महिला-शोषण का कोई अंत नहीं



संपादकीय
29 फरवरी 2012
अभी-अभी खबर आई है कि ऋषिकेश में 'दोस्तोंÓ ने स्कूल में पढऩे वाली एक लड़की के साथ बलात्कार किया। आज भारत में भी शहरी जिंदगी में स्कूल के लड़के-लड़कियों को साथ में घूमने-फिरने या काम करने की बहुत सी नौबत आती हैं या वे अपनी पसंद से ऐसा करते हैं। सोलह बरस की लड़की से उसी के स्कूल के उसी के उम्र के लड़कों का एक गिरोह बलात्कार करे तो ऐसी खबर से बाकी बच्चों के भी सावधान हो जाने की जरूरत आ जाती है। 
पश्चिमी देशों की घटनाओं को कुछ लोगों ने पढ़ा होगा और कुछ लोगों ने नहीं भी पढ़ा होगा। किसी शराब या दूसरे डिं्रक में धोखे से घोलकर दी जाने वाली एक गोली से पीने वाले का अपने पर से आपा खत्म हो जाता है। पश्चिम में लड़के-लड़कियों के मिलने के डेट रहते हैं और ऐसी डेट पर इस तरह की गोली घोलकर पिलाकर बहुत से लोगों ने बलात्कार किए। बाद में उस गोली को ही रेप-पिल कहा जाने लगा और उस पर रोक लगाने की मांग उठने लगी। आज महिलाओं के बहुत से संगठन इन गोलियों के बारे में जानकारी बढ़ाते चल रहे हैं। भारत के महानगरों और उनके बाद के दूसरे दर्जे के शहरों को छोड़ दें, तो लड़के-लड़कियों का इस तरह मिलना-जुलना देश के एक बड़े हिस्से में कुछ कम होता है। लेकिन शराबखानों से परे भी तो लड़के-लड़कियों का किसी और जगह साथ बैठकर पीना कोई अनहोनी अब भारत में नहीं रह गई है। इसलिए इस तरह की नौबत से बचने और अपने आसपास के लोगों को बचाने की जरूरत सब लोगों को है। जिनके बच्चे अभी-अभी खतरे की ऐसी उम्र में दाखिल हो रहे हैं उनको शुरू में सचेत करने की जरूरत मां-बाप या आसपास के बड़े लोगों की है, और जो बच्चे बड़े हो चुके हैं उनको खुद ही खतरों से बचना सीखना होगा। बात सिर्फ बलात्कार की नहीं है, उसके साथ-साथ इन दिनों छोटे-बड़े हर किस्म के शहर से जिस तरह हर जेब में रहने वाले मोबाईल फोन से खींची जाने वाली तस्वीरों या उस पर होने वाली रिकॉर्डिंग बाजार में बिक रही है, उससे ऐसे हमले की शिकार, आमतौर पर लड़कियों, की बाकी पूरी जिंदगी तबाह सी हो जाती है और पूरे परिवार को शहर छोडऩे जैसी नौबत आ जाती है। 
भारत में कुछ दकियानूसी संगठनों की धमकियों के चलते जवान हो चले बच्चों को भी उनके शरीर और उनकी वयस्क जरूरतों की साधारण जानकारी से दूर रखा जाता है। इसे एक भारतीय संस्कृति मान लिया गया है कि जवान हो जाने पर भी लोग जवानी की जरूरतों से अनजान रहें। स्कूल की बड़ी कक्षाओं या कॉलेजों में भी वैज्ञानिक तरीके से जो सेक्स-शिक्षा दी जा सकती है उसके बजाय हिंदुस्तान में जमाने से सिर्फ पोर्नोग्राफी बाजार में मौजूद है। यह सिलसिला बदलना चाहिए और हमने सामाजिक उदारता के मामले में देखा है कि वोट बिगडऩे से डरी-सहमी सरकारें समलैंगिकता से लेकर बिना शादी साथ रहने जैसे कई मुद्दों पर अदालत से सामाजिक बुराई पाकर फैसला देने की उम्मीद करती हैं। नतीजा यह है कि तरह-तरह की बीमारियों, सामाजिक अपमान, ब्लैकमेलिंग और मानसिक यातना का खतरा लड़कियों पर छाया ही रहता है। हमारा ख्याल यह है कि अलग-अलग सामाजिक संगठनों को अपने स्तर पर अपने बच्चों को वैज्ञानिक जानकारी देने के लिए खुद ही ऐसी पहल करनी चाहिए जिसमें वोटरों से भयभीत सरकारों की जरूरत न पड़े। आखिर बच्चे तो लोगों के अपने हैं, सरकार के तो हैं नहीं। 
