चबूतरों पर चढ़े लोगों को आसपास चारों तरफ के कुकर्म दिखने चाहिए

28 अक्टूबर 11
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

चबूतरे पर खड़ी हुई किसी प्रतिमा से जब लोगों को बहुत सी उम्मीदें बंधी हुई हों, तो उसका टुकड़े-टुकड़े होकर गिरना अच्छा नहीं लगता। टीम-अन्ना के नाम से जो टोली आज देश में खबरों में बनी हुई है, उसे आम लोगों के एक तबके ने पिछले महीनों में सिर-आंखों पर उठा लिया था और आज उसके एक-एक लोग इन लोगों को निराश करते चल रहे हैं। हमारे पाठकों को इस बात पर कुछ हैरानी और कुछ निराशा हो रही थी कि हम अन्ना हजारे के आंदोलन के शुरूआती कुछ दिनों के बाद उससे निराश क्यों हो गए थे, और धीरे-धीरे हम उसके आलोचक क्यों बनते चले गए। हमारे तर्क तो हम बार-बार, इतनी बार लिख चुके हैं कि यहां उन्हें दुहराने की जरूरत नहीं है, और न ही आज इस मुद्दे पर लिखने का कोई मकसद दिग्विजय सिंह के आरोपों के अभियान से जुड़ा है। हम टीम-अन्ना के इंसानी होने के साबित होने को लेकर आज यहां चर्चा कर रहे हैं क्योंकि इसके तमाम लोग चबूतरों पर चढ़कर जिंदा स्मारक से बने हुए एक ऐसे आदर्शवाद की चर्चा में लगे थे, उसके दावे कर रहे थे, उससे कम कुछ भी देश के नेताओं और अफसरों से नहीं चाह रहे थे, जो कि इनमें से किसी के लिए आज मुमकिन नहीं दिख रहा है।
हम एक-एक करके तमाम लोगों की बात करें, तो पहले अन्ना हजारे के आंदोलन से वे बाबा रामदेव अलग हुए जो कि घोर धार्मिक ताकतों के साथ जुड़कर, तथाकथित रूप से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अभियान चला रहे थे, लेकिन जिनका सारा अभियान धार्मिक प्राथमिकताओं पर टिका होने की वजह से बाबा की तोप कभी भी बेंगलुरू के भाजपा के उस मुख्यमंत्री, बाकी मंत्रियों की तरफ नहीं घूम पाई थी जो आज जेलों में है या कटघरों में। लगे हाथों हम अन्ना हजारे के आंदोलन से समय-समय पर जुडऩे वाले, आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्री रविशंकर की बात कर लें, जो कि बेंगलुरू में ही बसे हुए हैं, लेकिन येदियुरप्पा सरकार के ऐतिहासिक भ्रष्टाचार का वर्तमान भी उन्हें नहीं दिख पाया, मानो उनकी करीब की नजर कमजोर हो और चश्मा कहीं छूट गया हो। रविशंकर भी अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े रहे और उनकी कमजोरियां भी टीम-अन्ना की कमजोरियों के साथ जोड़े बिना नहीं देखी जा सकतीं। इसके बाद देखें तो अरविंद केजरीवाल की बारी आती है। पिछले कुछ महीनों में अखबारों और खासकर टीवी पर जो सबसे अहंकारी और बदमिजाज हिंदुस्तानी देखने में आया है, वह नैतिकता के पैमाने पर बुरी तरह से, और पूरी तरह से फिसला हुआ साबित हुआ। टीम-अन्ना के इस प्रवक्ता और उनके एक किस्म से दाएं हाथ, से जब भारत सरकार के आयकर विभाग ने नौ लाख से अधिक की वसूली निकाली तो केजरीवाल ने यह तर्क दिया कि वे एक नेक काम, सूचना के अधिकार आंदोलन, में लगे थे इसलिए सरकार चाहे तो यह वसूली माफ कर सकती है। इस देश की गरीबी को गिना-गिनाकर जो टीम अन्ना पूरे देश में एक नैतिकता और चेतना को फैलाने का काम कर रही है, उसके लोग अपने निजी खर्च को बचाने के लिए सरकार को माफी का विकल्प सुझा रहे हैं और यह तर्क ले रहे हैं कि उनके पास कोई पैसा नहीं है। यहां पर देश के लोगों को यह जानने और समझने की जरूरत है कि अरविंद केजरीवाल की पत्नी केंद्र सरकार में उसी दर्जे की आईआरएस अफसर हैं जिस दर्जे का काम छोड़कर अरविंद सामाजिक आंदोलन में उतरे थे। हम किसी के घर की गुल्लक में झांकना तो नहीं चाहते, लेकिन हमारी एक सामान्य जिज्ञासा यह है कि इतने बरसों की नौकरी के बाद अगर मोटी तनख्वाह वाली पत्नी के रहते हुए वे किस तरह सरकार से इस वसूली को भूल जाने की मांग कर रहे हैं? नौ लाख रूपए की वसूली इस देश के कितने गरीबों से सरकार भूल जाती है? जिस देश में फुटपाथ के फेरीवालों से पचीस-पचास रूपए का चालान भी सरकारें वसूलती हों वहां पर नौ लाख से अधिक रूपए भूल जाने की भयानक आक्रामक अंदाज वाली, गालियों और कोसने से भरी हुई सलाह को हम किस आधार पर नैतिक और सही मानें?
अब टीम-अन्ना के एक दूसरे हाथ को देखें तो किरण बेदी अपने ताजा घोटाले की वजह से सुर्खियों में हैं। इस अखबार ने किरण बेदी के छत्तीसगढ़ आने और जाने को लेकर टिकटों के बिल सहित यह छापा है कि किस तरह उन्होंने नौ हजार रूपए के एक सफर के लिए सैंतीस-सैंतीस हजार रूपए के बिल दो अलग-अलग आयोजकों को थमा दिए थे, उनका भुगतान करने के लिए किरण बेदी के दफ्तर ने दबाव डाला था लेकिन बाद में इन आयोजकों के कड़े रूख के चलते वह उगाही नहीं हो पाई थी। अब जाकर किरण बेदी के ट्रस्ट ने आयोजकों से देश भर में की गई ऐसी अधिक वसूली को लौटाने का फैसला लिया है और उनके टै्रवल एजेंट ने उनके ट्रस्ट से इस्तीफा भी दे दिया है। हमारे पास की जानकारी यह कहती है कि यह घोटाला अभी कई और सुबूत सामने लाने वाला है।
