सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी आइसिंग तले दबे केक सरीखी

संपादकीय
12 फरवरी 2018


सुबह हरियाणा के मुख्यमंत्री की यह मुनादी सामने आई है कि वहां हुए जाट आंदोलन के दौरान जितनी हिंसा और तोडफ़ोड़ हुई थी, उसे लेकर जाटों पर जितने मामले दर्ज हुए थे वे सभी वापिस लिए जाएंगे, और उस आंदोलन को लेकर कोई केस नहीं चलेगा। यह याद रखने की बात है कि इसी आंदोलन के दौरान हरियाणा की सड़क पर कार रोककर एक परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था, जिसे सरकार लंबे समय तक नकारती रही, और फिर अदालती दखल से उस मामले में जांच हुई। यह भी याद रखने की जरूरत है कि अदालत ने यह पाया था कि हरियाणा पुलिस इस पूरे आंदोलन के दौरान चुपचाप बैठी रही, और उसने जिम्मेदारी पूरी नहीं की। लेकिन आज सुबह हरियाणा से खासे दूर कर्नाटक की एक रिपोर्ट एक टीवी चैनल पर आ रही थी कि किस तरह वहां के भाजपा नेता, और शायद दूसरी पार्टियों के नेता भी आने वाले चुनाव को देखते हुए झोपड़पट्टियों में जाकर रात गुजार रहे हैं और गरीब वोटों को बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। 
भारत की राजनीति को देखें तो इसने लोकतंत्र को बाकी हिस्सों को ढांक सा लिया है। लोकतंत्र में सत्ता पर आने वाली पार्टी की पहली और बुनियादी जिम्मेदारी सरकार चलाने की होती है जो कि पांच साल के कार्यकाल को देखते हुए होनी चाहिए। लेकिन आज हिंदुस्तान में सरकारें चुनाव को देखकर, किसी आंदोलन को देखकर, किसी तबके को लुभाने के लिए, किसी को भड़काने के लिए, और धर्म या जाति के आधार पर धु्रवीकरण के लिए जुटी दिखती हैं। यह कुछ उसी किस्म का लगता है कि जिस तरह स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई धरी रह जाती है और बच्चे महज इम्तिहान की तैयारी में लगे दिखते हैं। इसके बाद स्कूल-कॉलेज के आखिरी बरसों में इम्तिहान भी धरे रह जाते हैं और बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए दाखिले के किसी मुकाबले में लगे रह जाते हैं। 
पढ़ाई की तरह का जो बुनियादी काम सरकार चलाने का रहता है वह पहले तो चुनाव के हिसाब से काम करने में तब्दील हो जाता है, और फिर जैसे-जैसे चुनाव करीब आने लगते हैं, वह पूरी तरह से लुभावने नारों में बदल जाता है। एक मजबूत बुनियाद तैयार करने के लिए स्कूल-कॉलेज में जिस तरह पढ़ाई जरूरी होती है, उसी तरह लोकतंत्र में सरकार का बुनियादी काम जरूरी होता है, और वह काम अब लगातार दूसरे गैरजरूरी कामों में तब्दील होते जा रहा है। आज जब कर्नाटक में बड़े-बड़े खरबपति नेता झोपड़पट्टियों में जाकर रात गुजारते दिखते हैं तो याद पड़ता है कि पांच बरस पहले जब वहां भाजपा के येदियुरप्पा की सरकार थी, और प्रदेश का एक हिस्सा बाढ़ में आए कीचड़ में डूबा हुआ था तो सत्तारूढ़ भाजपा विधायक अपने इलाकों में जाना छोड़कर अपनी पार्टी की ही सरकार को पलटने के लिए राज्य के बाहर पांच सितारा रिसॉर्ट में जाकर डेरा डाले हुए थे। 
सरकार के दूसरे हिस्सों को देखें तो वहां भी ऐसा ही खोखलापन दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ में राजिम-कुंभ के नाम पर एक नदी के बहुत बड़े हिस्से को पिछले बरसों में पाट दिया गया, और अब उस हिस्से पर नदी बचाने के नारे के साथ मैराथन दौड़ करवाई जा रही है, दिये जलाने का विश्व रिकॉर्ड बनाया जा रहा है, शंख फूंकने का विश्व रिकॉर्ड बनाया जा रहा है। स्कूल-कॉलेज के बच्चों के हाथों में कोर्स की किताबें अब नहीं दिखतीं, और उनके बजाय इम्तिहान में आसानी के लिए बाजारू कुंजिकाएं और गाईड दिखने लगी हैं। इसी तरह सरकार में बैठे लोग भी कड़ी और कड़वी जिम्मेदारियों को पूरा करने के बजाय शंख फूंक रहे हैं, दिये जला रहे हैं, या कि मध्यप्रदेश के आईएएस अफसरों की तरह शंकराचार्य की खड़ाऊ सिर पर रखकर सड़कों पर नंगे पैर शोभायात्रा निकाल रहे हैं। 
जिन लोगों ने किसी सालगिरह का केक देखा होगा, उन्हें मालूम है कि साधारण केक के ऊपर शक्कर और क्रीम के पेस्ट से किस तरह मोटी खूबसूरत आइसिंग की जाती है कि उसके तले केक दब ही जाता है। भारत में सरकारों के बुनियादी काम इसी तरह की आइसिंग से दब गया है, और ऊपर की रंग-बिरंगी सजावट पर ही पूरा जोर दिया जा रहा है। (Daily Chhattisgarh)

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