25 अक्टूबर 20111
संपादकीय
टेलीविजन के चैनलों को देखें तो समाचार स्टूडियो से लेकर रियलिटी शो के बीच तक, अमिताभ से लेकर शाहरूख तक बड़े-बड़े सितारे अपनी फिल्मों के प्रचार में रात-दिन एक करते दिखते हैं। शाहरूख ने पिछले दिनों ट्विटर पर कई बार लिखा कि किस तरह उनकी नींद भी पूरी नहीं हो रही है और वे अपने बच्चों से भी नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसा ही हाल समाचार चैनलों के सितारों का है, वे रात-दिन अपने कार्यक्रमों को ट्विटर और फेसबुक पर आगे बढ़ाते हुए इतना समय वहां लगाते दिखते हैं जितना समय वे अपने कार्यक्रमों में लगाते होंगे। बड़े-बड़े नामी-गिरामी लेखक भी अपनी किताबों को बढ़ावा देते लगे रहते हैं और पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लिखने वाले चर्चित स्तंभकार भी यह बताते रहते हैं कि उन्होंने क्या लिखा है।
अब कला, साहित्य से लेकर पत्रकारिता तक का काम बाजार में अपने सामान को बढ़ावा देने पर आ टिका है। यह जरूरी नहीं कि कोई अच्छी फिल्म बनाए, अच्छा अभिनय करे, अच्छा उपन्यास या कॉलम लिखे, जरूरी यह है कि वे इस काम को करने के बाद बाजार में उस सामान को कितने लोगों पर असर डालकर बेच पाते हैं। यह काम इतनी रफ्तार से हो गया है कि पुराने अंदाज में काम करने वाले लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिल पाया। फिल्म को एक कला माना जाता था, अभिनय को उसके भीतर की एक अलग कला, उपन्यास को रचना माना जाता था, पत्रकारिता को एक जिम्मेदारी का गंभीर लिखना माना जाता था, लेकिन वह सब एकदम से लद गया। अब एक फेरीवाले की तरह आवाज लगा-लगाकर लोग अपनी इस कला को कितना बेच पाते हैं, कितनी चर्चा में अपनी काम और सामान को ला पाते हैं, यह देखते ही बनता है।
यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि अब उत्कृष्टता और प्रतिभा के सारे पैमाने बाजार की सफलता से तय होने लगे हैं, फिर चाहे वह किसी बड़े अखबारनवीस की बनाई रिपोर्ट ही क्यों न हो। इंटरनेट पर समाचारों की वेबसाईटें ये गिनते चलती हैं कि किस पेज पर किस देश का इंसान पहुंचा, और शायद यह भी कि ऐसे लोग उस पेज पर कितनी देर रूके। इससे उस समाचार चैनल, अखबार या समाचार वेबसाईट के भीतर लोगों का महत्व कम या ज्यादा होते चलता है। ऐसा ही महत्व अगर गिनती के आधार पर अखबारों का तय होते चलता, तो सबसे गंभीर और भरोसेमंद अखबार चर्चा में भी नहीं आ पाते और सबसे सनसनीखेज और चटपटे अखबार मार्केटिंग की कामयाबी के साथ मिलकर सबसे अच्छा अखबार कहलाते। गनीमत यह है कि अखबारों की दुनिया में अब तक ऐसा हो नहीं पाया है और कम छपने और बिकने वाले अखबार भी पेरिस-लंदन से लेकर हिंदुस्तान तक अपनी बेहतर पत्रकारिता होने पर अधिक महत्व पाते हैं।
बाजार के तौर-तरीके और अधिक संख्या में ग्राहकों को खींच पाने की मदारीनुमा काबिलीयत आज किसी को अधिक सफल या बेहतर भी साबित कर देती है। अमिताभ और शाहरूख जिस अंदाज में देश-विदेश दौड़-दौड़कर अपनी फिल्मों को बढ़ावा देते हैं, क्या दिलीप कुमार या नसीरूद्दीन शाह के लिए वैसा कुछ मुमकिन होता? आज बाजार के औजार हर किसी के तौर-तरीके तय करने लगे हैं और यह बात तय है कि किसी की किताब छापने के पहले प्रकाशक इन दिनों यह जरूरी तौलता होगा कि उस किताब या लेखक को लेकर कितने विवाद खड़े हो सकेंगे? अगर कोई भी विवाद नहीं होते दिखेगा तो उस लेखक की अगली किताब को शायद टाईप होना भी मुश्किल से नसीब हो। लेकिन यह नौबत बहुत खराब है और लोगों के बीच के समझदार लोगों को ऐसी बाजार व्यवस्था से परे चीजों को समझने और बाकी लोगों को समझाने की पहल करनी चाहिए। उत्कृष्टता या प्रतिभा गिनती पर चलने वाले या गिनने वाले बाजार के औजार की मुहताज नहीं होनी चाहिए। ऐसे में तो नोबल पुरस्कार भी वोटों या जनमत संग्रह से तय होने लगेंगे। बाजार की इस व्यवस्था के चलते हुए प्रतिभाशाली लोग हाशिए पर पहुंच जा रहे हैं अगर उनमें अपने-आपको बेचने का हुनर न हो।
संपादकीय