अब हम आएं टीम-अन्ना की पिता-पुत्र की जोड़ी, प्रशांत भूषण और शांति भूषण पर। देश के इन सबसे बड़े वकीलों की जोड़ी को हम अपने अखबार में बहुत ही प्रमुखता से बरसों से छापते आए हैं क्योंकि अदालत की अवमानना का खतरा उठाकर, जेल जाने का खतरा उठाकर भी ये लोग अदालती भ्रष्टाचार के खिलाफ लगे हुए हैं। लेकिन जैसा कि हम कह रहे हैं कि किसी भी इंसान के लिए सौ फीसदी ईमानदारी मुमकिन नहीं है, नेताओं और अफसरों के लिए भी नहीं है, ऐसा ही एक मामला अभी हमें शांति भूषण का मिला है जिसमें पैसों की बेईमानी नहीं है, लेकिन नैतिकता का एक सवाल हम उसमें जरूर देख रहे हैं और टीम-अन्ना जिस आला दर्जे की नैतिकता की बात करती है तो उसे देखते हुए हमें यह सवाल उठाना लाजिमी लगता है। अभी शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में खुद ही अपनी बाईपास सर्जरी के खर्च को लेकर आयकर से रियायत पाने के लिए एक मामला दायर किया है। उन्होंने अपने ही मामले की वकालत करते हुए अदालत से कहा कि जिस तरह एक गेंदबाज को अपने जख्मी हाथ के इलाज के खर्च पर टैक्स की छूट मिलती है, या किसी गायक को उसके गले की ऑपरेशन के खर्च पर टैक्स की छूट मिलती है तो एक वकील को उसके दिल ऑपरेशन पर टैक्स की छूट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? उन्होंने कहा कि उनका दिल वकालत के उनके काम के लिए एक प्लांट (संयंत्र) की तरह है और वकालत के पेशे में इस 'प्लांटÓ की मरम्मत पर आए खर्च में टैक्स की छूट मिलनी चाहिए। शांति भूषण आयकर विभाग, ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट से मामला हारते हुए यहां तक पहुंचे हैं और अब वे सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में राहत चाहते हैं। हम शांति भूषण के तर्कों पर तो बहुत अधिक जाना नहीं चाहते लेकिन क्या देश के दूसरे पेशों में लगे हुए, गरीब लोगों के साथ यह एक इंसाफ होगा कि सौ-पचास करोड़ के मालिक वकील को अपने दिल को एक फैक्ट्री की तरह साबित करके उसकी मरम्मत पर टैक्स की छूट पाने का हक दिया जाए? हो सकता है कि कानून के तहत ऐसी राहत शांति भूषण पा भी लें, लेकिन हमें यह हैरानी होती है कि इस गरीब देश में टैक्स देने से इस कदर बचने की कोशिश करने वाले करोड़ या अरबपतियों का यह काम क्या नैतिकता के दायरे में भी आएगा? या फिर ऐसी मिसाल पेश करेगा जिससे कि देश के लाखों करोड़पति टैक्स बचाने का रास्ता पा जाएंगे?
यहां पर हम उन तमाम बातों को दुहराना नहीं चाहते जिन्हें गिनाकर पिछले दिनों टीम-अन्ना के दो प्रमुख सदस्यों, राजेन्द्र सिंह और पी.वी. राजगोपाल अलग हुए हैं, उन्होंने हिसार के चुनाव में टीम-अन्ना के कुछ लोगों द्वारा चुनाव प्रचार के फैसले को सामाजिक आंदोलन के दायरे से परे बताया है और केजरीवाल सहित कुछ लोगों को अहंकारी बताते हुए उनके साथ काम करने में मुश्किलें बताई हैं। इसी टीम के एक भूतपूर्व सदस्य स्वामी अग्निवेश के आरोपों को हम यहां पर अधिक वजन देना नहीं चाहते क्योंकि वे खुद कुछ आरोपों से घिरे हुए हैं, लेकिन उनकी बातों को इस प्रसंग में लोग पढ़कर उनका वजन खुद तय करें।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त टीम-अन्ना के एक कवि और गायक सदस्य कुमार विश्वास से जुड़ी एक खबर आ रही है कि उन्होंने इस टीम को भंग करने की मांग की है। उनके खुद के बारे में उनके गाजियाबाद के लाजपत राय कॉलेज का कहना है कि वह बिना छुट्टी लिए कॉलेज से अक्सर गायब रहते हैं। कॉलेज का दावा है कि उसने कुमार विश्वास को कई बार नोटिस भी जारी कर रखा है। सिर्फ अन्ना आंदोलन के लिए ही नहीं कॉलेज का कहना है कि अपने निजी कामों के लिए भी कॉलेज आने को लेकर उनका यही रवैया रहा है। कॉलेज प्रशासन के मुताबिक साल में वो दस से 20 फीसदी ही कॉलेज आते हैं।
अब यह सिलसिला चलते रहेगा और नैतिकता और वैधानिकता के ऊंचे-ऊंचे चबूतरों पर अपने घर से लाई हुई सीढिय़ों से चढ़े हुए लोगों के कतरे नीचे गिर रहे हैं और जनता की उम्मीदों को कुचल रहे हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या? वैसे यहां पर हम देश के लोगों से यह पूछना चाहते हैं कि उन्होंने बाबा, अन्ना, श्रीश्री, और बाकी टीम-अन्ना से अपने ही बीच के जस्टिस हेगड़े की रिपोर्ट पर मुंह खोलते देखा है क्या, जिस रिपोर्ट में भाजपा की सरकार को सोलह हजार करोड़ रूपए की सोची-समझी साजिश वाली भ्रष्ट चोरी का गुनहगार ठहराया गया है। चबूतरों पर चढ़े लोगों को आसपास चारों तरफ के कुकर्म दिखने चाहिए, चबूतरे और गली में यह फर्क तो रहता ही है।

