पेशेवर झूठों की कहानी

3 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार

इंटरनेट पर सुब्रमण्यम स्वामी को रोजाना दर्जनों ट्वीट पोस्ट करते देखना बड़ा दिलचस्प भी रहता है और हैरान करने वाला भी। उनकी कुछ बातों को गंभीरता से लेना इसलिए जरूर लगता है क्योंकि वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर अपने कई आरोपों को दस्तावेजों के साथ साबित करने का काम कर चुके हैं और दुनिया के बड़े जाने-माने विश्वविद्यालयों में उन्हें पढ़ाने के लिए बुलाया जाता है। इसलिए उन्हें महज साम्प्रदायिक, शिगूफेबाज कहकर खारिज कर देना जायज नहीं होगा। उनकी बातें साम्प्रदायिकता के जहर से भरी रहती हैं लेकिन वे अपने आरोपों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक ले जाकर उन्हें सही साबित करने का हौसला दिखाने वाले कुछ गिने-चुने नेताओं में से हैं जिनकी अपनी पार्टी का न कोई बड़ा ढांचा है और न ही उन्हें इस लड़ाई में किसी और से बहुत बड़ा सहारा मिलता।
मैंने उनसे ट्विटर पर कुछ आरोपों को लेकर जब सुबूत मांगे तो उनका जवाबी हमला तो कम था लेकिन उनके समर्थन में चौकन्नी और मेहनत करने वाली टीम ने सीधी गाली-गलौज शुरू करने और बिना किसी जानकारी के मुझे कांगे्रस की तनख्वाह पर जीने वाला लिखना शुरू कर दिया। उन्हें यह जानकर थोड़ी सी निराशा हो सकती है कि कांगे्रस के कुछ लोग मुझे भाजपा की तनख्वाह पर जीने वाला मानते हैं, सरकार में बैठे कुछ लोग नक्सलियों का मददगार मानते हैं, नक्सलियों से हमदर्दी रखने वाले मुझे सरकार का हिमायती मानते हैं। कुल मिलाकर कोई भी मुझे अपना नहीं मानता क्योंकि किसी व्यक्ति या संगठन के बजाय जब मुद्दों पर लिखना होता है तो कभी किसी के खिलाफ कड़वी बातें लिखी जाती हैं तो कभी उनके किसी विरोधी के खिलाफ। और इंटरनेट के ट्विटर पर मेरे सरीखे छोटे शहर के अखबारनवीस के बारे में अधिक लोग जानते नहीं हैं इसलिए किसी से एक लाईन का सीधा सवाल भी लोगों को तुरंत उकसा देता है कि वे गाली-गलौज शुरू कर दें।
खुद सुब्रमण्यम स्वामी ने सुबूत की मांग के मेरे ट्वीट के जवाब में लिखा कि भारतीय मीडिया किसी सुबूत को परखने की ताकत नहीं रखता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई को तर्कसंगत और न्यायसंगत साबित करने में लगे हुए, दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में पढऩे और पढ़ाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह की बातें लिखते हैं उससे यह हैरानी होती है कि ऐसे बेबुनियाद झूठ की उन्हें जरूरत क्यों पड़ती है? अभी उन्होंने लिखा-विष कन्या की बहन, अनुष्का उर्फ अलेजान्द्रा ने सोनिया के हमशक्ल का रोल निभाना शुरू कर दिया है। वह पी.चिदंबरम को आदेश जारी करती है। दो अक्टूबर को सुबह राजघाट पर ध्यान से देखें। उन्होंने आगे लिखा कि अनुष्का रोजाना उस पर (यह शायद चिदंबरम के बारे में ही है) चीखती है-स्वामी को गिरफ्तार करो, भारतीय संविधान टायलेट पेपर है उसे फेंक दो। वे आए दिन इटेलियन माफिया जैसे आरोप लगाते रहते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि सोनिया और जेटली प्रेस को कहते रहते हैं कि वे उनके (स्वामी के) बारे में कोई भी अच्छी खबर न छापे।
मुझे ऐसी किसी अनुष्का नाम के विष कन्या के बारे में अलग से जानकारी नहीं है कि स्वामी किसके बारे में लिख रहे हैं, लेकिन मुझे उनके इस आरोप पर जरा भी भरोसा नहीं है कि कोई सोनिया गांधी की हमशक्ल होकर राजघाट पर पहुंचेगी।
इस मुद्दे पर आज लिखने की इसलिए सूझ रही है कि कांगे्रस के चर्चित, विवादास्पद और ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह की एक शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने बाईस लोगों या वेबसाईटों के खिलाफ जुर्म कायम किया है जहां पर उनके बारे में अपमानजनक बातें लिखी गई हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह के आरोप रोज कई बार लगा रहे हैं, उनको साबित करना शायद उनके जैसे ताकतवर अदालतबाज के लिए भी मुश्किल होगा और उनसे अदालत में सोनिया से जुड़े मुद्दों पर बहस करना कांगे्रस तय करती है या नहीं इसका अंदाज लगाना मुश्किल होगा। लेकिन जो सोनिया गांधी मीडिया में किसी से किसी तरह की बात न करने के लिए जानी जाती है वह मीडिया के लोगों को स्वामी के पक्ष की कोई खबर न बनाने को कहे, यह बात भरोसमंद नहीं लगती।
