संपादकीय
8 फरवरी 2018

फिल्म अभिनेता जितेन्द्र के खिलाफ उनकी फुफेरी बहन ने पुलिस में शिकायत की है कि उन्होंने 47 साल पहले उसका यौन शोषण किया था। शिकायत के मुताबिक यह घटना जनवरी 1971 की है, जब यह बहन 18 बरस की थी, और जितेन्द्र 28 साल के। जितेन्द्र ने इस शिकायत को बेबुनियाद बताया है। पिछले कुछ महीनों से हॉलीवुड और पश्चिमी दुनिया में महिलाओं ने एक अभियान चला रखा है जो मोटे तौर पर वहां के फिल्म उद्योग से शुरू हुआ, और उसके बाद बाकी प्रमुख महिलाएं भी उससे जुड़ती चली गईं। जिस-जिस महिला के साथ जिन लोगों ने पहले कभी भी यौन शोषण किया था, उसका नाम लेकर घटना की जानकारी समेत सार्वजनिक बयान दिए जा रहे हैं, और इस हौसले को महिलाओं के आत्मविश्वास का एक बड़ा प्रतीक माना जा रहा है।
अमरीका जैसे देश में ऐसे पुराने मामलों के आरोप पर भी अदालत के बाहर मुआवजा देकर या दूसरे किस्म की भरपाई करके मामले को खत्म करने की कानूनी व्यवस्था है। लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में इस तरह की शिकायतों पर जांच के बाद सिर्फ आपराधिक मामले दर्ज हो सकते हैं, या शिकायत खारिज हो सकती है। भारतीय कानून अदालत के बाहर इस तरह के किसी समझौते को मान्यता नहीं देता है। इसलिए अब लगभग आधी सदी पहले की इस शिकायत पर पुलिस के सामने या तो मामला दर्ज करके जितेन्द्र के खिलाफ मुकदमा चलाने का रास्ता है, या फिर दूसरा रास्ता है कि सुबूत न होने से इस शिकायत को खारिज किया जाए। भारतीय कानून महिला की शिकायत और उसके शब्दों को आदमी के शब्दों के मुकाबले अधिक कानूनी वजन देता है, और यह देखना होगा कि इस मामले में जांच एजेंसी और अदालत का क्या रूख होता है।
ऐसे मामलों में हमें यह हैरानी होती है कि 47 बरस तक खामोशी क्यों जारी रही? अगर ऐसा यौन शोषण हुआ था, तो इतने बरस तक शिकायत करने से किसने रोका था? और जिस तरह कई दूसरे मामलों में शिकायत करने की एक समय सीमा रहती है, क्या यौन शोषण के मामलों में भी शिकायत दर्ज कराने के लिए कुछ बरस की कोई सीमा होनी चाहिए? यह सवाल इसलिए उठता है कि कानूनी शिकायत के बाद उस पर कानूनी कार्रवाई के लिए सुबूतों और गवाहों की जरूरत पड़ती है, वरना एक व्यक्ति के खिलाफ दूसरे व्यक्ति के शब्दों को वजन देने की एक सीमा हो सकती है। यह बात सही है कि भारतीय समाज में महिला के लिए खुलकर सामने आने और यौन शोषण की रिपोर्ट लिखाने की बात उतनी आसान नहीं है, लेकिन किसी भी किस्म की शिकायत उसके आगे की संभावनाओं के बिना बेमायने हो सकती है। यह बात जरूर है कि यौन शोषण के पुराने मामलों में सजा चाहे न हो सके, सामाजिक साख खराब होने की एक सजा जरूर मिल सकती है, और इसे एक सामाजिक न्याय माना जा सकता है।
भारतीय कानून में महिला की शिकायत पर यौन शोषण का जुर्म दर्ज करने के एक किस्म के मामले हर दिन कहीं न कहीं दर्ज होते हैं जिनमें किसी लड़की की यह शिकायत रहती है कि उससे शादी का वायदा करके देह संबंध बनाए गए, और उसके बाद शादी से इंकार कर दिया गया। इसे भारतीय कानून बलात्कार मानकर जुर्म दर्ज करता है, गिरफ्तारी होती है, और मामला चलता है। इस कानूनी प्रावधान को लेकर हमने पहले भी एक बार जिक्र किया था, और अभी फिर उसकी चर्चा की जरूरत महसूस हो रही है। दो बालिग लोगों के बीच अगर आपसी सहमति से देह संबंध कायम होते हैं, उनके बीच इसके साथ-साथ प्रेम संबंध भी होता है, या नहीं भी होता है, और इसके साथ-साथ शादी का वायदा भी होता है, तो भी इसे बलात्कार के रूप में दर्ज करना हमारी समझ से परे है। इसका एक मतलब यह है कि एक बार किसी बालिग लड़के-लड़की के बीच भी अगर देह संबंध हो जाता है, तो फिर शादी से मुकरने की गुंजाइश कानूनी रूप से खत्म हो जाती है। यह बात जायज नहीं लगती है क्योंकि प्रेम संबंध और देह संबंध में सहमति के बाद कई बार आपसी असहमति भी होती है, जो कि शादी के बाद भी होती है, और तलाक होते हैं। ऐसे में प्रेम संबंध और देह संबंध को अनिवार्य रूप से शादी की बंदिश में बांधना जायज बात नहीं है। लोगों की सोच, एक-दूसरे के बारे में पसंद, इन सबमें फेरबदल हो सकता है, और इसे शादी की बंदिश से अनिवार्य रूप से जोडऩा न्यायसंगत और तर्कसंगत नहीं लगता है। यह बात उन लोगों पर तो लागू हो सकती है जो पहले से शादीशुदा हों, और इस बात को छुपाकर किसी गैरशादीशुदा से देह संबंध बनाएं, और शादी के वायदे के सुबूत भी हों, तब तो बदनीयत कायम होती है, और सजा दी जानी चाहिए। लेकिन देह संबंधों के बाद शादी न करने पर वह एकाएक बलात्कार करार दिया जाए, यह बात सही नहीं है।
यौन शोषण के दो किस्म के मामलों को लेकर हमने यहां चर्चा छेड़ी है, और इन दोनों पहलुओं पर आगे बात होनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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