छोटी सी बात


25 अक्टूबर
दीवाली पर एक जगह से आए मेवे-मिठाई के डिब्बों को दूसरी जगह भेजने के पहले देख लें कि कुछ सड़ा, कीड़ा लगा तो नहीं है...

अपने-आपको बेचने के हुनर और बाजार के औजारों के दिन

25 अक्टूबर 20111
संपादकीय
टेलीविजन के चैनलों को देखें तो समाचार स्टूडियो से लेकर रियलिटी शो के बीच तक, अमिताभ से लेकर शाहरूख तक बड़े-बड़े सितारे अपनी फिल्मों के प्रचार में रात-दिन एक करते दिखते हैं। शाहरूख ने पिछले दिनों ट्विटर पर कई बार लिखा कि किस तरह उनकी नींद भी पूरी नहीं हो रही है और वे अपने बच्चों से भी नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसा ही हाल समाचार चैनलों के सितारों का है, वे रात-दिन अपने कार्यक्रमों को ट्विटर और फेसबुक पर आगे बढ़ाते हुए इतना समय वहां लगाते दिखते हैं जितना समय वे अपने कार्यक्रमों में लगाते होंगे। बड़े-बड़े नामी-गिरामी लेखक भी अपनी किताबों को बढ़ावा देते लगे रहते हैं और पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लिखने वाले चर्चित स्तंभकार भी यह बताते रहते हैं कि उन्होंने क्या लिखा है।
अब कला, साहित्य से लेकर पत्रकारिता तक का काम बाजार में अपने सामान को बढ़ावा देने पर आ टिका है। यह जरूरी नहीं कि कोई अच्छी फिल्म बनाए, अच्छा अभिनय करे, अच्छा उपन्यास या कॉलम लिखे, जरूरी यह है कि वे इस काम को करने के बाद बाजार में उस सामान को कितने लोगों पर असर डालकर बेच पाते हैं। यह काम इतनी रफ्तार से हो गया है कि पुराने अंदाज में काम करने वाले लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिल पाया। फिल्म को एक कला माना जाता था, अभिनय को उसके भीतर की एक अलग कला, उपन्यास को रचना माना जाता था, पत्रकारिता को एक जिम्मेदारी का गंभीर लिखना माना जाता था, लेकिन वह सब एकदम से लद गया। अब एक फेरीवाले की तरह आवाज लगा-लगाकर लोग अपनी इस कला को कितना बेच पाते हैं, कितनी चर्चा में अपनी काम और सामान को ला पाते हैं, यह देखते ही बनता है।
यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि अब उत्कृष्टता और प्रतिभा के सारे पैमाने बाजार की सफलता से तय होने लगे हैं, फिर चाहे वह किसी बड़े अखबारनवीस की बनाई रिपोर्ट ही क्यों न हो। इंटरनेट पर समाचारों की वेबसाईटें ये गिनते चलती हैं कि किस पेज पर किस देश का इंसान पहुंचा, और शायद यह भी कि ऐसे लोग उस पेज पर कितनी देर रूके। इससे उस समाचार चैनल, अखबार या समाचार वेबसाईट के भीतर लोगों का महत्व कम या ज्यादा होते चलता है। ऐसा ही महत्व अगर गिनती के आधार पर अखबारों का तय होते चलता, तो सबसे गंभीर और भरोसेमंद अखबार चर्चा में भी नहीं आ पाते और सबसे सनसनीखेज और चटपटे अखबार मार्केटिंग की कामयाबी के साथ मिलकर सबसे अच्छा अखबार कहलाते। गनीमत यह है कि अखबारों की दुनिया में अब तक ऐसा हो नहीं पाया है और कम छपने और बिकने वाले अखबार भी पेरिस-लंदन से लेकर हिंदुस्तान तक अपनी बेहतर पत्रकारिता होने पर अधिक महत्व पाते हैं।
बाजार के तौर-तरीके और अधिक संख्या में ग्राहकों को खींच पाने की मदारीनुमा काबिलीयत आज किसी को अधिक सफल या बेहतर भी साबित कर देती है। अमिताभ और शाहरूख जिस अंदाज में देश-विदेश दौड़-दौड़कर अपनी फिल्मों को बढ़ावा देते हैं, क्या दिलीप कुमार या नसीरूद्दीन शाह के लिए वैसा कुछ मुमकिन होता? आज  बाजार के औजार हर किसी के तौर-तरीके तय करने लगे हैं और यह बात तय है कि किसी की किताब छापने के पहले प्रकाशक इन दिनों यह जरूरी तौलता होगा कि उस किताब या लेखक को लेकर कितने विवाद खड़े हो सकेंगे? अगर कोई भी विवाद नहीं होते दिखेगा तो उस लेखक की अगली किताब को शायद टाईप होना भी मुश्किल से नसीब हो। लेकिन यह नौबत बहुत खराब है और लोगों के बीच के समझदार लोगों को ऐसी बाजार व्यवस्था से परे चीजों को समझने और बाकी लोगों को समझाने की पहल करनी चाहिए। उत्कृष्टता या प्रतिभा गिनती पर चलने वाले या गिनने वाले बाजार के औजार की मुहताज नहीं होनी चाहिए। ऐसे में तो नोबल पुरस्कार भी वोटों या जनमत संग्रह से तय होने लगेंगे। बाजार की इस व्यवस्था के चलते हुए प्रतिभाशाली लोग हाशिए पर पहुंच जा रहे हैं अगर उनमें अपने-आपको बेचने का हुनर न हो।




 

छोटी सी बात


24 अक्टूबर
दीवाली में अगर पटाखों और दियों से कुछ जल जाए तो उसके लिए आग बुझाने का इंतजाम भी रखें और मरहम-पट्टी का भी। डॉक्टर, एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड के नंबर?

