28 अक्टूबर 11
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
चबूतरे पर खड़ी हुई किसी प्रतिमा से जब लोगों को बहुत सी उम्मीदें बंधी हुई हों, तो उसका टुकड़े-टुकड़े होकर गिरना अच्छा नहीं लगता। टीम-अन्ना के नाम से जो टोली आज देश में खबरों में बनी हुई है, उसे आम लोगों के एक तबके ने पिछले महीनों में सिर-आंखों पर उठा लिया था और आज उसके एक-एक लोग इन लोगों को निराश करते चल रहे हैं। हमारे पाठकों को इस बात पर कुछ हैरानी और कुछ निराशा हो रही थी कि हम अन्ना हजारे के आंदोलन के शुरूआती कुछ दिनों के बाद उससे निराश क्यों हो गए थे, और धीरे-धीरे हम उसके आलोचक क्यों बनते चले गए। हमारे तर्क तो हम बार-बार, इतनी बार लिख चुके हैं कि यहां उन्हें दुहराने की जरूरत नहीं है, और न ही आज इस मुद्दे पर लिखने का कोई मकसद दिग्विजय सिंह के आरोपों के अभियान से जुड़ा है। हम टीम-अन्ना के इंसानी होने के साबित होने को लेकर आज यहां चर्चा कर रहे हैं क्योंकि इसके तमाम लोग चबूतरों पर चढ़कर जिंदा स्मारक से बने हुए एक ऐसे आदर्शवाद की चर्चा में लगे थे, उसके दावे कर रहे थे, उससे कम कुछ भी देश के नेताओं और अफसरों से नहीं चाह रहे थे, जो कि इनमें से किसी के लिए आज मुमकिन नहीं दिख रहा है।
हम एक-एक करके तमाम लोगों की बात करें, तो पहले अन्ना हजारे के आंदोलन से वे बाबा रामदेव अलग हुए जो कि घोर धार्मिक ताकतों के साथ जुड़कर, तथाकथित रूप से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अभियान चला रहे थे, लेकिन जिनका सारा अभियान धार्मिक प्राथमिकताओं पर टिका होने की वजह से बाबा की तोप कभी भी बेंगलुरू के भाजपा के उस मुख्यमंत्री, बाकी मंत्रियों की तरफ नहीं घूम पाई थी जो आज जेलों में है या कटघरों में। लगे हाथों हम अन्ना हजारे के आंदोलन से समय-समय पर जुडऩे वाले, आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्री रविशंकर की बात कर लें, जो कि बेंगलुरू में ही बसे हुए हैं, लेकिन येदियुरप्पा सरकार के ऐतिहासिक भ्रष्टाचार का वर्तमान भी उन्हें नहीं दिख पाया, मानो उनकी करीब की नजर कमजोर हो और चश्मा कहीं छूट गया हो। रविशंकर भी अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े रहे और उनकी कमजोरियां भी टीम-अन्ना की कमजोरियों के साथ जोड़े बिना नहीं देखी जा सकतीं। इसके बाद देखें तो अरविंद केजरीवाल की बारी आती है। पिछले कुछ महीनों में अखबारों और खासकर टीवी पर जो सबसे अहंकारी और बदमिजाज हिंदुस्तानी देखने में आया है, वह नैतिकता के पैमाने पर बुरी तरह से, और पूरी तरह से फिसला हुआ साबित हुआ। टीम-अन्ना के इस प्रवक्ता और उनके एक किस्म से दाएं हाथ, से जब भारत सरकार के आयकर विभाग ने नौ लाख से अधिक की वसूली निकाली तो केजरीवाल ने यह तर्क दिया कि वे एक नेक काम, सूचना के अधिकार आंदोलन, में लगे थे इसलिए सरकार चाहे तो यह वसूली माफ कर सकती है। इस देश की गरीबी को गिना-गिनाकर जो टीम अन्ना पूरे देश में एक नैतिकता और चेतना को फैलाने का काम कर रही है, उसके लोग अपने निजी खर्च को बचाने के लिए सरकार को माफी का विकल्प सुझा रहे हैं और यह तर्क ले रहे हैं कि उनके पास कोई पैसा नहीं है। यहां पर देश के लोगों को यह जानने और समझने की जरूरत है कि अरविंद केजरीवाल की पत्नी केंद्र सरकार में उसी दर्जे की आईआरएस अफसर हैं जिस दर्जे का काम छोड़कर अरविंद सामाजिक आंदोलन में उतरे थे। हम किसी के घर की गुल्लक में झांकना तो नहीं चाहते, लेकिन हमारी एक सामान्य जिज्ञासा यह है कि इतने बरसों की नौकरी के बाद अगर मोटी तनख्वाह वाली पत्नी के रहते हुए वे किस तरह सरकार से इस वसूली को भूल जाने की मांग कर रहे हैं? नौ लाख रूपए की वसूली इस देश के कितने गरीबों से सरकार भूल जाती है? जिस देश में फुटपाथ के फेरीवालों से पचीस-पचास रूपए का चालान भी सरकारें वसूलती हों वहां पर नौ लाख से अधिक रूपए भूल जाने की भयानक आक्रामक अंदाज वाली, गालियों और कोसने से भरी हुई सलाह को हम किस आधार पर नैतिक और सही मानें?
