इतिहास दर्ज करता है स्तुति, और चुप्पी दोनों

24 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार

किसी को देखने के दो या उससे भी अधिक नजरिए हो सकते हैं। किसी इंसान की बात करें तो कुछ लोगों को गुजरात में मोदी का और राज्यों से अधिक ईमानदार राज दिख सकता है और कुछ लोगों को मोदी के हाथों पर लगा हुआ लहू। कुछ लोगों को हिटलर में एक ऐसा कलाकार दिखता था जो चित्रकारी करता था, और बाकी लोगों को हिटलर के तन-मन पर उन दसियों लाख बेकसूर यहूदियों के लहू के छींटे दिखते हैं जिनको उसनेे पूरी हैवानियत के साथ मारा था।
अभी दो-तीन दिन पहले जब भारत के एक सबसे अच्छे अखबार द हिंदू के संपादक रहे, और आज भी उसके मालिकों में से एक, एन. राम ने जब ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित अखबार द गार्डियन में छपे एक लेख की सिफारिश की, तो मैं काम के बोझ के बीच भी उस लेख को पढऩे चले गया। तान्या गोल्ड का लिखा हुआ यह लेख एप्पल कंपनी के हाल ही में गुजरे, मौत के कुछ समय पहले तक उसके मुखिया रहे स्टीव जॉब्स के बारे में था कि किस तरह स्टीव जॉब्स को इंसानी कद से बहुत अधिक बड़ा बनाकर खड़ा कर देना एप्पल कंपनी की सबसे बड़ी मार्केटिंग कामयाबी थी। इस लंबे लेख के आखिर तक जो एक बात मुझे नहीं दिखी, वह थी स्टीव जॉब्स के किसी भी समाजसेवा का इतिहास न होने का जिक्र। इस बारे में ब्रिटिश अखबार की वेबसाईट पर मैं अपनी बात कहने गया तो वहां पर पांच से अधिक लोगों का लिखा हुआ मौजूद था। एक लेख पर अगर इतने लोग अपनी राय लिखते हैं तो यह उस अखबार की अहमियत भी बताता है और उसके पाठकों की जागरूकता भी। खैर, अखबार और पाठकों की चर्चा आज का मुद्दा नहीं है, बल्कि आज का मुद्दा यह है कि दुनिया का एक सबसे कामयाब इंसान, जब समाज के लिए कोई मदद छोड़कर नहीं जाता तो इस बात को भी लोग उसकी कामयाबी से परे कैसी आलोचना के साथ देखते हैं।
इसी पखवाड़े स्टीव जॉब्स के बारे में मैंने इसी अखबार के संपादकीय में लिखा था- 'एप्पल कंपनी के सबसे बड़े मुकाबले वाली माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मुखिया बिल गेट्स के रिश्ते स्टीव जॉब्स से दोस्ती के भी रहे और गलाकाट मुकाबले के भी। लेकिन बिल गेट्स ने जिस अंदाज में दुनिया भर में समाज सेवा कर बीड़ा उठाया है और दुनिया भर के उद्योगपतियों को अपनी आधी दौलत समाज के लिए देने के लिए प्रेरित किया है, वैसा कुछ भी स्टीव जॉब्स के साथ जुड़ा हुआ नहीं है। मिट्टी से उठकर उन्होंने एप्पल जैसी कंपनी बनाई, उसे छोड़कर निकल गए, फिर दूसरी कंपनी बनाकर उसकी कमाई से एप्पल को खरीद लिया और उसे तारों से ऊपर तक ले गए, लेकिन उन्होंने समाज के लिए कोई दान किया हो ऐसा किसी को नहीं मालूम है। बल्कि एप्पल पर दुबारा कब्जा करने के बाद उन्होंने उस कंपनी के समाजसेवा के सारे कार्यक्रम बंद भी करवा दिए। इस तरह एक अच्छे कारोबारी की जो जिम्मेदारी समाज के लिए होती है उसमें स्टीव जॉब्स ने शायद अपना आधा खाया जूठा सेब भी किसी भूखे को नहीं दिया। उनकी बहुत सी खूबियों को गिनाते हुए अगर इस बात की चर्चा न की जाए तो यह अधूरी बात ही होगी। उनकी कंपनी को शेयर बाजार में दुनिया की सबसे सफल कंपनी कहा लेकिन यह कंपनी अमरीका की सबसे कम समाज सेवा करने वाली कंपनी भी कहलाई। स्टीव जॉब्स की सामानों और तकनीक, मार्केटिंग और डिजाइन की सारी मौलिकता, बिल गेट्स की समाजसेवा की मौलिकता और आधी दौलत दान देने के अभियान के सामने धरी रह गई।Ó
इसे पढ़कर बहुत से लोगों ने यह शिकायत की कि किसी के मर जाने के बाद तो उसे मैं चैन से जीने दूं। कुछ लोगों का कहना था कि गुजर चुके इंसान की आलोचना नहीं होनी चाहिए। लेकिन शायद यही वजह है कि मैंने कभी भी अभिनंदन गं्रथ या श्रद्धांजलि गं्रथ में लिखने का अनुरोध मंजूर नहीं किया। मेरे कुछ परिचित जब श्रद्धांजलि लेखन करते हुए लोगों के अच्छे और बुरे दोनों का मूल्यांकन किए बिना स्तुति लेखन सा करने लगे, तो उनसे मेरी गहरी असहमति भी रही। यही वजह है कि जब गांधी की जिंदगी के विवादास्पद, और कुछ लोगों के नजरिए से अपमानजनक भी, पहलुओं पर गंभीर लेखकों की किताबें आईं तो मैंने उन किताबों पर रोक के लिए उठी मांग के खिलाफ ही लिखा।
