, तो पैसा चले जाता है, वह आदत रह जाती है। राज्य सरकार अगर अपने रायपुर जैसे शहर का एक ऑडिट करवाए कि किस खर्च के बाद कितने दिनों में उसे बर्बाद करके, उसे मिटाकर, तोड़कर दुबारा उस जगह पर खर्च किया गया तो इन 14 बरसों में अकेले रायपुर शहर में ऐसी सैकड़ों करोड़ की फिजूलखर्ची और बर्बादी निकल जाएगी। हम अपने आसपास चारों तरफ आए दिन सरकारी कांक्रीट की तोडफ़ोड़, फिर उसके ढेर, और फिर वहां पर दुबारा काम देख-देखकर थक गए हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि वह सरकार के बाहर की किसी ऐसी निगरानी एजेंसी की मदद ले जो कि इस बात की शिनाख्त कर सके कि कौन-कौन सी बर्बादी टाली जा सकती थी, टाली जानी चाहिए थी, लेकिन वैसा हो नहीं पाया। अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल न होने से, या कि किसी एक विभाग के भीतर भी तालमेल न होने से ऐसी बर्बादी हो रही है। इस सरकार का कार्यकाल अब अधिक लंबा नहीं बचा है, लेकिन अच्छी परंपराएं शुरू करने के लिए कोई भी वक्त बुरा नहीं होता, और कोई भी काम लेट नहीं होता।
छत्तीसगढ़ सरकार को अपने कामकाज में बेहतर समन्वय की, एक चौकन्नी ऑडिट की जरूरत है, और इससे प्रदेश भर में हजारों करोड़ रूपए बचेंगे, जिससे कि अधिक जरूरत के कई काम हो सकेंगे। (Daily Chhattisgarh)

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