अब टीम-अन्ना के एक दूसरे हाथ को देखें तो किरण बेदी अपने ताजा घोटाले की वजह से सुर्खियों में हैं। इस अखबार ने किरण बेदी के छत्तीसगढ़ आने और जाने को लेकर टिकटों के बिल सहित यह छापा है कि किस तरह उन्होंने नौ हजार रूपए के एक सफर के लिए सैंतीस-सैंतीस हजार रूपए के बिल दो अलग-अलग आयोजकों को थमा दिए थे, उनका भुगतान करने के लिए किरण बेदी के दफ्तर ने दबाव डाला था लेकिन बाद में इन आयोजकों के कड़े रूख के चलते वह उगाही नहीं हो पाई थी। अब जाकर किरण बेदी के ट्रस्ट ने आयोजकों से देश भर में की गई ऐसी अधिक वसूली को लौटाने का फैसला लिया है और उनके टै्रवल एजेंट ने उनके ट्रस्ट से इस्तीफा भी दे दिया है। हमारे पास की जानकारी यह कहती है कि यह घोटाला अभी कई और सुबूत सामने लाने वाला है।
अब हम आएं टीम-अन्ना की पिता-पुत्र की जोड़ी, प्रशांत भूषण और शांति भूषण पर। देश के इन सबसे बड़े वकीलों की जोड़ी को हम अपने अखबार में बहुत ही प्रमुखता से बरसों से छापते आए हैं क्योंकि अदालत की अवमानना का खतरा उठाकर, जेल जाने का खतरा उठाकर भी ये लोग अदालती भ्रष्टाचार के खिलाफ लगे हुए हैं। लेकिन जैसा कि हम कह रहे हैं कि किसी भी इंसान के लिए सौ फीसदी ईमानदारी मुमकिन नहीं है, नेताओं और अफसरों के लिए भी नहीं है, ऐसा ही एक मामला अभी हमें शांति भूषण का मिला है जिसमें पैसों की बेईमानी नहीं है, लेकिन नैतिकता का एक सवाल हम उसमें जरूर देख रहे हैं और टीम-अन्ना जिस आला दर्जे की नैतिकता की बात करती है तो उसे देखते हुए हमें यह सवाल उठाना लाजिमी लगता है। अभी शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में खुद ही अपनी बाईपास सर्जरी के खर्च को लेकर आयकर से रियायत पाने के लिए एक मामला दायर किया है। उन्होंने अपने ही मामले की वकालत करते हुए अदालत से कहा कि जिस तरह एक गेंदबाज को अपने जख्मी हाथ के इलाज के खर्च पर टैक्स की छूट मिलती है, या किसी गायक को उसके गले की ऑपरेशन के खर्च पर टैक्स की छूट मिलती है तो एक वकील को उसके दिल ऑपरेशन पर टैक्स की छूट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? उन्होंने कहा कि उनका दिल वकालत के उनके काम के लिए एक प्लांट (संयंत्र) की तरह है और वकालत के पेशे में इस 'प्लांटÓ की मरम्मत पर आए खर्च में टैक्स की छूट मिलनी चाहिए। शांति भूषण आयकर विभाग, ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट से मामला हारते हुए यहां तक पहुंचे हैं और अब वे सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में राहत चाहते हैं। हम शांति भूषण के तर्कों पर तो बहुत अधिक जाना नहीं चाहते लेकिन क्या देश के दूसरे पेशों में लगे हुए, गरीब लोगों के साथ यह एक इंसाफ होगा कि सौ-पचास करोड़ के मालिक वकील को अपने दिल को एक फैक्ट्री की तरह साबित करके उसकी मरम्मत पर टैक्स की छूट पाने का हक दिया जाए? हो सकता है कि कानून के तहत ऐसी राहत शांति भूषण पा भी लें, लेकिन हमें यह हैरानी होती है कि इस गरीब देश में टैक्स देने से इस कदर बचने की कोशिश करने वाले करोड़ या अरबपतियों का यह काम क्या नैतिकता के दायरे में भी आएगा? या फिर ऐसी मिसाल पेश करेगा जिससे कि देश के लाखों करोड़पति टैक्स बचाने का रास्ता पा जाएंगे?
