लीबिया और मीडिया

22 अक्टूबर 20111
संपादकीय
लीबिया में चालीस बरस तक तानाशाही से राज करने वाले, दुनिया के बड़े बर्बर शासकों में से एक कर्नल मोहम्मद गद्दाफी की बहुत बुरी मौत को अंतरराष्ट्रीय और भारतीय मीडिया ने बहुत मजे लेकर उतनी ही बर्बरता के साथ दिखाया, जितनी बर्बरता से गद्दाफी ने राज किया था या उनके विरोधियों ने बगावत के बाद उन्हें जितनी बर्बरता के साथ वहां की सड़कों पर मारा। यह पूरा सिलसिला खौफनाक है। कोई शासक अपने देश की जनता को इस तरह कुचलकर रखे, आधी सदी तक जुल्म करता रहे और फिर उसी तरह के जुल्म से मारा जाए। लीबिया के बागियों कहें या कि क्रांतिकारियों, यह तो नजरिए की बात होगी, लेकिन किसी लड़ाई में पकड़े गए जिंदा इंसान से एक युद्धबंदी की तरह तो बर्ताव करना ही चाहिए। यह बात अमरीका द्वारा ओसामा बिन लादेन को मारने पर भी लागू होती है, यह बात कश्मीर से लेकर आंध्र के नक्सलियों तक पुलिस और सुरक्षा बलों, सेना द्वारा किसी को जिंदा पकडऩे के बाद मार देने के मामलों में भी लागू होती है और यही बात गद्दाफी के कत्ल पर भी लागू होती है। यह एक अच्छी बात हुई है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हत्या की जांच करने की बात कही है और यह सिलसिला पूरी ईमानदारी से आगे भी जारी रहना चाहिए।
किसी बुरे को बहुत बुरी तरह मौत देने को लेकर आम इंसान की सोच आमतौर पर बहुत बुरी हो जाती है। मामूली इंसान भी कुछ देर को बहुत खूंखार हो जाते हैं और भारत में जो लोग अहिंसक हैं उनके बीच भी इस बात को लेकर नाराजगी रहती है कि पाकिस्तान से आकर हिंदुस्तान पर आतंकी हमला करने वाला कसाब आज तक जेल में जिंदा क्यों रखा गया है? ऐसी शिकायत भावनात्मक रूप से तो जायज होती है लेकिन लोकतंत्र भावनाओं से ऊपर न्याय पर बनी हुई व्यवस्था है जो कि गुनहगार को एक लचीली छूट देने की वजह से कई बार अन्याय भी लगती है। लेकिन लोकतंत्र या तो हो सकता है या फिर कोई व्यवस्था अगर उसके बिना चलाई जाए तो फिर न सिर्फ कसाब के लोकतांत्रिक अधिकार छिनेंगे, बल्कि और के भी छिन जाएंगे। लोकतंत्र को, न्याय को, इंसानियत को टुकड़ों में, छांट-छांटकर मनचाही जगहों पर लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर गद्दाफी की तानाशाही को हटाने लायक माना जाता है तो एक तानाशाह के अंदाज में उनको मारने का काम भी नहीं होना चाहिए।
दुनिया में सजा देने के तौर-तरीके तय किए हुए हैं। इनको कभी हिटलर ने, कभी अमरीका ने और कभी अमरीका की अगुवाई वाले पूरे गिरोह ने कुचलकर रख दिया है। और ऐसे लोगों ने ही, ऐसे देशों ने ही ऐसी परंपराएं शुरू की हैं जो कि बढ़कर दुनिया के बाकी तानाशाहों तक पहुंचती हैं या बाकी आतंकी संगठनों तक पहुंचती हैं। यह सिलसिला इसलिए नहीं टूट पाता कि दुनिया के देशों के बीच तनाव निपटाने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसा जो संगठन बनाया गया है, वह अमरीका के मातहत काम करने वाला एक दफ्तर बनकर रह गया है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय बेमायने हो चुका है और