सड़कों पर सत्ताधारी गुंडागर्दी के विरोध बिना चारा नहीं

संपादकीय
27 फरवरी 2018


बिहार में अपनी गाड़ी से 9 स्कूली बच्चों को कुचलकर मारने वाले शराबी भाजपा नेता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। तीन दिन पहले जब यह घटना हुई, भाजपा ने इस आदमी से अपना कोई संबंध होने से ही मना कर दिया था। फिर पार्टी की तख्ती लगी हुई उसकी गाड़ी खबरों में आई तो धीरे-धीरे करके सुबूत जुटते गए और अब भाजपा ने उसे पार्टी से निलंबित किया है। इससे एक दूसरी बात खुलकर सामने आई कि पूरी शराबबंदी वाले बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार भाजपा का नेता शराब पीकर गाड़ी चला रहा था, और यह शराब जाहिर है कि बिहार की भीतर ही पी गई थी। 
एक तो गाड़ी की ताकत का नशा, और फिर सत्ता का नशा। इन दोनों के साथ दारू का नशा। इसे देखने के लिए बिहार के किसी हादसे को देखने की जरूरत नहीं है, छत्तीसगढ़ में हम अपने आसपास सत्ता के इस नशे को रात-दिन देखते हैं। और यह सत्ता महज सत्तारूढ़ पार्टी की सत्ता नहीं है, यह विपक्ष में ताकतवर ओहदों पर बैठे हुए लोगों की सत्ता का नशा भी रहता है जो कि सायरन, तख्तियों, और तरह-तरह की लाईटों से गाडिय़ों को डरावनी बनाकर दिखाया जाता है। केन्द्र सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने ऐसी चीजों के लिए बार-बार हुक्म निकाले हैं, लेकिन सत्ता की ताकत दिखाने की हवस ऐसी रहती है कि लोग सार्वजनिक जगहों पर एक हिंसक-मवाली की तरह दूसरों को कुचलने पर आमादा भी रहती है। अभी छत्तीसगढ़ विधानसभा का सत्र पूरा हो रहा है, तो प्रदेश भर से विधायक अपनी गाडिय़ों में राजधानी आए हुए हैं। चारों तरफ ऐसी गाडिय़ां दिखती हैं जिन पर नियमों के खिलाफ नाम और ओहदे की, चुनाव क्षेत्र की तख्तियां लगी हुई हैं। नियमों के खिलाफ इनमें से अधिकतर गाडिय़ों में सायरन भी लगे हुए हैं जिनका धड़ल्ले से बेजा इस्तेमाल भी किया जाता है। सरकार और राजनीति इन दोनों में ऐसी गाडिय़ों की वीडियो फिल्म बनाकर लोग अदालत को भी भेज सकते हैं, और अगली किसी चुनाव में लोग अपने-अपने विधायक या सांसद, महापौर या पार्षद, जिला पंचायत पदाधिकारी या राजनीतिक नेता के खिलाफ ताकत के ऐसे हिंसक और अश्लील प्रदर्शन के वीडियो का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। 
एक सभ्य लोकतंत्र वह होता है जिसमें अधिक ताकतवर लोग नियमों के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि लोग दूसरों के हक को कुचलते-रौंदते चलने में भरोसा रखते हैं, लाल-पीली बत्तियों वाली, या बिना बत्तियों वाली गाडिय़ों को सायरन बजाते चौराहों पर लालबत्ती तोड़कर पार करते रात-दिन देखा जा सकता है। मंत्रियों के काफिले खाली और सुनसान सड़कों पर भी सायरन बजाए बिना चलने के आदी नहीं रह गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से गाडिय़ों पर से लालबत्तियां हट गई हैं, तो मंत्रियों ने अपने काफिले के सामने लाल-पीली बत्तियों वाली पायलट गाडिय़ों को चलाकर अपनी ताकत का प्रदर्शन जारी रखा है। 
ऐसे राज्य में जनता के बीच से एक ऐसे आंदोलन की जरूरत है जो सत्ता के लिए दिक्कत खड़ी करने वाले सवाल करे। इसके अलावा ऐसे जनसंगठन रहने चाहिए जो जनता को जागरूक करे कि उसे कुचलते हुए जो सायरन चलते हैं, वैसे नेताओं को हराने की कसम खाए। लोकतंत्र मुर्दा लोगों का तंत्र नहीं हो सकता। जागरूक जनता को ही लोकतंत्र का हक रहता है। अगर जनता के बीच जागरूकता फैल जाए, तो छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में पौन फीसदी वोटों से ही पिछली सरकार बनी थी। बड़े से बड़े कामयाब विधायक भी कुछ हजार वोटों के फर्क पडऩे से निपट सकते हैं। चुनाव का यह साल सत्ता के नशे में बददिमाग नेताओं को सबक सिखाने का साल भी रहना चाहिए, जो कोई सायरन बजाते पहुंचे, उसके खिलाफ वोट डालने की कसम लोगों को खानी चाहिए, तभी जाकर सत्ता जनता को कुचलना बंद करेगी। अगर बिहार में जनता में जागरूकता होती तो भाजपा का एक नेता 9 बच्चों को कुचल मारने के बाद इस तरह फरार नहीं हुआ होता। बाकी जगहों पर लोगों को लोकतंत्र की बेहतरी के लिए न सही, कम से कम अपने बच्चों को कुचलकर मारे जाने से बचाने के लिए ही सत्ता की बददिमागी पर लगाम लगानी चाहिए, और इसकी शुरूआत सड़कों पर सत्ताधारी गुंडागर्दी का विरोध करने से होनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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