यहां पर हम उन तमाम बातों को दुहराना नहीं चाहते जिन्हें गिनाकर पिछले दिनों टीम-अन्ना के दो प्रमुख सदस्यों, राजेन्द्र सिंह और पी.वी. राजगोपाल अलग हुए हैं, उन्होंने हिसार के चुनाव में टीम-अन्ना के कुछ लोगों द्वारा चुनाव प्रचार के फैसले को सामाजिक आंदोलन के दायरे से परे बताया है और केजरीवाल सहित कुछ लोगों को अहंकारी बताते हुए उनके साथ काम करने में मुश्किलें बताई हैं। इसी टीम के एक भूतपूर्व सदस्य स्वामी अग्निवेश के आरोपों को हम यहां पर अधिक वजन देना नहीं चाहते क्योंकि वे खुद कुछ आरोपों से घिरे हुए हैं, लेकिन उनकी बातों को इस प्रसंग में लोग पढ़कर उनका वजन खुद तय करें।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त टीम-अन्ना के एक कवि और गायक सदस्य कुमार विश्वास से जुड़ी एक खबर आ रही है कि उन्होंने इस टीम को भंग करने की मांग की है। उनके खुद के बारे में उनके गाजियाबाद के लाजपत राय कॉलेज का कहना है कि वह बिना छुट्टी लिए कॉलेज से अक्सर गायब रहते हैं। कॉलेज का दावा है कि उसने कुमार विश्वास को कई बार नोटिस भी जारी कर रखा है। सिर्फ अन्ना आंदोलन के लिए ही नहीं कॉलेज का कहना है कि अपने निजी कामों के लिए भी कॉलेज आने को लेकर उनका यही रवैया रहा है। कॉलेज प्रशासन के मुताबिक साल में वो दस से 20 फीसदी ही कॉलेज आते हैं।
अब यह सिलसिला चलते रहेगा और नैतिकता और वैधानिकता के ऊंचे-ऊंचे चबूतरों पर अपने घर से लाई हुई सीढिय़ों से चढ़े हुए लोगों के कतरे नीचे गिर रहे हैं और जनता की उम्मीदों को कुचल रहे हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या? वैसे यहां पर हम देश के लोगों से यह पूछना चाहते हैं कि उन्होंने बाबा, अन्ना, श्रीश्री, और बाकी टीम-अन्ना से अपने ही बीच के जस्टिस हेगड़े की रिपोर्ट पर मुंह खोलते देखा है क्या, जिस रिपोर्ट में भाजपा की सरकार को सोलह हजार करोड़ रूपए की सोची-समझी साजिश वाली भ्रष्ट चोरी का गुनहगार ठहराया गया है। चबूतरों पर चढ़े लोगों को आसपास चारों तरफ के कुकर्म दिखने चाहिए, चबूतरे और गली में यह फर्क तो रहता ही है।
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
चबूतरे पर खड़ी हुई किसी प्रतिमा से जब लोगों को बहुत सी उम्मीदें बंधी हुई हों, तो उसका टुकड़े-टुकड़े होकर गिरना अच्छा नहीं लगता। टीम-अन्ना के नाम से जो टोली आज देश में खबरों में बनी हुई है, उसे आम लोगों के एक तबके ने पिछले महीनों में सिर-आंखों पर उठा लिया था और आज उसके एक-एक लोग इन लोगों को निराश करते चल रहे हैं। हमारे पाठकों को इस बात पर कुछ हैरानी और कुछ निराशा हो रही थी कि हम अन्ना हजारे के आंदोलन के शुरूआती कुछ दिनों के बाद उससे निराश क्यों हो गए थे, और धीरे-धीरे हम उसके आलोचक क्यों बनते चले गए। हमारे तर्क तो हम बार-बार, इतनी बार लिख चुके हैं कि यहां उन्हें दुहराने की जरूरत नहीं है, और न ही आज इस मुद्दे पर लिखने का कोई मकसद दिग्विजय सिंह के आरोपों के अभियान से जुड़ा है। हम टीम-अन्ना के इंसानी होने के साबित होने को लेकर आज यहां चर्चा कर रहे हैं क्योंकि इसके तमाम लोग चबूतरों पर चढ़कर जिंदा स्मारक से बने हुए एक ऐसे आदर्शवाद की चर्चा में लगे थे, उसके दावे कर रहे थे, उससे कम कुछ भी देश के नेताओं और अफसरों से नहीं चाह रहे थे, जो कि इनमें से किसी के लिए आज मुमकिन नहीं दिख रहा है।
