छोटे से एसएमएस से एक बड़ी बात तक



आजकल
25 जुलाई 2011
सुनील कुमार
अभी कुछ हफ्ते पहले मुझे कश्मीर जाने का मौका मिला तो वहां एक बात को लेकर खासी तकलीफ रही कि एयरटेल के मेरे दो मोबाईल फोन, दोनों पोस्टपेड होने के बाद भी वहां पर ईमेल और एसएमएस से परे रहे। कश्मीर में सुरक्षा के कारणों से प्रीपेड मोबाईल फोन, शायद बाहर से गए हुए, काम नहीं करते। वहां के लोगों से यह भी पता लगा कि उनकी बहुत सी रिश्तेदारी पाकिस्तान में होने के बावजूद वहां से पाकिस्तान फोन नहीं लग सकता। एयरटेल के साथ घंटों माथा फोडऩे पर बार-बार इस कंपनी ने यही कहा कि कश्मीर में एसएमएस पर कानूनी रोक लगी हुई है। लेकिन हमारे साथ में ही रिलायंस और वोडा फोन के जो मोबाईल फोन यहां से गए हुए थे वे वहां एसएमएस से लेकर इंटरनेट तक सभी काम कर रहे थे। जाहिर है कि या तो एयरटेल का कानून का आड़ लेना गलत था या फिर बाकी टेलीफोन कंपनियों कानून तोड़कर यह सहूलियत अपने ग्राहकों को दे रही थीं।
लेकिन आज यहां पर चर्चा टेलीफोन पर नहीं है बल्कि लोगों के बात करने के हक पर है। कश्मीर को लेकर एक रिपोर्ट पाकिस्तान के एक अखबार डॉन में छपी है जिसमें एक ऐसी प्रदर्शनी का जिक्र है जो कि दिल्ली, ऑस्ट्रेलिया के सिडनी, जर्मनी के बर्लिन के अलावा हॉलैंड के एक शहर में भी लगी और इसमें ऐसे एसएमएस थे जिन्हें कश्मीर के लोग भेज नहीं पाए थे और जो एक प्रोजेक्ट के तहत लोगों से लिखवाए गए थे। कश्मीर के लोगों से कहा गया कि अगर वे एसएमएस लिख पाते तो क्या लिखते? इसमें लोगों ने अपनी छोटी-छोटी घरेलू बातें भी लिखीं, कुछ शेयर लिखे और कुछ राजनीतिक बातें भी लिखीं। कश्मीर के जो लोकल कनेक्शन पोस्टपेड हैं उनमें शायद एसएमएस की सुविधा रहती है लेकिन उस राज्य के बाहर के फोन, खासकर प्रीपेड फोन और राज्य के भीतर के भी प्रीपेड फोन एसएमएस पाना और भेजना नहीं कर पाते।
इन दिनों मैं पूरी दुनिया की खोज-खबर कुछ अधिक हद तक रखने के लिए इंटरनेट पर ट्विटर पर रोजाना कई घंटे लगाकर अपने कंधे और हाथ को तबाह करने की हद तक पहुंच चुका हूं। इसमें पाकिस्तान के लोगों के लिखे हुए छोटे-छोटे से संदेश सबसे अधिक राजनीतिक बेचैनी के होते हैं और गिनती में बहुत अधिक भी होते हैं। दुनिया के जिन इलाकों में टकराव अधिक है वहां अगर बोलने की आजादी कुछ कम है तो वहां के लोग जहां राह दिखती है वहां जाकर दीवारों पर लिखने लगते हैं। मुझे याद है कि पिछले बरस दिसंबर के महीने में कई दिन हम लोग ईरान में थे जहां पर इंटरनेट पर फेसबुक जैसी वेबसाईटों पर रोक लगी हुई थी लेकिन हमारे संपर्क का ऐसा कोई नहीं था जिसने उसका तोड़ निकालकर न रखा हो और अपने देश के कानून के खिलाफ वह फेसबुक का इस्तेमाल न कर रहा हो।
हिन्दुस्तान में बोलने और लिखने की आजादी पर रोक का सबसे बुरा और सबसे लंबा दौर एक ही था, इमरजेंसी का। इस दौर में अखबारों से झुकने कहा गया था और इतिहास गवाह है कि उनमें से अधिकतर अखबार लेट गए थे। लोगों को आपातकाल एक अनुशासन पर्व दिखने लगा था और संजय गांधी ने लोगों को इस देश का ऐसा भविष्य दिखने लगा था जैसा चमचमाता हुआ इतिहास भी सोने की इस चिडिय़ा का कभी न रहा हो। लेकिन उस दौर में भी कुछ लोग ऐसे थे जो कि बोलने की आजादी के रास्ते निकाल लेते थे और अखबारों में न सही, पर्चों में लिखकर कसर पूरी करते थे। कुछ अखबारों में उस वक्त लोगों ने प्रूफ की गलतियां जानबूझकर छोड़कर इंदिरा गांधी के नाम को इंदिरा गधी जैसा भी किया था और कुछ पर कार्रवाई हुई थी, कुछ कार्रवाई से बच गए थे।
इसलिए जब किसी देश या प्रदेश में बोलने की आजादी कम होती है तो लोग पर्चों में लिखने लगते हैं, शौचालयों के दरवाजों के भीतर की तरफ लिखने लगते हैं और कहीं-कहीं दीवारों पर भी। कुल मिलाकर होता यह है कि जब समाज में लोगों की भड़ास अधिक हो और उसके निकलने की राह बिल्कुल न हो, तो वह तरह-तरह के धमाकों के साथ निकलती है। ये धमाके बंधी उंगलियों वाली बिरादरी के अपने भी हो सकते हैं और किसी कमजोर बिरादरी के लिए नक्सलियों की तरह बाहर से आकर किए गए धमाके भी हो सकते हैं।