आज की बात को मैं आगे बढ़ाऊं कि किस तरह लोगों ने द गार्डियन की वेबसाईट पर स्टीव जॉब्स के लिए मोटे तौर पर लगभग महज तारीफ वाले लेख पर लिखा है तो उससे शायद हिंदुस्तान के भी कुछ बाजार में कामयाब लोगों को यह लगेगा कि ठोस समाजसेवा के बिना सिर्फ बाजारू कामयाबी उन्हें अमर नहीं बना पाएगी।
एक ने लिखा- 'स्टीव जॉब्स कहीं से भी गांधी नहीं था, न ही चर्चित और न ही मंडेला। वह अपने जैसे और उन लोगों में से एक ही था जो कि चिरअसंतोषी ग्राहक को जीतने में लगे रहते हैं। नरक में जाएं ये तमामÓ।
 'एप्पल छह सौ पौंड दाम के आईफोन को बनाने के लिए चार पौंड से भी कम मजदूरी देता था। स्टीव जॉब्स चाहता तो इसे बदल सकता था, लेकिन उसने ऐसा न करना पसंद किया। कई बार फटेहाल होने के फायदे होते हैं, जिनमें से एक यह है कि आज मैं एप्पल का कोई सामान नहीं खरीद सकता।Ó
 'वह महज एक ऐसा किस्मत वाला बंदा था जिसने कि रईस बच्चों के लिए चमकदार खिलौने बनाकर खरबों कमाए और इन खबरों के बावजूद जिसने दुनिया को कुछ भी वापस नहीं किया, यहां तक कि उस कैंसर की रिसर्च के लिए भी उसने कुछ नहीं दिया था, जो कि दिया होता तो शायद आज वह उसकी जान बचा पाती। मैं ऐसी तमाम चापलूस तारीफों को कोसता हूं। मैं बिल गेट्स को पसंद नहीं करता था, लेकिन अब मैं अपनी राय दुबारा बना रहा हूं क्योंकि उसने दुनिया की तकलीफों को दूर करने का जो बीड़ा उठाया है, उससे मलेरिया जैसी दिक्कतें कम होने जा रही हैंÓ।
इस तरह के सैकड़ों बातें इस अखबार के पढऩे वालों ने लिखी हैं। स्तुतिगान की आज की पत्रकारिता में बाजार में कामयाब इंसान की बाकी खामियों या कमियों को सोच-समझकर अनदेखा करना बहुत आम बात हो चली है। कुछ ही दिनों पहले जब इसी अखबार (छत्तीसगढ़) में हमने देश के एक बड़े उद्योगपति और कांगे्रस के सांसद, चर्चित खिलाड़ी नवीन जिंदल के बारे में यह छापा कि अमरीका के एक विश्वविद्यालय ने अपने एक मैनेजमेंट स्कूल का नाम नवीन जिंदल पर इसलिए रखा है क्योंकि नवीन जिंदल ने वहां पचीस करोड़ रूपए दान दिए हैं। जिंदल के अपने पे्रसनोट में इस बात को बताया नहीं गया था और नवीन जिंदल के बारे में अनगिनत विशेषण उसमें लिखते हुए उनकी कंपनी ने ऐसा जाहिर किया था कि उनकी खूबियों के कारण यह नामकरण किया गया है। देश के बड़े-बड़े अखबारों ने भी जिंदल के नाम पर अमरीकी स्कूल के नामकरण के पीछे की बहुत जाहिर सी संभावित वजह को अनदेखा करते हुए सिर्फ नामकरण की खबर छापी। 'छत्तीसगढ़Ó ने जब अमरीकी विश्वविद्यालय से जानकारी लेकर असली बात छापी तो उसके कई दिन बात समाचार एजेंसी पीटीआई ने इस पर खबर बनाई और उसमें जिंदल ने यह माना कि उन्होंने यह दान दिया है। इसके बाद इस एजेंसी की खबर कुछ अखबारों ने छापी, लेकिन देश के बड़े-बड़े अखबार होने का दावा करने वाले वे तमाम अखबार इससे कतराते रहे जिन्होंने नामकरण की खबर नवीन जिंदल की तस्वीर सहित बड़ी-बड़ी छापी थी।
हमारा निशाना न तो स्टीव जॉब्स है और न ही नवीन जिंदल। यह सिर्फ एक ऐसी चर्चा है जिससे दुनिया के ताकतवर लोगों को यह याद आ जाए और यह अहसास रहे कि बाजार की कामयाबी सब कुछ नहीं होती और समाज के सबसे कमजोर लोगों के लिए जब तक ताकतवर लोग अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जब तक बड़ी सी पारदर्शिता के साथ लगाएंगे नहीं, तब तक वे कम से कम इतिहास में तो बड़े नहीं कहलाएंगे, वर्तमान में तो बाजार की ताकत किसी को भी बड़ा कहलवा ही सकती है, छपवा और दिखवा सकती है। और हम इस सिलसिले में ऐसे किसी दान को दान भी नहीं गिनते जो कि अपने नामकरण के लिए दिया गया हो, जो कि किसी संपन्न देश के संपन्न विश्वविद्यालय को दिया गया हो जबकि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है, और अमरीका में पचीस करोड़ का दान देने वाले नवीन जिंदल इसी छत्तीसगढ़ से कमाकर जा रहे हों। इतिहास सब कुछ दर्ज करता है, उन लोगों की चुप्पी भी।
रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था-
''समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराधÓÓ

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