दिग्विजय सिंह के दायर किए गए मामले से बहुत पहले ही फेसबुक पर कई लोगों से इस बात को लेकर मेरा गहरा मतभेद रहा कि कुछ साम्प्रदायिक सोच के लोगों का रोज का लिखा हुआ झूठ कई लोग एक सच की तरह फैलाना शुरू कर देते हैं और जब मैं उनसे जान-पहचान होने के नाते जांच-परख लेने की अपील करता हूं तो वे मुझे इस खेमे का या उस खेमे का एजेंट लिखने लगते हैं। इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को फैलाना जितना आसान है, उतना ही आसान झूठ को पकड़ लेना भी है। जब बहुत ही सनसनीखेज और बड़े-बड़े आरोप लगते हैं तो उनको जांच लेना मेरी आदत में शुमार हो गया है। नतीजा यह होता है कि सोनिया या राहुल के बारे में, सोनिया के मायके के बारे में, सोनिया के इटेलियन माफिया या पोप से रिश्तों के बारे में जितने तरह की बातें इंटरनेट पर तैरती हैं वे सारी की सारी बातें घोर साम्प्रदायिकता फैलाने वाली एक-दो दर्जन वेबसाईटों तक जाकर खत्म हो जाती हैं, और इससे आगे भी किसी भी भरोसेमंद समाचार स्रोत तक नहीं पहुंच पातीं। सोनिया गांधी के न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ने बहुत किस्म के ऐसे आरोप लगाए कि अमरीकी अदालतों में सोनिया की कांगे्रस पार्टी के दायर किए गए मुकदमे कैसे वापिस लिए जा रहे हैं या इस किस्म की कुछ और बातें। उनके बारे में पूछने पर उनके पास कोई जवाब नहीं था और उनके हिमायतियों के पास गंदी गालियां थीं।
कोई सच का साथ इस हद तक छोड़कर झूठ की बुनियाद पर अपनी दुश्मनी की इमारत को कब तक खड़ा रख सकता है, उससे एक लंबे सार्वजनिक जीवन में उसका क्या फायदा हो सकता है, यह सोचना बड़ा मुश्किल है लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी इसकी एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।
आज जिन लोगों को भारत की सूचना तकनीक कानून की जानकारी नहीं है उन्हें यह जान लेना बेहतर होगा कि अखबार में किसी को बेइज्जत करके दसियों बरस तक संपादक बचे रह सकता है, लेकिन आईटी एक्ट इतना कड़ा है और उसमें सजा की संभावना, या आशंका जो भी कहें, इतनी अधिक है कि लोगों का बचना खासा मुश्किल होगा। लोगों को इंटरनेट पर किसी के खिलाफ झूठ लिखते हुए एक धेले का भी खर्च नहीं होता, जबकि अखबार को छापना खासा मुश्किल होता है। ऐसे में लोगों को किसी के चाल-चलन से लेकर किसी के परिवार तक के बारे में सफेद झूठ लिखने में भी पल भर नहीं लगता और फिर उस झूठ में दिलचस्पी रखने वाले लोग उसे एक संक्रामक रोग की तरह फैलाने में जुट जाते हैं।
दिग्विजय सिंह ने पुलिस में जो मामला दर्ज करवाया है वह कुछ लोगों को जब तक सजा दिलवाने में कामयाब हो सके तब तक बहुत से और लोग लापरवाही से किसी के भी बारे में झूठ लिखना जारी रख सकते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि कम से कम इस कॉलम को पढऩे वाले लोग ऐसी गलती से भी बचें, और किसी सजा के खतरे से भी। सच और झूठ, जायज और नाजायज, तय करने का मामला तो अपने-अपने नजरिए से लोग करते हैं, लेकिन अदालत में जब कोई मामला जाता है तो वहां पर सच सिर्फ वही होता है जो अदालत में सच साबित किया जा सके। जो लोग नेहरू-गांधी परिवार की रगों में दौडऩे वाले खून को लेकर एक डीएनए टेस्ट के सुबूत की तरह साम्प्रदायिक नफरत को रात-दिन लिख रहे हैं और फैला रहे हैं वे लोग तभी तक कानून से बचे हैं जब तक कोई उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं करता और उन्हें अनदेखा करना बेहतर समझता है। अब तक बहुत से अखबार भी अपनी छापी झूठी बातों के साथ भी इसलिए चलते रहते हैं क्योंकि उनके खिलाफ कोई अदालत तक जाने को लोग वक्त, खर्च और इज्जत की और अधिक बर्बादी मानते हैं। लेकिन इंटरनेट के मामले में चूंकि कानून बहुत अधिक कड़ा है इसलिए लोग इसे छोटी बर्बादी मानते हुए झूठे को बर्बाद करना भी तय कर सकते हैं।

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