पश्चिम बंगाल में सरकारी अस्पतालों में पिछले दिनों बलात्कार की कुछ घटनाएं हुई हैं। इनको देखते हुए भी हम इस मुद्दे पर संस्थानों और कामकाज की जगहों पर महिलाओं पर होने वाली ऐसे हमलों के खिलाफ सावधानी की तैयारी सुझाना चाहेंगे। जहां-जहां बच्चे, लड़कियां या महिलाएं शिकार हो सकते हैं वहां-वहां ऐसी जगहों के जो मुखिया हैं उनको ऐसी नौबत से बचाव के लिए तैयारी करनी चाहिए। भारत में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा साफ आदेश कामकाजी महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए है जिसे विशाखा गाईडलाइंस नाम से लागू किया गया है। लेकिन हमारा देखा हुआ यह है कि राज्य सरकार तक इस दिशा-निर्देश के मुताबिक बचाव का इंतजाम लागू नहीं करती, या कि कामकाजी महिला के शोषण की कोई वारदात हो जाने पर उसकी जांच तक सही तरीके से नहीं करती। यह सिलसिला बदलना चाहिए।


बाहर गए छत्तिसगढिय़ा मजदूर का ख्याल रखने की जरूरत



संपादकीय
28 फरवरी 2012
हरियाणा में बंधुवा बनाकर काम पर लगाए गए छत्तीसगढ़ी मजदूरों की रिहाई को लेकर कल ही रायपुर से सरकार ने हरियाणा से बात की है। इसे एक दिन भी पूरा नहीं हुआ है कि उत्तरप्रदेश से खबर आई है कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा सीमा तरफ की उप्र की एक अवैध खदान के ऊपर का पूरा पहाड़ धसक जाने से उसमें करीब पचास लोगों के मरने की आशंका है और दर्जन भर लाशें मिल चुकी हैं, इस पूरे काम में इस इलाके में छत्तीसगढ़ के हजारों मजदूरों के लगे होने की खबर है। कोई महीना ऐसा नहीं गुजरता जब देश के किसी न किसी इलाके से मजदूरों के बंधुवा होने, या किसी काम के दौरान मारे जाने की ऐसी खबर न आती हो जिसमें कि छत्तीसगढ़ के मजदूरों का जिक्र हो। 
देश के बहुत से हिस्सों से अधिक या बेहतर संभावनाओं वाले दूसरे हिस्सों की तरफ मजदूरों की आवाजाही लगी ही रहती है। और यह बात सिर्फ हिंदुस्तान की नहीं है, अमरीका में पड़ोस के देश मैक्सिको से रोजाना दसियों हजार मजदूर सरहद पार करके आते हैं और अमरीका को सस्ती मजदूरी देकर, अपने लिए मैक्सिको से अधिक रोजी जुटाकर लौटते हैं। हम इसे किसी किस्म का पलायन नहीं कहते। छत्तीसगढ़ में सरकारी और राजनीतिक जुबान जिसे छत्तीसगढ़ी मजदूरों का पलायन कहती है वह तो दरअसल जिंदगी की लड़ाई का एक ऐसा सफर है जिसमें लोग दिक्कतें और खतरे झेलते हुए दूर-दूर तक जाते हैं और तरह-तरह के शोषण को झेलते हुए भी अपने परिवार और बच्चों के साथ वहां रात-दिन खून-पसीना एक करते हैं। वे इसे पलायन कहने वाले लोग जो कि सत्ता पर काबिज रहते हैं, उनको अपनी भाषा सुधारने की जरूरत है। जिन लोगों पर गरीबों को काम देने, उनके लिए बेहतर संभावनाएं बढ़ाते चलने की जिम्मेदारी है, यह उनका पलायन है, अपनी जिम्मेदारियों से। लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार से लेकर विधानसभा तक इसे मजदूरों का पलायन कहा जाता है।
