संपादकीय
21 मई 2018

गुजरात में साल दो साल पहले उना नाम की जगह पर दलितों को बुरी तरह से पीटने का वीडियो सामने आया था, और दुनिया का दिल दहल गया था कि सार्वजनिक जगह पर, सड़क पर दलितों को किस तरह से मारा जा रहा था। अभी एक दूसरा वीडियो सामने आया है जो गुजरात के राजकोट में एक कारखाने के अहाते में कचरा बीनने गए पति-पत्नी को पीटने का है। फैक्ट्री के लोगों ने मार-मारकर इस दलित नौजवान की जान ले ली, और इसमें फैक्ट्री के कर्मचारी भी शामिल थे, और मालिक भी। जिस तरह उसे बांधकर कोड़े की छड़ से उसको पीटा गया, वह देखते ही नहीं बनता। यह नौजवान मारा गया और उसकी बीवी बुरी तरह से जख्मी है।
यह हालत देश के बहुत से राज्यों में दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गरीबों, और महिलाओं-बच्चों की है। ये तमाम वे तबके हैं जिनकी हिफाजत के लिए देश में अलग से कानून बना हुआ है। और ऐसे कानून के चलते हुए भी जब दलित-आदिवासी रात-दिन कहीं न कहीं हत्या-बलात्कार के शिकार होते हैं, किसी दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढऩे पर दंगा होने लगता है, जहां पर कल ही मध्यप्रदेश में गोहत्या की आशंका में एक मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला गया, और दूसरा बुरी तरह जख्मी है, वहां पर यह सोचना पड़ता है कि यह देश जा किधर रहा है? यह नौबत बहुत ही खराब है, और यह सुधरते दिख नहीं रही है।
देश में कानून की किसी को परवाह नहीं रह गई है, और कानून लागू करने वाली एजेंसियां, मुजरिमों को पकडऩे वाली एजेंसियां, इन सब पर भारी राजनीतिक दबाव दिखता है, और सत्ता को जो नापसंद हैं, उन पर तो कार्रवाई दिखती है, लेकिन बाकी लोगों पर अधिक से अधिक वक्त तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। एक दूसरी दिक्कत यह है कि पुलिस और बाकी जांच एजेंसियां जब लगातार राजनीतिक दबावतले काम करती हैं, तो वे भ्रष्ट भी होने लगती हैं। पुलिस को लगता है कि जब भेदभाव ही करना है, चुनिंदा मुजरिमों के साथ रियायत ही करनी है, तो ऐसी रियायत करते हुए वे खुद भी अपने फायदे के लिए कुछ और लोगों से रियायत क्यों न कर लें? ऐसी सोच धीरे-धीरे काम करने की क्षमता को घटाते चलती है, और लोगों का भरोसा कानून के राज पर से उठने लगता है।
कई बार एक लतीफा बाजार में आता है कि एक जज से खुश होकर एक बुजुर्ग उसे दुआ देता है कि बेटा अगले जनम में दारोगा बनना। जज हैरान होकर बताता है कि वह तो आज भी दारोगा से बहुत बड़ा है, और फिर ऐसी दुआ क्यों दी जा रही है? तो वह बुजुर्ग कहता है कि आपने इस फैसले में दस बरस लगा दिए, दारोगा तो कहता था कि लाख रूपए ले आओ, दस दिन में मामला निपटा देगा। जब ऐसे किस्से लोगों की असल तकलीफों का असल बखान हो, तो फिर यह सोचना पड़ता है कि इस बिगड़ी हुई व्यवस्था को आखिर कौन सुधारेंगे, और क्या यह सचमुच ही कभी सुधर भी पाएगी? आज जब सार्वजनिक जगहों पर लोग मार-मारकर, पीट-पीटकर दूसरों की जान ले लेते हैं, और उनको यह अहसास भी रहता है कि हो सकता है कि कोई इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हों। इसके बावजूद लोगों को कत्ल करने में हिचक नहीं होती अगर जान किसी दलित-आदिवासी की हो, या किसी गरीब की हो। आज जब हम इस बात को लिख रहे हैं उसी वक्त दिल्ली की एक खबर है कि झारखंड से वहां घरेलू कामकाज के लिए ले जाई गई एक नाबालिग लड़की ने जब तनख्वाह मांगी, तो मालिक ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब यह हाल जिस देश की राजधानी का हो, उस देश का फिर भगवान ही मालिक है। (Daily Chhattisgarh)

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - शरद जोशी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।
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