रौशनी फैलाने का मौका

24 अक्टूबर 20111
संपादकीय
अगले दो दिन इस अखबार को पढऩे वाले तमाम लोग दीवाली को लेकर तरह-तरह से काम में फंसे रहेंगे और शायद इस जगह आमतौर पर लिखी जाने वाली लंबी और कड़वी बातों के लिए न लोगों के पास वक्त होगा और न ही मुंह का स्वाद ऐसा कड़वा करने का मौसम होगा। इसलिए आज ही किसी दूसरी खबरी बात पर यहां लिखने के बजाय हम यह चर्चा करना चाहेंगे कि साल का यह सबसे अधिक हलचल वाला त्यौहार लोगों को कौन-कौन से मौके देता है।
जैसा कि खुशी के किसी भी मौके पर लोग ईश्वर को याद करके या अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझकर आसपास के अपने से गरीब लोगों को अपनी कुछ खुशियां बांटते हैं, यह मौका भी वैसा ही एक मौका है। लेकिन यह बात सिर्फ कुछ मिठाईयों तक न रहकर कुछ आगे भी बढ़ सकती है। जैसे लोगों के घरों में उनकी जरूरत से अधिक जो सामान कबाड़ की शक्ल में वजन बढ़ाते एक पर एक चढ़ते रहते हैं, वैसे सामानों को लोग अपनी असल जरूरतों को तौलकर उनके जरूरतमंद लोगों को बांट सकते हैं। अपने सीने का बोझ भी कम होता है, दूसरों की जरूरत पूरी होती है और धरती पर सामानों का गैरजरूरी हद तक बनना घटता है। ऐसा तोहफा देना न सिर्फ संपन्न लोगों को सांस लेने को खुली हवा देता है, बल्कि उनको आसपास के लोगों में एक सम्मान भी दिलाता है और यह समाज, धरती, इन सबके प्रति जिम्मेदारी भी पूरी करवाता है। यह काम करने का मौका दीवाली के वक्त इसलिए आता है कि लोग इस मौके पर अपने घर-दूकान-दफ्तर की रंगाई-पोताई करवाते हैं और कुछ नए सामान भी खरीदकर लाते हैं जिनसे कि पुराने सामान कम जरूरी हो ही जाते हैं।
दूसरी तरफ दीवाली का मौका लोगों के यह समझने का भी रहता है कि किस तरह अपने अधिकारों के साथ-साथ दूसरों के अधिकारों और अपनी जिम्मेदारियों को निभाना चाहिए। लोग अपने घरों का कूड़ा जिस तरह आसपास फेंकते हैं उनसे वे अपने ऐसे अधिकारों का दावा करते दिखते हैं जो कि उनका है नहीं, और वे अपनी जिम्मेदारियों से अनजान होना भी साबित करते हैं जिनकी जानकारी उन्हें होना चाहिए। दीवाली के दिनों में जब लोग इतनी तेज आवाज के पटाखे फोड़ते हैं, जिनसे आसपास के लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है तो वे दो बातों को साबित करते हैं कि वे जरूरत से अधिक संपन्न हैं और उसी दर्जे के बदतमीज भी हैं। जब लोग अपनी खुशियों को चारों तरफ फैलाने में लगते हैं तो वह मौका उनके भीतर इंसानियत और सभ्यता, इन दोनों के अंदाज लगाने का भी रहता है। किसी मोहल्ले के लोगों के मन में ऐसे ही वक्त आसपास के गैरजिम्मेदार और बदतमीज लोगों के लिए नफरत पैदा होती है, और धमाके तो चले जाते हैं, नफरत बनी रहती है।
यह मौका और इसी किस्म के दूसरे त्यौहारों या खुशियों के मौके, ऐसे होते हैं जब लोग साल भर उनकी मदद करने वाले लोगों को धन्यवाद कह सकते हैं। इसके लिए कोई महंगा तोहफा लेकर जाना जरूरी नहीं होता, लेकिन उन तक जाना जरूरी होता है। जिन्होंने आपके अच्छे और बुरे वक्त में आपका साथ दिया, उनसे मिलने अगर ऐसे मौकों पर आप जाते हैं, तो आगे की जिंदगी में सुख और दुख में उनकी भागीदारी की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा न करके आप अपने-आपको एक लापरवाह भी साबित करते हैं और इसके लिए कुछ कड़ी जुबान भी इस्तेमाल होती है, जिसे लिखने के लिए आज का यह वक्त सही नहीं है। यह मौका आपकी अपनी क्षमता, पिछले एक बरस में लोगों के आपके जीवन में योगदान, इन दोनों को मिलाकर किसी तोहफे को तय करने का भी होता है। आप अपनी क्षमता के मुताबिक अगर पूजा के बाद लाई-बताशा भी लेकर किसी से जाकर मिलते हैं तो वह भी कम नहीं होता। लेकिन लोगों से मिलना आपको अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को तो याद दिलाता ही है, आपके अपने बच्चे भी इन बातों को देख-देखकर बिना कहे सीखते हैं जो कि उनकी अपनी जिंदगी में बहुत अधिक दूर तक उनके काम आता है।
बहुत साधारण सी लगने वाली ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जिनसे आप अपने आसपास की दुनिया को बेहतर बना सकते हैं। और कोई भी खुशी किसी टापू की तरह अपने समाज और दायरे में अकेली नहीं रह सकती। खुशी को आसपास जो न बांट पाए वह खुद भी लंबे समय तक एक ऐसी खुशी को नहीं पा सकता जो कि सिर्फ बांटने से ही मिल सकती है। अपनी बराबरी के संपन्न लोगों को कोई तोहफा देना इस दर्जे में नहीं आता, और अपनी रौशनी के कतरे उन लोगों तक पहुंचाना ही खुशी है, जिनकी जिंदगी में आज आप सरीखी रौशनी नहीं है।


 

