संपादकीय
29 फरवरी 2012
अभी-अभी खबर आई है कि ऋषिकेश में 'दोस्तोंÓ ने स्कूल में पढऩे वाली एक लड़की के साथ बलात्कार किया। आज भारत में भी शहरी जिंदगी में स्कूल के लड़के-लड़कियों को साथ में घूमने-फिरने या काम करने की बहुत सी नौबत आती हैं या वे अपनी पसंद से ऐसा करते हैं। सोलह बरस की लड़की से उसी के स्कूल के उसी के उम्र के लड़कों का एक गिरोह बलात्कार करे तो ऐसी खबर से बाकी बच्चों के भी सावधान हो जाने की जरूरत आ जाती है।
पश्चिमी देशों की घटनाओं को कुछ लोगों ने पढ़ा होगा और कुछ लोगों ने नहीं भी पढ़ा होगा। किसी शराब या दूसरे डिं्रक में धोखे से घोलकर दी जाने वाली एक गोली से पीने वाले का अपने पर से आपा खत्म हो जाता है। पश्चिम में लड़के-लड़कियों के मिलने के डेट रहते हैं और ऐसी डेट पर इस तरह की गोली घोलकर पिलाकर बहुत से लोगों ने बलात्कार किए। बाद में उस गोली को ही रेप-पिल कहा जाने लगा और उस पर रोक लगाने की मांग उठने लगी। आज महिलाओं के बहुत से संगठन इन गोलियों के बारे में जानकारी बढ़ाते चल रहे हैं। भारत के महानगरों और उनके बाद के दूसरे दर्जे के शहरों को छोड़ दें, तो लड़के-लड़कियों का इस तरह मिलना-जुलना देश के एक बड़े हिस्से में कुछ कम होता है। लेकिन शराबखानों से परे भी तो लड़के-लड़कियों का किसी और जगह साथ बैठकर पीना कोई अनहोनी अब भारत में नहीं रह गई है। इसलिए इस तरह की नौबत से बचने और अपने आसपास के लोगों को बचाने की जरूरत सब लोगों को है। जिनके बच्चे अभी-अभी खतरे की ऐसी उम्र में दाखिल हो रहे हैं उनको शुरू में सचेत करने की जरूरत मां-बाप या आसपास के बड़े लोगों की है, और जो बच्चे बड़े हो चुके हैं उनको खुद ही खतरों से बचना सीखना होगा। बात सिर्फ बलात्कार की नहीं है, उसके साथ-साथ इन दिनों छोटे-बड़े हर किस्म के शहर से जिस तरह हर जेब में रहने वाले मोबाईल फोन से खींची जाने वाली तस्वीरों या उस पर होने वाली रिकॉर्डिंग बाजार में बिक रही है, उससे ऐसे हमले की शिकार, आमतौर पर लड़कियों, की बाकी पूरी जिंदगी तबाह सी हो जाती है और पूरे परिवार को शहर छोडऩे जैसी नौबत आ जाती है।
भारत में कुछ दकियानूसी संगठनों की धमकियों के चलते जवान हो चले बच्चों को भी उनके शरीर और उनकी वयस्क जरूरतों की साधारण जानकारी से दूर रखा जाता है। इसे एक भारतीय संस्कृति मान लिया गया है कि जवान हो जाने पर भी लोग जवानी की जरूरतों से अनजान रहें। स्कूल की बड़ी कक्षाओं या कॉलेजों में भी वैज्ञानिक तरीके से जो सेक्स-शिक्षा दी जा सकती है उसके बजाय हिंदुस्तान में जमाने से सिर्फ पोर्नोग्राफी बाजार में मौजूद है। यह सिलसिला बदलना चाहिए और हमने सामाजिक उदारता के मामले में देखा है कि वोट बिगडऩे से डरी-सहमी सरकारें समलैंगिकता से लेकर बिना शादी साथ रहने जैसे कई मुद्दों पर अदालत से सामाजिक बुराई पाकर फैसला देने की उम्मीद करती हैं। नतीजा यह है कि तरह-तरह की बीमारियों, सामाजिक अपमान, ब्लैकमेलिंग और मानसिक यातना का खतरा लड़कियों पर छाया ही रहता है। हमारा ख्याल यह है कि अलग-अलग सामाजिक संगठनों को अपने स्तर पर अपने बच्चों को वैज्ञानिक जानकारी देने के लिए खुद ही ऐसी पहल करनी चाहिए जिसमें वोटरों से भयभीत सरकारों की जरूरत न पड़े। आखिर बच्चे तो लोगों के अपने हैं, सरकार के तो हैं नहीं।
पश्चिम बंगाल में सरकारी अस्पतालों में पिछले दिनों बलात्कार की कुछ घटनाएं हुई हैं। इनको देखते हुए भी हम इस मुद्दे पर संस्थानों और कामकाज की जगहों पर महिलाओं पर होने वाली ऐसे हमलों के खिलाफ सावधानी की तैयारी सुझाना चाहेंगे। जहां-जहां बच्चे, लड़कियां या महिलाएं शिकार हो सकते हैं वहां-वहां ऐसी जगहों के जो मुखिया हैं उनको ऐसी नौबत से बचाव के लिए तैयारी करनी चाहिए। भारत में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा साफ आदेश कामकाजी महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए है जिसे विशाखा गाईडलाइंस नाम से लागू किया गया है। लेकिन हमारा देखा हुआ यह है कि राज्य सरकार तक इस दिशा-निर्देश के मुताबिक बचाव का इंतजाम लागू नहीं करती, या कि कामकाजी महिला के शोषण की कोई वारदात हो जाने पर उसकी जांच तक सही तरीके से नहीं करती। यह सिलसिला बदलना चाहिए।