हम एक-एक करके तमाम लोगों की बात करें, तो पहले अन्ना हजारे के आंदोलन से वे बाबा रामदेव अलग हुए जो कि घोर धार्मिक ताकतों के साथ जुड़कर, तथाकथित रूप से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अभियान चला रहे थे, लेकिन जिनका सारा अभियान धार्मिक प्राथमिकताओं पर टिका होने की वजह से बाबा की तोप कभी भी बेंगलुरू के भाजपा के उस मुख्यमंत्री, बाकी मंत्रियों की तरफ नहीं घूम पाई थी जो आज जेलों में है या कटघरों में। लगे हाथों हम अन्ना हजारे के आंदोलन से समय-समय पर जुडऩे वाले, आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्री रविशंकर की बात कर लें, जो कि बेंगलुरू में ही बसे हुए हैं, लेकिन येदियुरप्पा सरकार के ऐतिहासिक भ्रष्टाचार का वर्तमान भी उन्हें नहीं दिख पाया, मानो उनकी करीब की नजर कमजोर हो और चश्मा कहीं छूट गया हो। रविशंकर भी अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े रहे और उनकी कमजोरियां भी टीम-अन्ना की कमजोरियों के साथ जोड़े बिना नहीं देखी जा सकतीं। इसके बाद देखें तो अरविंद केजरीवाल की बारी आती है। पिछले कुछ महीनों में अखबारों और खासकर टीवी पर जो सबसे अहंकारी और बदमिजाज हिंदुस्तानी देखने में आया है, वह नैतिकता के पैमाने पर बुरी तरह से, और पूरी तरह से फिसला हुआ साबित हुआ। टीम-अन्ना के इस प्रवक्ता और उनके एक किस्म से दाएं हाथ, से जब भारत सरकार के आयकर विभाग ने नौ लाख से अधिक की वसूली निकाली तो केजरीवाल ने यह तर्क दिया कि वे एक नेक काम, सूचना के अधिकार आंदोलन, में लगे थे इसलिए सरकार चाहे तो यह वसूली माफ कर सकती है। इस देश की गरीबी को गिना-गिनाकर जो टीम अन्ना पूरे देश में एक नैतिकता और चेतना को फैलाने का काम कर रही है, उसके लोग अपने निजी खर्च को बचाने के लिए सरकार को माफी का विकल्प सुझा रहे हैं और यह तर्क ले रहे हैं कि उनके पास कोई पैसा नहीं है। यहां पर देश के लोगों को यह जानने और समझने की जरूरत है कि अरविंद केजरीवाल की पत्नी केंद्र सरकार में उसी दर्जे की आईआरएस अफसर हैं जिस दर्जे का काम छोड़कर अरविंद सामाजिक आंदोलन में उतरे थे। हम किसी के घर की गुल्लक में झांकना तो नहीं चाहते, लेकिन हमारी एक सामान्य जिज्ञासा यह है कि इतने बरसों की नौकरी के बाद अगर मोटी तनख्वाह वाली पत्नी के रहते हुए वे किस तरह सरकार से इस वसूली को भूल जाने की मांग कर रहे हैं? नौ लाख रूपए की वसूली इस देश के कितने गरीबों से सरकार भूल जाती है? जिस देश में फुटपाथ के फेरीवालों से पचीस-पचास रूपए का चालान भी सरकारें वसूलती हों वहां पर नौ लाख से अधिक रूपए भूल जाने की भयानक आक्रामक अंदाज वाली, गालियों और कोसने से भरी हुई सलाह को हम किस आधार पर नैतिक और सही मानें?