इतिहास दर्ज करता है स्तुति, और चुप्पी दोनों

24 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार

किसी को देखने के दो या उससे भी अधिक नजरिए हो सकते हैं। किसी इंसान की बात करें तो कुछ लोगों को गुजरात में मोदी का और राज्यों से अधिक ईमानदार राज दिख सकता है और कुछ लोगों को मोदी के हाथों पर लगा हुआ लहू। कुछ लोगों को हिटलर में एक ऐसा कलाकार दिखता था जो चित्रकारी करता था, और बाकी लोगों को हिटलर के तन-मन पर उन दसियों लाख बेकसूर यहूदियों के लहू के छींटे दिखते हैं जिनको उसनेे पूरी हैवानियत के साथ मारा था।
अभी दो-तीन दिन पहले जब भारत के एक सबसे अच्छे अखबार द हिंदू के संपादक रहे, और आज भी उसके मालिकों में से एक, एन. राम ने जब ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित अखबार द गार्डियन में छपे एक लेख की सिफारिश की, तो मैं काम के बोझ के बीच भी उस लेख को पढऩे चले गया। तान्या गोल्ड का लिखा हुआ यह लेख एप्पल कंपनी के हाल ही में गुजरे, मौत के कुछ समय पहले तक उसके मुखिया रहे स्टीव जॉब्स के बारे में था कि किस तरह स्टीव जॉब्स को इंसानी कद से बहुत अधिक बड़ा बनाकर खड़ा कर देना एप्पल कंपनी की सबसे बड़ी मार्केटिंग कामयाबी थी। इस लंबे लेख के आखिर तक जो एक बात मुझे नहीं दिखी, वह थी स्टीव जॉब्स के किसी भी समाजसेवा का इतिहास न होने का जिक्र। इस बारे में ब्रिटिश अखबार की वेबसाईट पर मैं अपनी बात कहने गया तो वहां पर पांच से अधिक लोगों का लिखा हुआ मौजूद था। एक लेख पर अगर इतने लोग अपनी राय लिखते हैं तो यह उस अखबार की अहमियत भी बताता है और उसके पाठकों की जागरूकता भी। खैर, अखबार और पाठकों की चर्चा आज का मुद्दा नहीं है, बल्कि आज का मुद्दा यह है कि दुनिया का एक सबसे कामयाब इंसान, जब समाज के लिए कोई मदद छोड़कर नहीं जाता तो इस बात को भी लोग उसकी कामयाबी से परे कैसी आलोचना के साथ देखते हैं।
इसी पखवाड़े स्टीव जॉब्स के बारे में मैंने इसी अखबार के संपादकीय में लिखा था- 'एप्पल कंपनी के सबसे बड़े मुकाबले वाली माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मुखिया बिल गेट्स के रिश्ते स्टीव जॉब्स से दोस्ती के भी रहे और गलाकाट मुकाबले के भी। लेकिन बिल गेट्स ने जिस अंदाज में दुनिया भर में समाज सेवा कर बीड़ा उठाया है और दुनिया भर के उद्योगपतियों को अपनी आधी दौलत समाज के लिए देने के लिए प्रेरित किया है, वैसा कुछ भी स्टीव जॉब्स के साथ जुड़ा हुआ नहीं है। मिट्टी से उठकर उन्होंने एप्पल जैसी कंपनी बनाई, उसे छोड़कर निकल गए, फिर दूसरी कंपनी बनाकर उसकी कमाई से एप्पल को खरीद लिया और उसे तारों से ऊपर तक ले गए, लेकिन उन्होंने समाज के लिए कोई दान किया हो ऐसा किसी को नहीं मालूम है। बल्कि एप्पल पर दुबारा कब्जा करने के बाद उन्होंने उस कंपनी के समाजसेवा के सारे कार्यक्रम बंद भी करवा दिए। इस तरह एक अच्छे कारोबारी की जो जिम्मेदारी समाज के लिए होती है उसमें स्टीव जॉब्स ने शायद अपना आधा खाया जूठा सेब भी किसी भूखे को नहीं दिया। उनकी बहुत सी खूबियों को गिनाते हुए अगर इस बात की चर्चा न की जाए तो यह अधूरी बात ही होगी। उनकी कंपनी को शेयर बाजार में दुनिया की सबसे सफल कंपनी कहा लेकिन यह कंपनी अमरीका की सबसे कम समाज सेवा करने वाली कंपनी भी कहलाई। स्टीव जॉब्स की सामानों और तकनीक, मार्केटिंग और डिजाइन की सारी मौलिकता, बिल गेट्स की समाजसेवा की मौलिकता और आधी दौलत दान देने के अभियान के सामने धरी रह गई।Ó
इसे पढ़कर बहुत से लोगों ने यह शिकायत की कि किसी के मर जाने के बाद तो उसे मैं चैन से जीने दूं। कुछ लोगों का कहना था कि गुजर चुके इंसान की आलोचना नहीं होनी चाहिए। लेकिन शायद यही वजह है कि मैंने कभी भी अभिनंदन गं्रथ या श्रद्धांजलि गं्रथ में लिखने का अनुरोध मंजूर नहीं किया। मेरे कुछ परिचित जब श्रद्धांजलि लेखन करते हुए लोगों के अच्छे और बुरे दोनों का मूल्यांकन किए बिना स्तुति लेखन सा करने लगे, तो उनसे मेरी गहरी असहमति भी रही। यही वजह है कि जब गांधी की जिंदगी के विवादास्पद, और कुछ लोगों के नजरिए से अपमानजनक भी, पहलुओं पर गंभीर लेखकों की किताबें आईं तो मैंने उन किताबों पर रोक के लिए उठी मांग के खिलाफ ही लिखा।