इंटरनेट पर लोगों को अपनी भड़ास निकालने का बहुत बड़ा चौपाल मिल गया है जहां वे अपनी बातों को लिखकर टांग सकते हैं और उस पर दुनिया के लोगों का असर देख भी सकते हैं। इंटरनेट की टेक्नालॉजी में अराजकता की जितनी संभावनाएं हैं उनके चलते लोग यहां पर आजादी का बेजा इस्तेमाल भी कर लेते हैं लेकिन कम से कम इसके बाद लोगों के मन में भड़ास कुछ कम बचती है।
कश्मीर में अगर लोगों के एसएमएस पर रोक लगती है, उनके फेसबुक पर कुछ लिखने के बाद अगर वहां की सरकार उन्हें गिरफ्तार करती है तो ऐसी तमाम चीजें कुछ पत्थर बनकर उन पथरावों में जुड़ जाती हैं जो कि वहां की सड़कों पर कुछ अलगाववादी भी करवाते रहते हैं। जब जुबान से कुछ लफ्ज निकलने पर रोक, जब हाथ की कलम कुछ लिख न सके, जब उंगलियां कोई एसएमएस बनाकर भेज न सकें तो फिर ऐसे खाली हाथ अगर पत्थर उठा लेते हैं तो उसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।
मैं यहां पर लोगों के ऐसे निजी हक से परे की कुछ ऐसी नौबत भी सोचता हूं जिनमें किसी समाज को इसलिए बोलने का मौका नहीं मिलता क्योंकि शहरी और संपन्न तबके की दिलचस्पी वाला मीडिया इन बातों को बाजार की दिलचस्पी का नहीं पाता। ऐसा तबका एक ऐसा आदिवासी तबका भी हो सकता है जो कि ऐसे शहरी समाज के हाथों हांके जाते लोकतंत्र को अपनी जरूरतों का नहीं पाते और चूंकि उसकी खुद की बोली, उसकी जुबान, उसकी बातों की हिन्दुस्तान के शहरी लोकतंत्र में जगह नहीं दिखती इसलिए वह नक्सली बमों को शायद कभी-कभी अपनी बात जोरों से बोलने की इजाजत दे देता है। शायद धर्म, संपन्नता, जाति के आधार पर कमजोर तबकों को अपनी बात रखने का बराबर का मौका नहीं मिलता और इसलिए शायद उनकी बेचैनी तरह-तरह की हरकतों की शक्ल में बाहर निकलती है।
मैं अभी कश्मीर जैसे किसी राज्य की सुरक्षा की जरूरतों को नकार नहीं रहा लेकिन मेरा यह भी मानना है कि लोगों को जब तक बोलने की आजादी नहीं रहेगी, जब तक उनकी बातों को सामने आने का हक नहीं मिलेगा तब तक उनकी बेचैनी कुछ खतरनाक बनी रहेगी। वैसे भी आज के जमाने में जब लोगों की बातों की आवाजाही पल-पल होती है तब अगर ऐसे हक या मौके से किसी तबके को दूर रखा जाएगा तो वह दिखने के लिए कुछ अलग किस्म की दीवारें भी ढूंढ़ेगा और उसकी बातें फिर हो सकता है कि उतनी मासूम न रहें।
हिन्दुस्तान के आज के हालात में मैं यह मानता हूं कि जब सरकारों और नेताओं की बददिमागी इतनी अधिक हो गई है कि जब वे लोगों की लिखी और कही बातों के असर से अपने को ऊपर मानते हैं तो फिर लोग असर का कोई और रास्ता तलाशने पर बेबस हैं। ऐसा एक रास्ता आज देश भर में नेताओं और सरकारों पर से भरोसा उठ जाने की शक्ल में सामने आया है। इसलिए महज बोलने का मौका काफी नहीं हो सकता, उस बोलने का असर होना जरूरी है तभी जाकर लोगों को अपना कहा हुआ, कहा हुआ लगेगा। वरना किसी दीवार के सामने खड़े होकर कुछ कहकर किसी को तसल्ली नहीं हो सकती।
कश्मीर में जिस तरह लोगों से लिखे हुए एसएमएस लेकर इसकी एक प्रदर्शनी लगाई गई, क्या उसी तरह की प्रदर्शनी देश के दूसरे इलाकों के ऐसे लोगों की बातों की नहीं लग सकती जहां कि लोग फोन से दूर हैं, शायद लिखने की ताकत से दूर हैं। क्या सामाजिक कार्यकर्ताओं में से कुछ ऐसी पहल कर सकते हैं कि वे बेजुबान तबकों तक जाकर उनकी बातों को सुनें, उन्हें एसएमएस या ट्विटर की अक्षर सीमा के भीतर बांधें और उन्हें किसी वेबसाईट पर डालकर वहां उसकी प्रदर्शनी लगाएं? आज भारत जैसे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का मोटा मतलब मीडिया के मालिकों या उसके ताकतवर लोगों, या उसे खरीदने की ताकत रखने वाले लोगों की बोलने की आजादी रह गया है। सबसे कमजोर तबके के बोलने के लिए हवा और आसमान भी नहीं है, इसलिए कई बार उसकी तरफ से उसकी बात धमाकों के साथ सामने आती है। यह बात लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है और इस लोकतंत्र को ऐसा रास्ता निकालना होगा कि बेइंसाफी को सबसे अधिक झेलने को बेबस, सबसे गरीब, सबसे पिछड़ा, सबसे दबा-कुचला तबका अपनी बात को कहीं सामने रख सके, उसकी बात को कोई सुने और यह लोकतंत्र उसकी बातों पर गौर करे।

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