अब टीम-अन्ना के एक दूसरे हाथ को देखें तो किरण बेदी अपने ताजा घोटाले की वजह से सुर्खियों में हैं। इस अखबार ने किरण बेदी के छत्तीसगढ़ आने और जाने को लेकर टिकटों के बिल सहित यह छापा है कि किस तरह उन्होंने नौ हजार रूपए के एक सफर के लिए सैंतीस-सैंतीस हजार रूपए के बिल दो अलग-अलग आयोजकों को थमा दिए थे, उनका भुगतान करने के लिए किरण बेदी के दफ्तर ने दबाव डाला था लेकिन बाद में इन आयोजकों के कड़े रूख के चलते वह उगाही नहीं हो पाई थी। अब जाकर किरण बेदी के ट्रस्ट ने आयोजकों से देश भर में की गई ऐसी अधिक वसूली को लौटाने का फैसला लिया है और उनके टै्रवल एजेंट ने उनके ट्रस्ट से इस्तीफा भी दे दिया है। हमारे पास की जानकारी यह कहती है कि यह घोटाला अभी कई और सुबूत सामने लाने वाला है।
अब हम आएं टीम-अन्ना की पिता-पुत्र की जोड़ी, प्रशांत भूषण और शांति भूषण पर। देश के इन सबसे बड़े वकीलों की जोड़ी को हम अपने अखबार में बहुत ही प्रमुखता से बरसों से छापते आए हैं क्योंकि अदालत की अवमानना का खतरा उठाकर, जेल जाने का खतरा उठाकर भी ये लोग अदालती भ्रष्टाचार के खिलाफ लगे हुए हैं। लेकिन जैसा कि हम कह रहे हैं कि किसी भी इंसान के लिए सौ फीसदी ईमानदारी मुमकिन नहीं है, नेताओं और अफसरों के लिए भी नहीं है, ऐसा ही एक मामला अभी हमें शांति भूषण का मिला है जिसमें पैसों की बेईमानी नहीं है, लेकिन नैतिकता का एक सवाल हम उसमें जरूर देख रहे हैं और टीम-अन्ना जिस आला दर्जे की नैतिकता की बात करती है तो उसे देखते हुए हमें यह सवाल उठाना लाजिमी लगता है। अभी शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में खुद ही अपनी बाईपास सर्जरी के खर्च को लेकर आयकर से रियायत पाने के लिए एक मामला दायर किया है। उन्होंने अपने ही मामले की वकालत करते हुए अदालत से कहा कि जिस तरह एक गेंदबाज को अपने जख्मी हाथ के इलाज के खर्च पर टैक्स की छूट मिलती है, या किसी गायक को उसके गले की ऑपरेशन के खर्च पर टैक्स की छूट मिलती है तो एक वकील को उसके दिल ऑपरेशन पर टैक्स की छूट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? उन्होंने कहा कि उनका दिल वकालत के उनके काम के लिए एक प्लांट (संयंत्र) की तरह है और वकालत के पेशे में इस 'प्लांटÓ की मरम्मत पर आए खर्च में टैक्स की छूट मिलनी चाहिए। शांति भूषण आयकर विभाग, ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट से मामला हारते हुए यहां तक पहुंचे हैं और अब वे सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में राहत चाहते हैं। हम शांति भूषण के तर्कों पर तो बहुत अधिक जाना नहीं चाहते लेकिन क्या देश के दूसरे पेशों में