बिन मौसम की रथयात्रा जनता का त्यौहार तबाह

23 अक्टूबर 20111
संपादकीय
देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा के सबसे बुजुर्ग और सक्रिय नेता लालकृष्ण अडवानी की रथयात्रा छत्तीसगढ़ आई और यहां से आगे रवाना हो गई। राजधानी रायपुर में एक पूरे दिन जितने लंबे, और दो दिनों में बिखरे उनके इस प्रवास की तैयारी और उनकी जनचेतना रैली से दीवाली के ठीक पहले का बाजार तबाह हो गया। साल के इस सबसे बड़े जश्न वाले त्यौहार के साथ लोगों की कई किस्म की तैयारियां भी जुड़ी रहती हैं और बाजार भी एक बड़ी ग्राहकी के भरोसे में रहता है। इस रैली और आमसभा की तैयारी में और फिर इसके गुजरने के वक्त से लेकर आज सुबह अडवानी की रवानगी तक शहरी रास्तों पर जो रोक-टोक रही उससे राजधानी के लोग हक्का-बक्का थे कि भ्रष्टाचार विरोध की किसी रैली का आज ऐसा क्या महत्व है कि उससे इतने बड़े त्यौहार के ठीक पहले की लोगों की जिंदगी इस हद तक तबाह कर दी जाए?
पिछले छह-आठ महीनों से अडवानी और उनकी भाजपा देश की जनता को दिन में तीन खुराक की तरह अपने बयान यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ देते ही आ रही है। इस बारे में संसद से लेकर अदालतों तक लगातार बहस चल रही है और सड़कों पर बाबा-अन्ना से लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों तक का डेरा डल चुका है, हट भी चुका है। अब ऐसे में अंदरूनी सत्ता-संघर्ष के दौर से गुजर रही भाजपा के रिटायर माने जा रहे नेता लालकृष्ण अडवानी ने एक निहायत निजी फैसले के तहत अपनी इस रथयात्रा को पार्टी पर थोप ही दिया और बाद में बेबस पार्टी ने इस पर अपनी मुहर लगाई। यह जनचेतना रथयात्रा, अडवानी की जिंदगी की पिछली आधा दर्जन रथयात्राओं के बाद की है, और शायद आज तक की उनकी सबसे बेअसर रथयात्रा भी है। इसकी एक वजह यह है कि जब भाजपा खुद कर्नाटक में अपनी सरकार के कुकर्मों को लेकर जेल में बैठी है और कमल के कुछ और फूल मंत्रालयों से जेल की राह पर हैं, तब भ्रष्टाचार के खिलाफ अडवानी का यह निजी आंदोलन न तो भाजपा में किसी तरह उत्साह भर पा रहा है और न ही छत्तीसगढ़ जैसी स्थिति में इसे कोई जनसमर्थन मिल सकता था। भाजपा सत्तारूढ़ है और उसके नेता-कार्यकर्ता सक्षम हैं इसलिए काम के बोझ से लदे लोगों से पटे हुए बाजार के बीच भी तीन दिनों तक अडवानी की तैयारी और कार्यक्रम को लोगों ने झेल लिया, लेकिन इससे न तो किसी का ध्यान उस भ्रष्टाचार की तरफ गया जिसे वैसे भी रात-दिन लोग महीनों से टीवी पर देख रहे हैं, और न ही इससे भाजपा को लोगों की कोई वाहवाही मिली। यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि जो भारतीय जनता पार्टी व्यापारियों के मामलों की अधिक समझ रखने वाली, हिंदूवादी पार्टी मानी जाती है वह व्यापारियों और हिंदुओं के साल भर के इस सबसे बड़े मौके पर इतनी लंबी बाधा खड़ी करने की कैसे सोच पाई? जब अडवानी की रथयात्रा की तारीखें तय हुईं उस वक्त भी पंचांग में और सरकारी कैलेंडर में भी धनतेरस और दीवाली की तारीखें तो दर्ज थी हीं। जनसुविधाओं और जनभावनाओं के साथ इतनी बड़ी छूट लेकर कोई पार्टी अपना कोई भला नहीं कर सकती और देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी किसी रथयात्रा की जरूरत भी थी ही नहीं।
यूं तो लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन हर किसी का पूरा हक है, लेकिन कर्नाटक में जिस तरह भाजपा का पिछला मुख्यमंत्री जेल में पहुंचा हुआ है, कुछ और मंत्री जेल की राह पर हैं, सोलह हजार करोड़ रूपए के लौह अयस्क चोरी के लोकायुक्त के सुबूतों पर अदालतें कार्रवाई कर ही रही हैं, ऐसे में भाजपा अगर सड़कों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन न करती तो भी यूपीए के भ्रष्टाचार के मुकाबले भाजपा का भ्रष्टाचार लोगों को कुछ छोटा लगता और शायद अनदेखा हो जाता। लेकिन जब अडवानी पत्थरों से भरा रथ लेकर दूसरी तमाम सरकारों पर पत्थर चलाते हुए देश भर में घूम रहे हैं तो खुद भाजपा के घर के तरफ भी लोगों की नजरें उठना बढ़ जा रहा है और कर्नाटक की मिसाल लोगों को जरूरत से कई गुना अधिक याद पड़ रही है। मध्यप्रदेश में इसी रथयात्रा के बेहतर कवरेज के लिए पत्रकारों को नगद रिश्वत देने का मामला सामने आने के बाद भाजपा को अपने नेता को पद से हटाना पड़ा, और अब कर्नाटक की अगली संभावित गिरफ्तारियों को देखते हुए अडवानी को बेंगलुरू जाना रद्द करना पड़ा है। जैसा कि हमने कुछ दिनों पहले भी लिखा था, इस रथयात्रा से महज इतना साबित हो रहा है कि लालकृष्ण अडवानी अभी भी अपने-आपको प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की दौड़ में कायम रख रहे हैं और दूसरे कई नेताओं के मुकाबले अपने-आपको अधिक सेहतमंद भी साबित कर रहे हैं। लेकिन उनके इस मकसद के चक्कर में न सिर्फ छत्तीसगढ़ की राजधानी की दीवाली की तैयारियां खराब हुईं बल्कि उनके लंबे सफर की सड़कों पर चल रही रोक-टोक से बहुत अधिक नुकसान हो रहा है। रायपुर से उड़ीसा तक का रास्ता आज जिस तरह से रोक दिया गया है, क्या उससे भाजपा का कोई फायदा होगा?


 

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