हर बरस लाखों मजदूर इस राज्य से दूसरे राज्यों में जाते ही हैं। हो सकता है कि उनके गांवों के आसपास जो काम खेत-कारखानों या सरकार की योजनाओं में मिलते हैं, उनसे काफी अधिक मजदूरी उनको दूसरे प्रदेशों में ठेके की मजदूरी की शक्ल में मिलती हो। वहां जाकर पूरा परिवार रात-दिन काम करता है और कुछ पैसे बचाकर अपने घर लौटता है। लेकिन यहां हर बरस हम ऐसे बयान छापते हैं कि जाते हुए मजदूरों को रोककर स्टेशनों पर पुलिस किस तरह की वसूली करती है। होना तो यह चाहिए कि राज्य सरकार किसी अच्छे संस्थान के लोगों को बाहर से लाकर यह शोध करने का जिम्मा दे कि राज्य के किस-किस इलाकों से किन वजहों से लोग हर बरस मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। इन इलाकों में उनके लिए अगले बरस तक बेहतर इंतजाम करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आधी सदी से 'पलायनÓ जैसी गाली देते हुए रिपोर्ट छपती चली जाती है, और न भोपाल के वक्त हालत सुधरी, न रायपुर के वक्त। 
छत्तीसगढ़ सरकार को बिना देर किए हुए राज्य के ऐसे इलाकों का अध्ययन करवाना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि देश के नक्शे में ऐसे इलाकों को लगातार दर्ज करके रखा जाए जहां पर कि छत्तीसगढ़ से गए हुए मजदूर काम पर रहते हैं। इनकी शिनाख्त बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि इनके गांव में यह पता होता है और ऐसे लोगों के फोन नंबर जुटाकर सरकार लगातार इनसे संपर्क भी कर सकती है ताकि उनकी किसी परेशानी के वक्त यहां की सरकार उस राज्य से तुरंत बात कर सके। हमारा अनुभव यह भी कहता है कि सरकार के अपने ढांचे के लोग अपने काम के मिजाज के चलते संवेदनशीलता खो बैठते हैं। ऐसे में राज्य के ऐसे जिलों में काम करने वाले कुछ भरोसेमंद जनसंगठनों को ऐसी रिपोर्ट और संपर्क का काम दिया जा सकता है ताकि बाहर गए हुए छत्तीसगढ़ी मजदूरों के हाल की खबर यहां होती रहे। इस राज्य ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से अपने ढांचे में बहुत क्रांकीट ढलते देखा है, लेकिन राज्य के मजदूरों के हुनर में खूबियां जोड़कर उनको सबसे सस्ती मजदूरी से बेहतर किसी काम के लायक बनाने का मानवीय ढांचा बेहतर नहीं बन पाया है। इस बारे में कोशिश की जानी चाहिए और यहां के मानव संसाधन में महत्व जोडऩे की जरूरत है। फिलहाल उत्तरप्रदेश के जिस हादसे को लेकर हमने लिखना शुरू किया है, उसमें अगर छत्तीसगढ़ी मजदूर शिकार हुए हैं तो उनकी पूरी मदद राज्य सरकार को करनी चाहिए।


कुछ दरवाजों के पीछे, या इंटरनेट पर


27 फरवरी 2012
आजकल

सुनील कुमार

अपने अखबार के लिए रोज हिंदी ग्राफिती, 'दीवारों पर लिक्खा हैÓ लिखते या बनाते हुए उस दिन के आसपास कुछ देखा हुआ, कुछ भोगा हुआ या कुछ पढ़ा और सुना हुआ असर डालता है। तकरीबन हर बार अपने खुद के शब्दों में एक पैनी बात लिखना कभी-कभी कुछ मुश्किल भी होता है और ऐसी नौबत से बचने के लिए जब जहां जो बात सूझ जाती है, उसे लिखकर रख लेने की आदत सी पड़ गई है। 
कभी-कभी दिमाग में कुछ बातें इस कदर घर कर जाती हैं कि हफ्तों तक किसी एक ही किस्म की बातें लिखना होता है और मुझे जानने वाले कुछ करीबी लोग इस बात को लेकर परेशान होने लगते हैं कि मेरे निशाना कहीं उनकी तरफ तो नहीं है। ऐसे में कुछ लोगों के सामने यह भी खुलासा करना पड़ता है कि लंबे सफर पर अचानक चले जाने की बुरी आदत के चलते मैं अक्सर दीवार के लिए कुछ बातों को पहले से लिखते चलता हूं ताकि न रहने पर भी ऐसी नौबत न आए कि खाली दीवार पर कोई इश्तहार लिखने लग जाए।
