संपादकीय
4 फरवरी 2018

छत्तीसगढ़ के एक अखबार के एक पेज की खबरों को अगर एक साथ न देखा होता, तो शायद इस मुद्दे पर आज यहां लिखने की जरूरत नहीं हुई होती। ये तमाम खबरें अलग-अलग अखबारों में अलग-अलग पन्नों में बिखरी हुई आम दिखती हुई खबरें हैं, लेकिन जब इन्हें एक साथ देखें तो दिल दहलता है, और दिमाग हिलता है कि यह कैसी नौबत आ गई है, और इससे उबरने के लिए क्या किया जा सकता है, अगर कुछ किया जा सकता है तो।
राजधानी रायपुर से लगे हुए अमलेश्वर में मां-बाप के अंतरजातीय विवाह को लेकर उनकी चौदह बरस की बेटी को दादा-दादी, और ताऊ-ताई रोजाना इतने ताने देते थे कि उस लड़की ने मिट्टीतेल डालकर आत्महत्या कर ली। अब परिवार के ये चार बुजुर्ग जेल में हैं। छत्तीसगढ़ की ही एक दूसरी खबर है कि गांव के लोगों ने एक आदमी को अपनी ही तीन बरस की बेटी को कुएं के चक्कर लगाने के बाद कुएं में फेंकने की कोशिश की, और उसी वक्त गांव के लोगों ने उसे पकड़कर रोका, बच्ची की जान बचाई। छत्तीसगढ़ की ही दूसरी खबर है कि एक शिक्षक ने मिट्टीतेल डालकर खुद को आग लगाई, उसके साथ सोई बेटी जलकर मर गई, और बड़ी बेटी की उस कमरे में दम घुटने से मौत हो गई। इसी राज्य की एक दूसरी खबर है कि पति की प्रताडऩा से एक महिला इतनी परेशान हो गई थी कि उसने बेटियों के साथ जहर पी लिया, लोगों ने देखा तो तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन मां और एक बेटी की मौत हो गई।
पारिवारिक हिंसा के ये तमाम मामले एक साथ एक नजर में दिखने से सोच को झकझोरते हैं कि समाज में मानसिक तनाव या दूसरे किस्म की कुंठाएं यह किस हद तक बढ़ गई हैं कि लोग इतनी हत्या-आत्महत्या कर रहे हैं? इसी अखबार के दूसरे पन्नों पर, और दूसरे अखबार के भी बहुत से पन्नों पर ऐसी वारदातें आए दिन दिखाई पड़ रही हैं, लेकिन ये महज पुलिस-रिपोर्ट बनकर और खबर में एक दिन आकर खत्म हो जाती हैं, और इनके बारे में यह गंभीर सोच-विचार नहीं हो पाता कि समाज के लोगों में ऐसी हिंसक भावनाओं को कम करने के लिए क्या किया जाना चाहिए। इनको देखें तो यह जाहिर है कि यह तनाव रातों-रात उठ खड़ा हुआ हो, ऐसा नहीं है, और यह धीरे-धीरे बढ़कर हिंसा की इस हद तक पहुंचता है, और हत्या-आत्महत्या में तब्दील होता है। एक और तकलीफदेह बात यह है कि संयुक्त परिवार के जिस ढांचे को कई तरह के पारिवारिक तनावों का इलाज माना जाता था, संयुक्त परिवार का वह ढांचा कई किस्म की हिंसा के लिए जिम्मेदार मिल रहा है। कहीं पर प्रेमी-जोड़ों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने में संयुक्त परिवार की झूठी आन-बान और शान जिम्मेदार रहती है, तो कहीं परिवार के भीतर दो-तीन पीढिय़ों के बीच पटरी नहीं बैठ पाती। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी हफ्ते-दस दिन पहले ही एक संपन्न कारोबारी परिवार की भयानक खबर सामने आई कि 80 बरस की लकवाग्रस्त मां को बिस्तर पर छोड़कर, घर में ताला डालकर बेटे और उनका परिवार दूसरे घर में रहने चले गए, बाद में उस महिला की चीख-पुकार सुनकर पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाकर घर खोला, और महिला को बचाया।
दरअसल सरकार की किसी भी योजना में लोगों का मानसिक स्वास्थ्य आता नहीं है। मानसिक सेहत को नापना-तौलना मुश्किल होता है, या लगभग नामुमकिन, और सरकार नापने-तौलने लायक काम ही कर पाती है। अब कोई नागरिक कितने खुश हैं, इसका पैमाना नामुमकिन सा है। हालांकि पड़ोस के मध्यप्रदेश में खुशी या खुशहाली के लिए एक मंत्री बनाया गया है, यह एक अलग बात है कि वहां के मुख्यमंत्री ही अपने सुरक्षा कर्मचारी से नाखुश होकर उसे जुलूस के बीच ही पीट देते हैं। दूसरी तरफ ब्रिटेन में अभी पिछले पखवाड़े ही एक महिला मंत्री को देश में पहली बार सूनेपन की दिक्कतों को दूर करने का मंत्रालय बनाकर उसका जिम्मा दिया गया है। आज के युग में लोगों के बीच सामाजिक संबंध कमजोर हो रहे हैं, और वे आसपास रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर हैं, और इससे कई तरह के खतरे सेहत और समाज के लिए खड़े हो रहे हैं, इनसे निपटने के मकसद से ब्रिटिश सरकार ने यह नया मंत्रालय बनाया है।
हम अपने आसपास सरकार से ऐसी संवेदनशीलता की चाह तो रखते हैं, लेकिन ऐसी उम्मीद है नहीं कि ऐसे अमूर्त काम के लिए सरकार गंभीरता से कोई विभाग या मंत्रालय बनाएगी। वैसे तो सरकार के अलग-अलग कुछ विभागों के कुछ काम अगर ठीक से हों, तो लोगों का कुछ भला हो सकता है, लेकिन समाज में तनाव को घटाने के लिए कुछ अधिक कल्पनाशील, रचनात्मक, सकारात्मक और संवेदनशील मेहनत की जरूरत है। सरकार के लिए कोई भी विभाग, मंत्रालय, निगम, मंडल, या आयोग किसी नेता को सुविधा देने का एक जरिया होकर रह जाता है, इससे उबरने की जरूरत है। कहने के लिए इस राज्य में महिला आयोग है, मानवाधिकार आयोग है, और बाल कल्याण परिषद भी है। इन सबका जिम्मा बनता है कि समाज में ऐसे तनाव को घटाने की कोशिशें हों, लेकिन ये संवैधानिक संस्थाएं भी सुविधा पाने और दर्जा जताने का जरिया होकर रह गई हैं। क्या सरकार से परे समाज के कुछ लोग खुद होकर ऐसी पहल कर सकते हैं जिससे कि लोगों की जिंदगी में हिंसक सोच घटे?
-सुनील कुमार
(Daily Chhattisgarh)
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