आज की बात को मैं आगे बढ़ाऊं कि किस तरह लोगों ने द गार्डियन की वेबसाईट पर स्टीव जॉब्स के लिए मोटे तौर पर लगभग महज तारीफ वाले लेख पर लिखा है तो उससे शायद हिंदुस्तान के भी कुछ बाजार में कामयाब लोगों को यह लगेगा कि ठोस समाजसेवा के बिना सिर्फ बाजारू कामयाबी उन्हें अमर नहीं बना पाएगी।
एक ने लिखा- 'स्टीव जॉब्स कहीं से भी गांधी नहीं था, न ही चर्चित और न ही मंडेला। वह अपने जैसे और उन लोगों में से एक ही था जो कि चिरअसंतोषी ग्राहक को जीतने में लगे रहते हैं। नरक में जाएं ये तमामÓ।
 'एप्पल छह सौ पौंड दाम के आईफोन को बनाने के लिए चार पौंड से भी कम मजदूरी देता था। स्टीव जॉब्स चाहता तो इसे बदल सकता था, लेकिन उसने ऐसा न करना पसंद किया। कई बार फटेहाल होने के फायदे होते हैं, जिनमें से एक यह है कि आज मैं एप्पल का कोई सामान नहीं खरीद सकता।Ó
 'वह महज एक ऐसा किस्मत वाला बंदा था जिसने कि रईस बच्चों के लिए चमकदार खिलौने बनाकर खरबों कमाए और इन खबरों के बावजूद जिसने दुनिया को कुछ भी वापस नहीं किया, यहां तक कि उस कैंसर की रिसर्च के लिए भी उसने कुछ नहीं दिया था, जो कि दिया होता तो शायद आज वह उसकी जान बचा पाती। मैं ऐसी तमाम चापलूस तारीफों को कोसता हूं। मैं बिल गेट्स को पसंद नहीं करता था, लेकिन अब मैं अपनी राय दुबारा बना रहा हूं क्योंकि उसने दुनिया की तकलीफों को दूर करने का जो बीड़ा उठाया है, उससे मलेरिया जैसी दिक्कतें कम होने जा रही हैंÓ।
इस तरह के सैकड़ों बातें इस अखबार के पढऩे वालों ने लिखी हैं। स्तुतिगान की आज की पत्रकारिता में बाजार में कामयाब इंसान की बाकी खामियों या कमियों को सोच-समझकर अनदेखा करना बहुत आम बात हो चली है। कुछ ही दिनों पहले जब इसी अखबार (छत्तीसगढ़) में हमने देश के एक बड़े उद्योगपति और कांगे्रस के सांसद, चर्चित खिलाड़ी नवीन जिंदल के बारे में यह छापा कि अमरीका के एक विश्वविद्यालय ने अपने एक मैनेजमेंट स्कूल का नाम नवीन जिंदल पर इसलिए रखा है क्योंकि नवीन जिंदल ने वहां पचीस करोड़ रूपए दान दिए हैं। जिंदल के अपने पे्रसनोट में इस बात को बताया नहीं गया था और नवीन जिंदल के बारे में अनगिनत विशेषण उसमें लिखते हुए उनकी कंपनी ने ऐसा जाहिर किया था कि उनकी खूबियों के कारण यह नामकरण किया गया है। देश के बड़े-बड़े अखबारों ने भी जिंदल के नाम पर अमरीकी स्कूल के नामकरण के पीछे की बहुत जाहिर सी संभावित वजह को अनदेखा करते हुए सिर्फ नामकरण की खबर छापी। 'छत्तीसगढ़Ó ने जब अमरीकी विश्वविद्यालय से जानकारी लेकर असली बात छापी तो उसके कई दिन बात समाचार एजेंसी पीटीआई ने इस पर खबर बनाई और उसमें जिंदल ने यह माना कि उन्होंने यह दान दिया है। इसके बाद इस एजेंसी की खबर कुछ अखबारों ने छापी, लेकिन देश के बड़े-बड़े अखबार होने का दावा करने वाले वे तमाम अखबार इससे कतराते रहे जिन्होंने नामकरण की खबर नवीन जिंदल की तस्वीर सहित बड़ी-बड़ी छापी थी।
हमारा निशाना न तो स्टीव जॉब्स है और न ही नवीन जिंदल। यह सिर्फ एक ऐसी चर्चा है जिससे दुनिया के ताकतवर लोगों को यह याद आ जाए और यह अहसास रहे कि बाजार की कामयाबी सब कुछ नहीं होती और समाज के सबसे कमजोर लोगों के लिए जब तक ताकतवर लोग अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जब तक बड़ी सी पारदर्शिता के साथ लगाएंगे नहीं, तब तक वे कम से कम इतिहास में तो बड़े नहीं कहलाएंगे, वर्तमान में तो बाजार की ताकत किसी को भी बड़ा कहलवा ही सकती है, छपवा और दिखवा सकती है। और हम इस सिलसिले में ऐसे किसी दान को दान भी नहीं गिनते जो कि अपने नामकरण के लिए दिया गया हो, जो कि किसी संपन्न देश के संपन्न विश्वविद्यालय को दिया गया हो जबकि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है, और अमरीका में पचीस करोड़ का दान देने वाले नवीन जिंदल इसी छत्तीसगढ़ से कमाकर जा रहे हों। इतिहास सब कुछ दर्ज करता है, उन लोगों की चुप्पी भी।
रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था-
''समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराधÓÓ

बिन मौसम की रथयात्रा जनता का त्यौहार तबाह

23 अक्टूबर 20111
संपादकीय
देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा के सबसे बुजुर्ग और सक्रिय नेता लालकृष्ण अडवानी की रथयात्रा छत्तीसगढ़ आई और यहां से आगे रवाना हो गई। राजधानी रायपुर में एक पूरे दिन जितने लंबे, और दो दिनों में बिखरे उनके इस प्रवास की तैयारी और उनकी जनचेतना रैली से दीवाली के ठीक पहले का बाजार तबाह हो गया। साल के इस सबसे बड़े जश्न वाले त्यौहार के साथ लोगों की कई किस्म की तैयारियां भी जुड़ी रहती हैं और बाजार भी एक बड़ी ग्राहकी के भरोसे में रहता है। इस रैली और आमसभा की तैयारी में और फिर इसके गुजरने के वक्त से लेकर आज सुबह अडवानी की रवानगी तक शहरी रास्तों पर जो रोक-टोक रही उससे राजधानी के लोग हक्का-बक्का थे कि भ्रष्टाचार विरोध की किसी रैली का आज ऐसा क्या महत्व है कि उससे इतने बड़े त्यौहार के ठीक पहले की लोगों की जिंदगी इस हद तक तबाह कर दी जाए?
पिछले छह-आठ महीनों से अडवानी और उनकी भाजपा देश की जनता को दिन में तीन खुराक की तरह अपने बयान यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ देते ही आ रही है। इस बारे में संसद से लेकर अदालतों तक लगातार बहस चल रही है और सड़कों पर बाबा-अन्ना से लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों तक का डेरा डल चुका है, हट भी चुका है। अब ऐसे में अंदरूनी सत्ता-संघर्ष के दौर से गुजर रही भाजपा के रिटायर माने जा रहे नेता लालकृष्ण अडवानी ने एक निहायत निजी फैसले के तहत अपनी इस रथयात्रा को पार्टी पर थोप ही दिया और बाद में बेबस पार्टी ने इस पर अपनी मुहर लगाई। यह जनचेतना रथयात्रा, अडवानी की जिंदगी की पिछली आधा दर्जन रथयात्राओं के बाद की है, और शायद आज तक की उनकी सबसे बेअसर रथयात्रा भी है। इसकी एक वजह यह है कि जब भाजपा खुद कर्नाटक में अपनी सरकार के कुकर्मों को लेकर जेल में बैठी है और कमल के कुछ और फूल मंत्रालयों से जेल की राह पर हैं, तब भ्रष्टाचार के खिलाफ अडवानी का यह निजी आंदोलन न तो भाजपा में किसी तरह उत्साह भर पा रहा है और न ही छत्तीसगढ़ जैसी स्थिति में इसे कोई जनसमर्थन मिल सकता था। भाजपा सत्तारूढ़ है और उसके नेता-कार्यकर्ता सक्षम हैं इसलिए काम के बोझ से लदे लोगों से पटे हुए बाजार के बीच भी तीन दिनों तक अडवानी की तैयारी और कार्यक्रम को लोगों ने झेल लिया, लेकिन इससे न तो किसी का ध्यान उस भ्रष्टाचार की तरफ गया जिसे वैसे भी रात-दिन लोग महीनों से टीवी पर देख रहे हैं, और न ही इससे भाजपा को लोगों की कोई वाहवाही मिली। यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि जो भारतीय जनता पार्टी व्यापारियों के मामलों की अधिक समझ रखने वाली, हिंदूवादी पार्टी मानी जाती है वह व्यापारियों और हिंदुओं के साल भर के इस सबसे बड़े मौके पर इतनी लंबी बाधा खड़ी करने की कैसे सोच पाई? जब अडवानी की रथयात्रा की तारीखें तय हुईं उस वक्त भी पंचांग में और सरकारी कैलेंडर में भी धनतेरस और दीवाली की तारीखें तो दर्ज थी हीं। जनसुविधाओं और जनभावनाओं के साथ इतनी बड़ी छूट लेकर कोई पार्टी अपना कोई भला नहीं कर सकती और देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी किसी रथयात्रा की जरूरत भी थी ही नहीं।
यूं तो लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन हर किसी का पूरा हक है, लेकिन कर्नाटक में जिस तरह भाजपा का पिछला मुख्यमंत्री जेल में पहुंचा हुआ है, कुछ और मंत्री जेल की राह पर हैं, सोलह हजार करोड़ रूपए के लौह अयस्क चोरी के लोकायुक्त के सुबूतों पर अदालतें कार्रवाई कर ही रही हैं, ऐसे में भाजपा अगर सड़कों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन न करती तो भी यूपीए के भ्रष्टाचार के मुकाबले भाजपा का भ्रष्टाचार लोगों को कुछ छोटा लगता और शायद अनदेखा हो जाता। लेकिन जब अडवानी पत्थरों से भरा रथ लेकर दूसरी तमाम सरकारों पर पत्थर चलाते हुए देश भर में घूम रहे हैं तो खुद भाजपा के घर के तरफ भी लोगों की नजरें उठना बढ़ जा रहा है और कर्नाटक की मिसाल लोगों को जरूरत से कई गुना अधिक याद पड़ रही है। मध्यप्रदेश में इसी रथयात्रा के बेहतर कवरेज के लिए पत्रकारों को नगद रिश्वत देने का मामला सामने आने के बाद भाजपा को अपने नेता को पद से हटाना पड़ा, और अब कर्नाटक की अगली संभावित गिरफ्तारियों को देखते हुए अडवानी को बेंगलुरू जाना रद्द करना पड़ा है। जैसा कि हमने कुछ दिनों पहले भी लिखा था, इस रथयात्रा से महज इतना साबित हो रहा है कि लालकृष्ण अडवानी अभी भी अपने-आपको प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की दौड़ में कायम रख रहे हैं और दूसरे कई नेताओं के मुकाबले अपने-आपको अधिक सेहतमंद भी साबित कर रहे हैं। लेकिन उनके इस मकसद के चक्कर में न सिर्फ छत्तीसगढ़ की राजधानी की दीवाली की तैयारियां खराब हुईं बल्कि उनके लंबे सफर की सड़कों पर चल रही रोक-टोक से बहुत अधिक नुकसान हो रहा है। रायपुर से उड़ीसा तक का रास्ता आज जिस तरह से रोक दिया गया है, क्या उससे भाजपा का कोई फायदा होगा?


 

छोटी सी बात

छोटी सी बात
22 अक्टूबर
किसी काम से निकलने के पहले उस रास्ते के अपने बाकी काम भी याद कर लें।  वक्त, ईंधन और मेहनत, सबकी बचत होगी। अगर लोग लिस्ट बनाकर, कम बार निकलें और अदिक काम निपटाएं, तो शहरों में भीड़ भी बचेगी।