लेकिन जैसा कि फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों के बारे में कहा जाता है कि लोग वहां कई बातें किसी और को पढ़वाने के लिए कहीं और लिखते हैं, और फिर उस पर कुछ दूसरों की प्रतिक्रिया देखते हैं, ऐसे ही कभी-कभी चाहे-अनचाहे मुझसे भी हो जाता है कि अपने मन की कोई बात दीवार पर लिखा जाती है ताकि उसे कोई कहीं पर पढ़ ले। लेकिन अखबार की जरूरत के मुताबिक ऐसी बातें उन्हीं मुद्दों पर होती हैं जो मुद्दे मेरे अकेले की दौलत नहीं होते और दुनिया में जगह-जगह लोग कदम-कदम पर वैसे मुद्दों का सामना आज या कल करते ही चलते हैं।
इस बात पर आज लिखना इसलिए ठीक लग रहा है क्योंकि पखानों के दरवाजों के भीतर से परे अब लोगों के पास अपने नाम सहित या बिना नाम के लिखने को बहुत सी जगहें हो गई हैं जिनमें इंटरनेट ने खासा हाथ बंटाया है। इसलिए लोगों की भड़ास अब निकल जाती है और यह हर किसी की दिमागी सेहत के लिए बेहतर भी होता है। यह एक अलग बात है कि लोगों के मन की नफरत जब गंदगी बनकर इंटरनेट पर पहुंचती है तो उसके शिकार लोगों को उतनी ही दिमागी तकलीफ होती है जितनी राहत कुछ दूसरे लोगों को ऐसा लिखकर मिलती है। 
लेकिन तकरीबन पूरी जिंदगी लिखने के धंधे में गुजार लेने के बाद मन की भड़ास जितनी कम हो जानी थी, उतनी हुई नहीं। वजह शायद यह है कि हालात में जिस किस्म के बदलाव की नीयत से लिखा जाता है, वह अक्सर स्याही खत्म हो जाने तक करवट भी नहीं बदलता। किसी गेंडे की कड़ी खाल पर तिनका फेंकने से उसके बदन में जितनी हलचल होगी, उससे कम ही हलचल अदालत से परे के भारतीय लोकतंत्र में होती है। जब अदालत के दखल का खतरा आ खड़ा होता है तब कहीं जाकर सरकार या कारखानेदार और कारोबार यह देखना शुरू करते हैं कि आखिर मुद्दा क्या है। इसलिए लगातार लिखने के बाद जब महान होने का दावा करने वाला यह लोकतंत्र बेफिक्री की नींद सोते रहता है, तो फिर फिक्र के साथ लिखने वाले तक उसकी बातें उस बूमरैंग की तरह लौटती हैं जिसे फेंककर इस्तेमाल करने वाला हथियार बनाया गया है। पत्थर की दीवार से टकराकर मानो कुछ लौटा और उसने दीवार पर वार करने वाले को ही जख्मी कर दिया। 
दिल से लिखना आसान नहीं होता वह दिल दुखा जाता है। दूसरे दिल पर उसके असर की कोई गारंटी तो नहीं होती, गुंजाइश भी कम ही होती है और अपने ही मन पर चोट लगने का खतरा अधिक होता है।
लिखने वाले की एक बड़ी दिक्कत यह भी होती है कि उनके बीच कुछ अधिक नाजुक और महीन सोच के लोग अधिक होते हैं, और पढऩे वालों में ऐसी सोच वालों का अनुपात कुछ कम होता है। इस बेमेल मामले को इस तरह से समझा जा सकता है कि मानो बाजार में डिमांड से सौ गुना अधिक सप्लाई हो रही है और दुकानों के बाद बाजार तक की सड़कें भी माल से पट गई हैं। संवेदनशीलता मांग से सौ गुना अधिक आपूर्ति का मामला हो गया है और दुनिया की कोई व्यवस्था इस अनुपात के साथ चल नहीं पाती। यही वजह है कि संवेदनशील लोग भारत जैसे लगभग आजादी वाले लोकतंत्र में भी अपने-आपको बेसहारा और बेअसर पाते हैं। सोचने वाले, फिक्र करने वाले, और उसूलों वाले लोग लगातार भड़ास से लबालब भरे रहते हैं। 
जिस लिखने की बात हो रही है, वह एक किस्म का नहीं होता, वह किस्म-किस्म का होता है। कुछ लोग साहित्य लिखते हैं, और लगभग सारा साहित्य खतरों से परे का होता है। अपवाद की तरह कोई इक्का-दुक्का लेखक विरोध का शिकार होते भी हैं तो भी उससे उनकी किताबों की बिक्री बढ़ जाती है। अखबारों में फिक्र के साथ लिखने का चलन घटते चल रहा है और संपादक या लिखने वाले की फिक्र का जिम्मा मार्केटिंग विभागों ने बड़ी उदारता से लेकर अपने सिर पर रख लिया है, इसलिए वहां पर फिक्र की मृत्युदर, संसद और विधानसभाओं में अरबपति लोगों की बढ़ती भीड़ की वजह से वहां फिक्र की बढ़ चुकी मृत्युदर से मुकाबला करती है। 
