इसे यही खत्म किया जाए?

05 सितंबर 2011
आजकल
सुनील कुमार
इन दिनों इंटरनेट पर ट्विटर नाम के एक ऐसे वेबसाईट पर मेरा खासा वक्त गुजरता है जिस पर लोग अपनी बातों को कुल 140 अक्षरों में टाईप करके डाल सकते हैं। इस गिनती में शब्दों के बीच की खाली जगह भी गिनी जाती है और इसलिए बहुत कम में अपनी बात कहनी होती है। लोग इससे निपटने का एक यह रास्ता निकाल लेते हैं कि अंगे्रजी के शब्दों के हिज्जों को वे इस तरह बदल देते हैं कि अक्षर कम हो जाएं लेकिन लोगों को बात फिर भी समझ आ जाए। लोग एक-दूसरे की कही हुई बातों पर अपनी राय भी लिख सकते हैं, किसी की बात को अपने नाम के साथ आगे भी बढ़ा सकते हैं और हमारी तरह वहां से चुनिंदा बातों को निकालकर अखबार में छाप भी सकते हैं।
जब लगातार ट्विटर के इस्तेमाल से कम शब्दों में किसी बात को पढऩा और कम शब्दों में लिखना होता है तो धीरे-धीरे जिंदगी में एक किस्म की किफायत आने लगती है। इंटरनेट पर मुफ्त में हासिल ट्विटर का कुछ लोग यह नुकसान भी देख सकते हैं कि मुफ्त होने से लोग यहां रोज दर्जनों या उससे भी अधिक बातें डाल सकते हैं और पिछली बात को सुधारकर भी डाल सकते हैं इसलिए एक लापरवाही और फिजूलखर्ची इंटरनेट के साथ जुड़ी रहती है।
एक समय जब टेलीग्राफ का इस्तेमाल होता था तब उसे भेजने के लिए हर शब्द के पैसे लगते थे और जब लोगों को अपनी बात कम शब्दों में लिखना नहीं आता था तो तारघर का कर्मचारी कटौती सुझाता था। धीरे-धीरे वे तार खत्म होते चले गए जिनके बारे में एक वक्त ऐसी दहशत होती थी कि तार आने पर उसे खोला बाद में जाता था किसी बीमार रिश्तेदार को याद करके रोना-पीटना पहले शुरू हो जाता था। उस वक्त एक मजेदार लाईन कही जाती थी-चि_ी को तार समझना और बीमार को पार समझना।
इसके बाद कुछ बरसों का फासला रहा और मोबाईल फोन पर एसएमएस आ गया। लेकिन मोबाईल फोन टेलीग्राम की तरह दो लोगों के बीच की ही बात इधर-उधर करता है, उस पर कोई बात ऐसी नहीं रहती जिसे कि इंटरनेट की तरह सभी लोग एक साथ देख सकें। इस मायने में ट्विटर एक बिल्कुल अलग किस्म का तजुर्बा रहा जिसे लोगों ने हाथों-हाथ ले लिया। इससे लोगों को हर पल यह देखने मिल जाता है कि दुनिया में कहां, कौन, किस मुद्दे पर क्या ट्वीट कर रहा है। खैर, इसे पूरी तरह समझने के लिए तो लोगों को इंटरनेट पर ही जाना होगा, लेकिन आज इस बात से चर्चा शुरू करने का मकसद जिंदगी में किफायत पर कुछ चर्चा करना है।
इसकी जरूरत इसलिए लगी कि पिछले कुछ हफ्तों में दिल्ली में चल रही हवा के झोंके पूरे-पूरे दिन या पूरी-पूरी रात झेलने वाले टीवी समाचार दर्शकों को डॉक्टर के पास जाने की नौबत आ रही है जो कि अकड़ी हुई कमर या अकड़ी हुई गर्दन को देखकर यह पूछते हैं कि क्या लगातार कई घंटे टीवी के सामने बैठने के बाद यह तकलीफ हुई है? टीवी हो या अखबार, या जिंदगी का कोई और दायरा, अगर किफायत न बरती गई तो जिंदगी एक ऐसे अंतहीन फैले हुए बरगद की तरह है जिस पर इंसान चींटी की तरह घूमते हैं। मतलब यह कि पूरी जिंदगी लगाने के बाद भी न उतना किया जा सकता, न उतना देखा जा सकता, न उतना सुना जा सकता और उतना लुत्फ उठाया जा सकता जितना कि रोज नया पैदा हो रहा है। जितनी देर में कोई एक अच्छी किताब पढ़ सकता है, उतनी देर में दुनिया में शायद सैकड़ों उतनी ही, या उससे भी, अच्छी किताबें और छप जाती हैं। इसलिए वक्त के इस्तेमाल और अपने तन-मन-धन के इस्तेमाल में अगर लोग सावधान नहीं रहेंगे तो वे अच्छी चीजों के करीब भी नहीं पहुंच पाएंगे और बेमायने चीजों में उलझकर वक्त को बर्बाद कर देंगे।