टेलीविजन के चैनलों को देखें तो समाचार स्टूडियो से लेकर रियलिटी शो के बीच तक, अमिताभ से लेकर शाहरूख तक बड़े-बड़े सितारे अपनी फिल्मों के प्रचार में रात-दिन एक करते दिखते हैं। शाहरूख ने पिछले दिनों ट्विटर पर कई बार लिखा कि किस तरह उनकी नींद भी पूरी नहीं हो रही है और वे अपने बच्चों से भी नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसा ही हाल समाचार चैनलों के सितारों का है, वे रात-दिन अपने कार्यक्रमों को ट्विटर और फेसबुक पर आगे बढ़ाते हुए इतना समय वहां लगाते दिखते हैं जितना समय वे अपने कार्यक्रमों में लगाते होंगे। बड़े-बड़े नामी-गिरामी लेखक भी अपनी किताबों को बढ़ावा देते लगे रहते हैं और पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लिखने वाले चर्चित स्तंभकार भी यह बताते रहते हैं कि उन्होंने क्या लिखा है।
अब कला, साहित्य से लेकर पत्रकारिता तक का काम बाजार में अपने सामान को बढ़ावा देने पर आ टिका है। यह जरूरी नहीं कि कोई अच्छी फिल्म बनाए, अच्छा अभिनय करे, अच्छा उपन्यास या कॉलम लिखे, जरूरी यह है कि वे इस काम को करने के बाद बाजार में उस सामान को कितने लोगों पर असर डालकर बेच पाते हैं। यह काम इतनी रफ्तार से हो गया है कि पुराने अंदाज में काम करने वाले लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिल पाया। फिल्म को एक कला माना जाता था, अभिनय को उसके भीतर की एक अलग कला, उपन्यास को रचना माना जाता था, पत्रकारिता को एक जिम्मेदारी का गंभीर लिखना माना जाता था, लेकिन वह सब एकदम से लद गया। अब एक फेरीवाले की तरह आवाज लगा-लगाकर लोग अपनी इस कला को कितना बेच पाते हैं, कितनी चर्चा में अपनी काम और सामान को ला पाते हैं, यह देखते ही बनता है।
यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि अब उत्कृष्टता और प्रतिभा के सारे पैमाने बाजार की सफलता से तय होने लगे हैं, फिर चाहे वह किसी बड़े अखबारनवीस की बनाई रिपोर्ट ही क्यों न हो। इंटरनेट पर समाचारों की वेबसाईटें ये गिनते चलती हैं कि किस पेज पर किस देश का इंसान पहुंचा, और शायद यह भी कि ऐसे लोग उस पेज पर कितनी देर रूके। इससे उस समाचार चैनल, अखबार या समाचार वेबसाईट के भीतर लोगों का महत्व कम या ज्यादा होते चलता है। ऐसा ही महत्व अगर गिनती के आधार पर अखबारों का तय होते चलता, तो सबसे गंभीर और भरोसेमंद अखबार चर्चा में भी नहीं आ पाते और सबसे सनसनीखेज और चटपटे अखबार मार्केटिंग की कामयाबी के साथ मिलकर सबसे अच्छा अखबार कहलाते। गनीमत यह है कि अखबारों की दुनिया में अब तक ऐसा हो नहीं पाया है और कम छपने और बिकने वाले अखबार भी पेरिस-लंदन से लेकर हिंदुस्तान तक अपनी बेहतर पत्रकारिता होने पर अधिक महत्व पाते हैं।
बाजार के तौर-तरीके और अधिक संख्या में ग्राहकों को खींच पाने की मदारीनुमा काबिलीयत आज किसी को अधिक सफल या बेहतर भी साबित कर देती है। अमिताभ और शाहरूख जिस अंदाज में देश-विदेश दौड़-दौड़कर अपनी फिल्मों को बढ़ावा देते हैं, क्या दिलीप कुमार या नसीरूद्दीन शाह के लिए वैसा कुछ मुमकिन होता? आज बाजार के औजार हर किसी के तौर-तरीके तय करने लगे हैं और यह बात तय है कि किसी की किताब छापने के पहले प्रकाशक इन दिनों यह जरूरी तौलता होगा कि उस किताब या लेखक को लेकर कितने विवाद खड़े हो सकेंगे? अगर कोई भी विवाद नहीं होते दिखेगा तो उस लेखक की अगली किताब को शायद टाईप होना भी मुश्किल से नसीब हो। लेकिन यह नौबत बहुत खराब है और लोगों के बीच के समझदार लोगों को ऐसी बाजार व्यवस्था से परे चीजों को समझने और बाकी लोगों को समझाने की पहल करनी चाहिए। उत्कृष्टता या प्रतिभा गिनती पर चलने वाले या गिनने वाले बाजार के औजार की मुहताज नहीं होनी चाहिए। ऐसे में तो नोबल पुरस्कार भी वोटों या जनमत संग्रह से तय होने लगेंगे। बाजार की इस व्यवस्था के चलते हुए प्रतिभाशाली लोग हाशिए पर पहुंच जा रहे हैं अगर उनमें अपने-आपको बेचने का हुनर न हो।
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