ऐसे में पूरी तरह असंगठित, गैरकारोबारी और बेकाबू-अराजक, या आजाद, इंटरनेट ने लोगों को लिखने की एक ऐसी आजादी दी है जिसके लिए साहित्य के उत्कृष्टता के आलोचक-पैमानों पर खरे उतरने की कोई बंदिश नहीं होती, मार्केटिंग विभाग की मंजूरी से लिखने की कोई अखबारी बेबसी नहीं होती, और शायद असर कहीं अधिक होता है। 
दरअसल दस-बीस बरस पहले तक के विचारों के व्यापार के एकाधिकार को आज इंटरनेट ने ग्रामोफोन रिकॉर्ड की तरह बनाकर रख छोड़ा है। पुराने सामान जमा करने के शौकीन लोग विचार-व्यापार-एकाधिकार को जमा करके रख सकते हैं। जिन लोगों को यह बात अटपटी लग रही हो वे ध्यान से देखें कि मीडिया के कारोबार में अब विचार की कितनी जगह रह गई है, और क्या जगह रह गई है। इसलिए आज मीडिया का जो बढ़ता हुआ एकाधिकार है, वह मीडिया के कारोबार का एकाधिकार है, उसमें विचारों का एकाधिकार नहीं है, मार्केटिंग की रणनीति का साम्राज्यवाद जरूर है। 
बाजार बागी तेवर बर्दाश्त नहीं करता। ऐसे में आने वाले दिन विचारों पर और अधिक हमलों के दिन रहेंगे और खासकर लिखने वालों के विचारों के। इन पर हमले मीडिया के विज्ञापनदाता ग्राहकों के भी होंगे, और मीडिया के दफ्तर के भीतर खाता-बही देखने वालों के भी होंगे। यही वजह है कि पिछले दस-बीस बरसों में हिंदुस्तान में पेडन्यूज नाम का एक नया शब्द अंगे्रजी डिक्नशरी के दो शब्दों से निकलकर हिन्दी तक पहुंचते हुए एक शब्द बन गया है। इस माहौल में कबीर की तरह की तेजाबी बातें आमतौर पर छोटा मीडिया ही लिख सकता है, या फिर मीडिया के स्थापित ढांचे से परे का नए मीडिया किस्म का इंटरनेट का मीडिया लिख सकता है। पे्रस कौंसिल ऑफ इंडिया के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने पिछले दिनों मीडिया को लेकर बहुत सी कड़वी बातें कही हैं, जिनके जवाब में जवाबी तर्क या आत्मविश्लेषण के बजाय एक भीड़ की तरह हल्ला भर सामने आया है। 
आने वाले दिन मीडिया के बड़े घरानों के हाथों छोटे मीडिया कारोबार के बिकने के दिन दिखते हैं। ऐसे में लोगों को खरी और कड़ी बातें लिखने के लिए या तो कुछ दरवाजों के पीछे जाना होगा या इंटरनेट पर।

पाक को ऑस्कर के मौके पर


संपादकीय
27 फरवरी 2012
पाकिस्तानी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'सेविंग फेसÓ को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री (शॉर्ट सब्जेक्ट) का ऑस्कर पुरस्कार मिला है। इस फिल्म का निर्देशन पाकिस्तान की शरमीन ओबेद चिनॉय और डेनियन जज ने किया है। यह फिल्म पाकिस्तान में चेहरों पर तेजाब फेंककर घायल की गई महिलाओं की कहानी है जो कि हमलावरों के खिलाफ बहुत ही कड़ी कानूनी लड़ाई लड़ती है। इस पुरस्कार के बाद पाकिस्तानी सूचना मंत्री ने शरमीन पर गर्व करते हुए कहा कि उन्होंने इस फिल्म में दिखाया है कि हमारे लोग कितना मुकाबला कर सकते हैं। इस निर्देशिका ने इसके पहले अफगानिस्तान में महिलाओं के हालात पर भी फिल्म बनाई है। उन्होंने कहा है कि आज तक वे ऐसी ही कहानियां करती रही हैं जिनसे लोग अमूमन डरते हैं और उनका जिक्र तक करना नहीं चाहते। भारत के लिए यह एक खुशी की बात है कि पड़ोस के इस देश में एक महिला की बनाई इस फिल्म को यह सम्मान मिला है और दोनों देशों की राजधानियों, बीच की सरहद से परे दोनों तरफ कलाकारों, लेखकों और संगीतकारों के बीच बहुत दोस्ताना रिश्ते हैं। बहुत ही भयानक नौबत से गुजर रहे पाकिस्तान में ऐसे हमलावरों को नाखुश करने वाली इस फिल्म से हम हिन्दुस्तान में भी कई किस्म की नसीहतें मिलने की गुंजाइश देखते हैं।