लीबिया और मीडिया

22 अक्टूबर 20111
संपादकीय
लीबिया में चालीस बरस तक तानाशाही से राज करने वाले, दुनिया के बड़े बर्बर शासकों में से एक कर्नल मोहम्मद गद्दाफी की बहुत बुरी मौत को अंतरराष्ट्रीय और भारतीय मीडिया ने बहुत मजे लेकर उतनी ही बर्बरता के साथ दिखाया, जितनी बर्बरता से गद्दाफी ने राज किया था या उनके विरोधियों ने बगावत के बाद उन्हें जितनी बर्बरता के साथ वहां की सड़कों पर मारा। यह पूरा सिलसिला खौफनाक है। कोई शासक अपने देश की जनता को इस तरह कुचलकर रखे, आधी सदी तक जुल्म करता रहे और फिर उसी तरह के जुल्म से मारा जाए। लीबिया के बागियों कहें या कि क्रांतिकारियों, यह तो नजरिए की बात होगी, लेकिन किसी लड़ाई में पकड़े गए जिंदा इंसान से एक युद्धबंदी की तरह तो बर्ताव करना ही चाहिए। यह बात अमरीका द्वारा ओसामा बिन लादेन को मारने पर भी लागू होती है, यह बात कश्मीर से लेकर आंध्र के नक्सलियों तक पुलिस और सुरक्षा बलों, सेना द्वारा किसी को जिंदा पकडऩे के बाद मार देने के मामलों में भी लागू होती है और यही बात गद्दाफी के कत्ल पर भी लागू होती है। यह एक अच्छी बात हुई है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हत्या की जांच करने की बात कही है और यह सिलसिला पूरी ईमानदारी से आगे भी जारी रहना चाहिए।
किसी बुरे को बहुत बुरी तरह मौत देने को लेकर आम इंसान की सोच आमतौर पर बहुत बुरी हो जाती है। मामूली इंसान भी कुछ देर को बहुत खूंखार हो जाते हैं और भारत में जो लोग अहिंसक हैं उनके बीच भी इस बात को लेकर नाराजगी रहती है कि पाकिस्तान से आकर हिंदुस्तान पर आतंकी हमला करने वाला कसाब आज तक जेल में जिंदा क्यों रखा गया है? ऐसी शिकायत भावनात्मक रूप से तो जायज होती है लेकिन लोकतंत्र भावनाओं से ऊपर न्याय पर बनी हुई व्यवस्था है जो कि गुनहगार को एक लचीली छूट देने की वजह से कई बार अन्याय भी लगती है। लेकिन लोकतंत्र या तो हो सकता है या फिर कोई व्यवस्था अगर उसके बिना चलाई जाए तो फिर न सिर्फ कसाब के लोकतांत्रिक अधिकार छिनेंगे, बल्कि और के भी छिन जाएंगे। लोकतंत्र को, न्याय को, इंसानियत को टुकड़ों में, छांट-छांटकर मनचाही जगहों पर लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर गद्दाफी की तानाशाही को हटाने लायक माना जाता है तो एक तानाशाह के अंदाज में उनको मारने का काम भी नहीं होना चाहिए।
दुनिया में सजा देने के तौर-तरीके तय किए हुए हैं। इनको कभी हिटलर ने, कभी अमरीका ने और कभी अमरीका की अगुवाई वाले पूरे गिरोह ने कुचलकर रख दिया है। और ऐसे लोगों ने ही, ऐसे देशों ने ही ऐसी परंपराएं शुरू की हैं जो कि बढ़कर दुनिया के बाकी तानाशाहों तक पहुंचती हैं या बाकी आतंकी संगठनों तक पहुंचती हैं। यह सिलसिला इसलिए नहीं टूट पाता कि दुनिया के देशों के बीच तनाव निपटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसा जो संगठन बनाया गया है, वह अमरीका के मातहत काम करने वाला एक दफ्तर बनकर रह गया है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय बेमायने हो चुका है और लोकतंत्र के मसीहा का मुखौटा लगाया हुआ दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा अमरीका दुनिया में हिंसक और गैरकानूनी, अमानवीय तौर-तरीकों को बढ़ावा देते जगह-जगह हमले कर रहा है। उसने ओसामा बिन लादेन को अलोकतांत्रिक, अमानवीय और तानाशाह अंदाज में फौजी हमले में मारा, उसकी तलाश में टीकाकरण जैसे डॉक्टरी अभियान का खुफिया और फौजी इस्तेमाल किया और ओसामा की लाश को मनमाने तरीके से ठिकाने लगाकर ओसामा और उसके परिवार के धार्मिक तरीके से दफन के हक को भी कुचल दिया। यह सिलसिला जब लीबिया के बागी इस्तेमाल करते हैं तो उनके साथ दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े ठेकेदार देश की ऐसी हिंसक मिसालें सामने रहती हैं। हम किसी को भी गैरकानूनी तरीके से मारने के खिलाफ हैं और दुनिया के सबसे बुरे अपराधी को भी सबसे न्यायपूर्ण फैसले के हिमायती हैं। अगर बंदूक की नोंक से ही फैसले होने हैं तो फिर गद्दाफी और उनको मारने वालों में, ओसामा और अमरीका में फर्क ही क्या रह गया?
लेकिन आज इस चर्चा का एक दूसरा पहलू और एक दूसरा मकसद यह भी है कि मीडिया ने जिस खूंखार तरीके से गद्दाफी के कत्ल को दिखाया है, वह उसके बाजारू गलाकाट मुकाबले के हड़बड़ी दिखती है। अब यह लगता है कि दर्शकों को बांधे रखने के लिए खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस कदर हिंसक हो गया है कि उसे दर्शकों की सहनशक्ति की फिक्र भी नहीं रह गई है। इतनी अधिक हिंसा को सोच-समझकर लगातार, बार-बार, कई दिनों तक दिखाना, मीडिया की हमारी समझ से परे है। ऐसा करने में अमरीका के मीडिया को तो मजा आ सकता है क्योंकि अपनी खुद की जमीन पर परले दर्जे के लोकतंत्र और बाकी दुनिया के लिए पूरी तानाशाही वाले अमरीका के लोगों की सोच इस मामले में कुएं के मेंढ़क की तरह की है। लेकिन भारत में मीडिया के ऐसे हिंसक और गैरजिम्मेदार रूख की कोई वजह नहीं है, सिवाय उनके बीच के बाजारू मुकाबले के। हम दुनिया में तानाशाही खत्म होने के हिमायती हैं, लेकिन अमरीका की नीयत तानाशाही खत्म करने की न होकर दुनिया में अकेला तानाशाह बनने की है, और इसलिए पूरी दुनिया में उसकी आतंकी जंग के खतरों को समझने की जरूरत है। इसके बिना आज जो लोग गद्दाफी के खात्मे को जश्न मानकर चल रहे हैं, उनके सामने दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी तानाशाही आना अभी बाकी है और अमरीका उसे पेश करने जा भी रहा है। आखिर में हम यही कहेंगे कि किसी तानाशाह या किसी अपराधी के गैरकानूनी तरीके से मारना, और किसी गैरकानूनी हरकत को लोगों के सामने गैरजिम्मेदाराना तरीके से पेश करना एक ही किस्म की हिंसा है, उसका दर्जा अलग-अलग हो सकता है। भारत में मीडिया के लोगों को, और मीडिया के ग्राहकों को इस बारे में सोचना चाहिए वरना कल भारत के भीतर की गैरकानूनी हिंसा (हम मौत की सजा को कानूनी हिंसा मानते हैं) को भी कमसमझ दर्शकों के सामने ऐसे ही पेश किया जाएगा और हिंसा के लिए उनका बर्दाश्त बढ़ाया जाएगा।

छोटी सी बात


21 अक्टूबर
डॉक्टर के पास जाने के पहले उनकी या बाकी डॉक्टरों की पुरानी पर्चियां, पुरानी जांच रिपोर्ट ले जाना न भूलें। इसके साथ-साथ तकलीफों और सवालों को कागज पर लिखकर तैयारी से जाएं। दवा, खान-पान, सावधानी, सबके बारे में पूछने की तैयारी रखें। व्यस्त डॉक्टरों से आप उसी वक्त सोच-सोचकर नहीं पूछ सकते।