लोकतंत्र के मसीहा का मुखौटा लगाया हुआ दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा अमरीका दुनिया में हिंसक और गैरकानूनी, अमानवीय तौर-तरीकों को बढ़ावा देते जगह-जगह हमले कर रहा है। उसने ओसामा बिन लादेन को अलोकतांत्रिक, अमानवीय और तानाशाह अंदाज में फौजी हमले में मारा, उसकी तलाश में टीकाकरण जैसे डॉक्टरी अभियान का खुफिया और फौजी इस्तेमाल किया और ओसामा की लाश को मनमाने तरीके से ठिकाने लगाकर ओसामा और उसके परिवार के धार्मिक तरीके से दफन के हक को भी कुचल दिया। यह सिलसिला जब लीबिया के बागी इस्तेमाल करते हैं तो उनके साथ दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े ठेकेदार देश की ऐसी हिंसक मिसालें सामने रहती हैं। हम किसी को भी गैरकानूनी तरीके से मारने के खिलाफ हैं और दुनिया के सबसे बुरे अपराधी को भी सबसे न्यायपूर्ण फैसले के हिमायती हैं। अगर बंदूक की नोंक से ही फैसले होने हैं तो फिर गद्दाफी और उनको मारने वालों में, ओसामा और अमरीका में फर्क ही क्या रह गया?
लेकिन आज इस चर्चा का एक दूसरा पहलू और एक दूसरा मकसद यह भी है कि मीडिया ने जिस खूंखार तरीके से गद्दाफी के कत्ल को दिखाया है, वह उसके बाजारू गलाकाट मुकाबले के हड़बड़ी दिखती है। अब यह लगता है कि दर्शकों को बांधे रखने के लिए खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस कदर हिंसक हो गया है कि उसे दर्शकों की सहनशक्ति की फिक्र भी नहीं रह गई है। इतनी अधिक हिंसा को सोच-समझकर लगातार, बार-बार, कई दिनों तक दिखाना, मीडिया की हमारी समझ से परे है। ऐसा करने में अमरीका के मीडिया को तो मजा आ सकता है क्योंकि अपनी खुद की जमीन पर परले दर्जे के लोकतंत्र और बाकी दुनिया के लिए पूरी तानाशाही वाले अमरीका के लोगों की सोच इस मामले में कुएं के मेंढ़क की तरह की है। लेकिन भारत में मीडिया के ऐसे हिंसक और गैरजिम्मेदार रूख की कोई वजह नहीं है, सिवाय उनके बीच के बाजारू मुकाबले के। हम दुनिया में तानाशाही खत्म होने के हिमायती हैं, लेकिन अमरीका की नीयत तानाशाही खत्म करने की न होकर दुनिया में अकेला तानाशाह बनने की है, और इसलिए पूरी दुनिया में उसकी आतंकी जंग के खतरों को समझने की जरूरत है। इसके बिना आज जो लोग गद्दाफी के खात्मे को जश्न मानकर चल रहे हैं, उनके सामने दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी तानाशाही आना अभी बाकी है और अमरीका उसे पेश करने जा भी रहा है। आखिर में हम यही कहेंगे कि किसी तानाशाह या किसी अपराधी के गैरकानूनी तरीके से मारना, और किसी गैरकानूनी हरकत को लोगों के सामने गैरजिम्मेदाराना तरीके से पेश करना एक ही किस्म की हिंसा है, उसका दर्जा अलग-अलग हो सकता है। भारत में मीडिया के लोगों को, और मीडिया के ग्राहकों को इस बारे में सोचना चाहिए वरना कल भारत के भीतर की गैरकानूनी हिंसा (हम मौत की सजा को कानूनी हिंसा मानते हैं) को भी कमसमझ दर्शकों के सामने ऐसे ही पेश किया जाएगा और हिंसा के लिए उनका बर्दाश्त बढ़ाया जाएगा।

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