डाक्यूमेंट्री फिल्में हकीकत से जुड़ी होती है, और दुनिया भर में बहुत से दर्दनाक और असल मुद्दों का समकालीन इतिहास लेखन ऐसी फिल्मों से ही होता है। आज ही गुजरात के दंगों की दसवीं सालगिरह है और इस मौके पर वहां दंगों के पीछे की ताकतों को उजागर करने वाली फिल्मों की भी याद आती है जिनके साथ-साथ इस मुद्दे पर बनी हुई एक फीचर फिल्म को भी गुजरात में रोक दिया गया था। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां पर कि समाज बहुत से विरोधाभासों को झेलता है और लोग बहुत बड़े-बड़े पाखंड के साथ जीते हैं, वहां अखबारनवीसी और मीडिया के बाकी पहलुओं के साथ-साथ मजबूत डाक्यूमेंट्री फिल्मों के साथ-साथ एक मजबूत परंपरा के आगे बढ़ाने की जरूरत हमको लगती है। इस काम से जुड़े हुए लोग जानते हैं कि इस धंधे में रोटी जुटाना भी बहुत कम लोगों के लिए ही मुमकिन होता है। कभी सरकार से कुछ पैसे मिलने पर कोई फिल्म बनती है तो उसका सरकार की नीतियों के मुताबिक होना जरूरी होता है। बेइंसाफी के खिलाफ कोई फिल्म बनाने के लिए कभी-कभी किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन से कोई काम किसी डाक्यूमेंट्री निर्माता को चाहे मिल जाता हो, लेकिन उससे सामाजिक आंदोलन का यह पहलू जिंदा नहीं रह सकता। 
भारत में कदम-कदम पर सामाजिक अन्याय बिखरा हुआ है और इनके लिए लोगों के मन में संवेदनशीलता पैदा करना, उन्हें असरदार तरीके से जानकारी देना और ऐसी कोशिशों से आगे चलकर सामाजिक समानता के लिए एक जनमत तैयार करना, एक बहुत लंबा काम है, लेकिन लोकतंत्र ऐसी ही लंबी कोशिशों से मजबूत होता है। आज पाकिस्तान में एक महिला ने एक दूसरी महिला की लड़ाई पर फिल्म बनाकर ऑस्कर जीता है तो उससे वहां की महिलाओं की बहुत सी दिक्कतों के बारे में न सिर्फ वह देश बल्कि दुनिया के और भी देश चौकन्ना होकर ध्यान देंगे। 
भारत में सरकारी टेलीविजन के बहुत से अलग-अलग चैनल हैं जो कि समाज की भलाई के लिए बहुत से अच्छे कार्यक्रम बनाते हैं। आज का बाजार दूरदर्शन और राज्यसभा-लोकसभा चैनलों को नीरस साबित करने पर तुला होता है। लेकिन दुनिया के बनने से अब तक और दुनिया के खत्म हो जाने तक सच हमेशा सनसनी के मुकाबले नीरस ही रहेगा। लेकिन दुनिया का भला ऐसी नीरस बातों से ही होता है। किसी के संघर्ष की कहानी किसी कि छोटी सी चोली के मुकाबले हमेशा ही कम आकर्षक लगेगी। और यह बात जाहिर है कि भारत के चैनलों में किसकी पसंद क्या है। हम केंद्र और राज्य सरकारों से यह उम्मीद करेंगे कि वे उदारता से अपने-अपने दायरों की सामाजिक दिक्कतों को उठाने वाली ऐसी फिल्मों को बढ़ावा दें जिससे कि सरकारी टीवी के दर्शकों का एक सामाजिक और राजनीतिक शिक्षण हो सके। यह सिलसिला रातों-रात नहीं हो सकता, लेकिन ऐसी चेतना के बिना लोकतंत्र किस तरफ आगे बढ़ रहा है यह भी सब लोग देख रहे हैं। देश-प्रदेश में सड़क-बांध और बिजलीघरों से तो ढांचे बढ़ते चल रहे हैं, लेकिन जनचेतना और जागरूकता का ढांचा चूंकि आंकड़ों में नहीं दिखता, उनकी इमारत आसमान छूते नहीं दिखती इसलिए वोटों की राजनीति वाले भारतीय लोकतंत्र में उसकी अहमियत नहीं आंकी जाती। हमारा मानना है कि जनकल्याणकारी सरकार को ऐसे लंबे उम्र वाले पेड़ भी लगाने चाहिए जिनके फल दस-बीस बरस बाद मिलना शुरू होते हैं। 