ट्विटर जैसी किफायत को अगर कोई गंभीरता से लेता है तो वह कुछ उसी तरह का काम है जिस तरह अखबार में खबरों के पन्ने बनाते हुए जब अखबारनवीस सुर्खियां तय करते हैं तो एक-एक शब्द, एक-एक अक्षर और एक-एक मात्रा में कटौती करके कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक मतलब को सामने रखने की कोशिश करते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि इस किस्म के पेशे में लगे हुए लोग जिंदगी के दूसरे दायरों में भी इस किफायत का जाने-अनजाने इस्तेमाल तो करते ही हैं। यह किफायत लोगों के मिजाज में आ सकती है अगर वे किफायत की सोच के लिए ईमानदार हों।
यह बात किसी को छोटी लग सकती है लेकिन हमसे ठीक एक पीढ़ी पहले के बुजुर्ग ऐसे होते थे जो घर के कमरों से गुजरते हुए लाईट और पंखा बंद करते चलते थे। जो खाना पकने के साथ ही उसी वक्त खा लेते थे ताकि दुबारा गर्म करने की नौबत न आए। जो बाजार से सामान के साथ आने वाले प्लास्टिक के थैलों को संभालकर रख देते थे कि उनका दुबारा इस्तेमाल हो सके। यह पीढ़ी कई किस्म की किफायतों से चलती थी, और धरती अगर बची हुई है तो ऐसे ही मिजाज के चलते हुए बची हुई है। आज अमरीकी तौर-तरीकों से अगर बाकी दुनिया भी चलने लगे तो इंसान धरती पर रोज इतना कूड़ा पैदा कर देंगे कि जिसे धरती जिंदगी भर में नहीं निपटा पाएगी। यह तो गनीमत है कि धरती के बाकी लोग बददिमाग अमरीकियों की तरह नहीं हैं कि जो चर्बी चढ़ाने के सामान ढेर-ढेर पैकिंग में लाएं और फिर चर्बी घटाने के लिए ढेर-ढेर बिजली और खर्च करें।
जिस अमरीका से एसएमएस या ट्विटर जैसी चीजें निकली हैं वहां के लोगों की असल जिंदगी पर भी अगर इस किफायत का एक साया पड़ा होता तो धरती पर कचरे के बढऩे और धरती के बेजा इस्तेमाल, इन दोनों में एक बड़ी कटौती हुई रहती। इसीलिए मैंने ऊपर लिखा कि किफायत के लिए सोच में अगर लोग ईमानदार हों तो ही भला हो सकता है। किफायत की सोच अगर महज दिखावे की हो तो लोग गांधी की तरह इस्तेमाल हो चुके लिफाफों के पीछे के कागज को लिखने में तो काम ला सकते हैं लेकिन जिंदगी के किसी दूसरे दायरे में वे सामानों की भयानक बर्बादी भी कर सकते हैं।
अगर कोई सच ही किफायत बरतना चाहता है तो यह जिंदगी में एक बड़ा दिलचस्प तजुर्बा भी हो सकता है। कुछ वक्त पहले इसी कॉलम में या कहीं और मैंने यह सुझाया था कि सचिन तेंदुलकर से लेकर अमिताभ बच्चन तक, बहुत से मशहूर लोग अगर इतना ही करने लगें कि अपने जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़ों को बिना पे्रस किए पहनने लगें तो कपड़ों पर खर्च होने वाली बिजली में एक बड़ी कटौती हो सकती है। अगर लोग इतना करने लगें कि वे नहानी में फौव्वारे की जगह बाल्टी में पानी लेकर नहाने लगें, तो भी पानी की खासी बचत हो सकती है। लोग कारों की जगह कभी-कभी स्कूटर-मोटरसाइकिल चलाने लगें, इनकी जगह कभी सायकिल चलाने लगें तो उनकी सेहत भी बेहतर रहेगी और यह धरती भी कुछ अधिक वक्त जिंदा रह सकेगी। इसलिए किफायत के फायदे गिने-चुने नहीं हैं। एक इंसान के किफायत दूसरों को राह भी दिखा सकती है और जिस तरह कोई अफवाह फैलती है, संक्रामक बीमारी फैलती है, उसी तरह किफायत भी फैल सकती है।
लेकिन इस बात को करते हुए यह लगता है कि मिनटों की फिजूलखर्ची के लिए जिन टेलीविजन समाचार चैनलों को मैं आए दिन कोसते रहता हूं वैसी फिजूलखर्ची तो अखबारों में पन्नों के हिसाब से होती है। बीस-बीस पेज के अखबार शायद दस पेज में आसानी से निकल सकते हैं, लेकिन शब्द और अर्थ में कटौती करने के लिए जिस हुनर और मेहनत की जरूरत होती है, उसे न जुटाकर अखबार पन्ने बढ़ाते चलते हैं। नतीजा यह होता है कि चार लाईनों की बात को जब चौदह लाईनों में टाईप किया जाता है तो कागज भी अधिक खर्च होता है, स्याही भी अधिक लगती है और ऐसे घूरे में से काम की बात ढूंढते हुए अखबार के पाठक का वक्त भी अधिक खर्च होता है। तो ऐसा नहीं कि किफायत की जरूरत दूसरों को ही है और ऐसी नसीहत छापने वाले मीडिया को नहीं।
बातों को दुहराने में और अधिक फिजूलखर्ची करने के बजाय इसे यही खत्म किया जाए?



 

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