लगे हुए, गरीब लोगों के साथ यह एक इंसाफ होगा कि सौ-पचास करोड़ के मालिक वकील को अपने दिल को एक फैक्ट्री की तरह साबित करके उसकी मरम्मत पर टैक्स की छूट पाने का हक दिया जाए? हो सकता है कि कानून के तहत ऐसी राहत शांति भूषण पा भी लें, लेकिन हमें यह हैरानी होती है कि इस गरीब देश में टैक्स देने से इस कदर बचने की कोशिश करने वाले करोड़ या अरबपतियों का यह काम क्या नैतिकता के दायरे में भी आएगा? या फिर ऐसी मिसाल पेश करेगा जिससे कि देश के लाखों करोड़पति टैक्स बचाने का रास्ता पा जाएंगे?
यहां पर हम उन तमाम बातों को दुहराना नहीं चाहते जिन्हें गिनाकर पिछले दिनों टीम-अन्ना के दो प्रमुख सदस्यों, राजेन्द्र सिंह और पी.वी. राजगोपाल अलग हुए हैं, उन्होंने हिसार के चुनाव में टीम-अन्ना के कुछ लोगों द्वारा चुनाव प्रचार के फैसले को सामाजिक आंदोलन के दायरे से परे बताया है और केजरीवाल सहित कुछ लोगों को अहंकारी बताते हुए उनके साथ काम करने में मुश्किलें बताई हैं। इसी टीम के एक भूतपूर्व सदस्य स्वामी अग्निवेश के आरोपों को हम यहां पर अधिक वजन देना नहीं चाहते क्योंकि वे खुद कुछ आरोपों से घिरे हुए हैं, लेकिन उनकी बातों को इस प्रसंग में लोग पढ़कर उनका वजन खुद तय करें।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त टीम-अन्ना के एक कवि और गायक सदस्य कुमार विश्वास से जुड़ी एक खबर आ रही है कि उन्होंने इस टीम को भंग करने की मांग की है। उनके खुद के बारे में उनके गाजियाबाद के लाजपत राय कॉलेज का कहना है कि वह बिना छुट्टी लिए कॉलेज से अक्सर गायब रहते हैं। कॉलेज का दावा है कि उसने कुमार विश्वास को कई बार नोटिस भी जारी कर रखा है। सिर्फ अन्ना आंदोलन के लिए ही नहीं कॉलेज का कहना है कि अपने निजी कामों के लिए भी कॉलेज आने को लेकर उनका यही रवैया रहा है। कॉलेज प्रशासन के मुताबिक साल में वो दस से 20 फीसदी ही कॉलेज आते हैं।
अब यह सिलसिला चलते रहेगा और नैतिकता और वैधानिकता के ऊंचे-ऊंचे चबूतरों पर अपने घर से लाई हुई सीढिय़ों से चढ़े हुए लोगों के कतरे नीचे गिर रहे हैं और जनता की उम्मीदों को कुचल रहे हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या? वैसे यहां पर हम देश के लोगों से यह पूछना चाहते हैं कि उन्होंने बाबा, अन्ना, श्रीश्री, और बाकी टीम-अन्ना से अपने ही बीच के जस्टिस हेगड़े की रिपोर्ट पर मुंह खोलते देखा है क्या, जिस रिपोर्ट में भाजपा की सरकार को सोलह हजार करोड़ रूपए की सोची-समझी साजिश वाली भ्रष्ट चोरी का गुनहगार ठहराया गया है। चबूतरों पर चढ़े लोगों को आसपास चारों तरफ के कुकर्म दिखने चाहिए, चबूतरे और गली में यह फर्क तो रहता ही है।