कांगे्रस नेताओं में बेअक्ली की फूहड़ बातें करने का मुकाबला


संपादकीय
26 फरवरी 2012
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष, राजस्थान में विधायक और प्रदेश महिला कांगे्रस अध्यक्ष रह चुकीं ममता शर्मा का कहना है कि किसी लड़की या महिला को कोई लड़का या आदमी सेक्सी कहे तो उसका बुरा नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियां सेक्सी शब्द से न डरें, सेक्सी का मतलब होता है ब्यूटी फॉर चार्मिंग एक्साइटेड। उन्होंने कहा कि सेक्सी शब्द का गलत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए एवं इसे पॉजिटिव लेना चाहिए।
यह शब्द लड़कियों या महिलाओं के बारे में लोग अपने बहुत करीबी दोस्तों के साथ मजाक में भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। और सती प्रथा, घूंघट वाले राजस्थान से आई हुई ममता शर्मा अगर कोई पुराने ख्याल की बात करतीं, तो भी यह रहता कि वे अपने इलाके की भावनाओं के मुताबिक कोई बात कर रही हैं। लेकिन आज अचानक जिस तरह से उन्होंने भारत की लड़कियों और महिलाओं को सेक्सी कहने और कहलाने को एक मान्यता दे दी है उसके बाद यह सवाल उठता है कि महिलाओं के हकों के लिए बनी देश की इस सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था का मुखिया बने रहने का उनको क्या हक है? उनके इस बयान के बाद छेडख़ानी करने वाले लोगों को राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना एक हिमायती मिल गया है और दूसरी तरफ अभद्र भाषा की शिकार होने वाली महिलाओं को अब किस हौसले के साथ महिला आयोग तक जाने सूझ सकेगी?
हम ममता शर्मा की भाषा की कम समझ को बहुत बड़ा नहीं मानते। राजनीति में आकर किसी संवैधानिक पद तक पहुंचने के लिए भाषाशास्त्री होना जरूरी नहीं है इसलिए जब वे सेक्सी शब्द के मायने गिनाती हैं तो हम उसका भी अधिक बुरा नहीं मानते क्योंकि समझ और ज्ञान दोनों की कमी से ऐसा हो सकता है कि वे सेक्सी का मतलब सुंदर और आकर्षक बताने लगें, और सेक्सी को उत्तेजित भी बताने लगें। हम भारत की आम संस्कृति और यहां की संवेदनशीलता की उनकी नासमझी को उनकी एक इतनी बड़ी कमी मानते हैं, कि इस एक बात को लेकर उन्हें वहां से हटा देना चाहिए। उनके पहले भारत में शायद ही किसी ने इस तरह की नसीहत महिलाओं को दी हो। एक सार्वजनिक महिला कार्यक्रम में उनकी यह बात महिलाओं का बहुत बड़ा अपमान भी है कि उन्हें सेक्स के सामान की तरह समझने पर इतनी बड़ी कुर्सी पर काबिज, नेहरू-इंदिरा-सोनिया की पार्टी की नेता मुहर लगाए। 
लोगों को याद होगा कि बहुत बरस पहले जब मीडिया के एक उत्साही तबके ने उमा भारती को सेक्सी संन्यासिन लिखना शुरू किया था तो उन्होंने इस पर आपत्ति जाहिर करते हुए यह सिलसिला बंद करवाया था। ममता शर्मा की बात के बाद अगर उनके बारे में लोग ऐसी जुबान में बात करने लगें, और उनके बयान का जवाब देने के लिए उनसे मिलने वाले लोग उन्हें रूबरू सेक्सी कहने लगें, तो वे इसे बर्दाश्त कर पाएंगी?
दरअसल बहुत से लोगों का यह मानना होता है कि मुंह मिला हुआ है तो कुछ न कुछ बोलना चाहिए। हम इस मौके पर कुछ लोगों की जमाने पहले की दी हुई कुछ नसीहतें यहां याद दिलाना चाहेंगे ताकि और किसी की ममता शर्मा की तरह फजीहत न हो। किसी ने लिखा था-समझदार इसलिए बोलते हैं कि उनकेपास बोलने के लिए कुछ है, और कमसमझ इसलिए बोलते हैं कि वे कुछ बोलना चाहते हैं। कुछ और लोगों ने कहा है-इंसान को कुदरत ने आंखें दो दी हैं, कान दो दिए हैं, लेकिन इन चारों से देख-सुनकर बोलने के लिए मुंह कुल एक ही दिया है, इसलिए इसी अनुपात में बोलना चाहिए। लोगों को याद होगा कि गांधी जैसे महान विचारक भी बीच-बीच में कुछ वक्त के लिए चुप रहते थे और ऐसे मौनव्रत के दौरान वे स्लेट-पट्टी पर लिखकर लोगों से दो-चार शब्दों में बात कर लेते थे। आज कांगे्रस के बहुत से लोग सार्वजनिक जीवन में जिस तरह की बातें कर रहे हैं, वह भयानक है। इस पार्टी के एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का यह बयान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की खुली बेइज्जती करने वाला आपातकालीन-चापलूसी अंदाज का है जिसमें वे कहते हैं कि राहुल गांधी चाहें तो आज आधी रात प्रधानमंत्री बन सकते हैं और किसी में उनको रोकने की ताकत नहीं है। हमारा ख्याल है कि मनमोहन सिंह की जगह कोई भी जरा सा आत्मसम्मानी होता तो इस बयान के आने के बाद आधी रात भी नहीं होने देता और अपना इस्तीफा भेज चुका होता। हम बहुत से मामलों में सोनिया गांधी के व्यवहार की तारीफ करते आए हैं। लेकिन अब लगातार जिस तरह उनकी पार्टी के लोग अपने ही प्रधानमंत्री का अपमान करने में लगे हैं, अपनी ही पार्टी के सारे नेताओं और पार्टी का अपमान करने में लगे हैं, जिस तरह सोनिया का दामाद यह इंटरव्यू देता है कि उसकी जिम्मेदारी सोनिया के परिवार से दलालों को दूर रखने की है, जिस तरह वह यह बयान देता है कि सही वक्त आने पर प्रियंका राजनीति में आएगी और वह खुद भी राजनीति में आएगा, यह सब कुछ इस पार्टी के भीतर लोकतंत्र के खत्म हो जाने, पहले के मुकाबले अधिक खत्म हो जाने के सुबूत हैं। इंदिरा गांधी ने जब संजय गांधी जैसे तानाशाह को पार्टी और देश के ऊपर थोपा था, तो वे कम से कम मोर्चे पर खुद डटी रहती थीं और तमाम आरोपों का रूबरू सामना करती थीं। दस जनपथ की फौलादी दीवारों के पीछे से पार्टी और देश को चला रहीं सोनिया गांधी तो ऐसे आरोपों का सामना करने के लिए सामने भी नहीं आतीं। यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात नहीं है कि उनके पास अपनी पार्टी के, और अपने परिवार के ऐसे बड़बोले लोगों की कही बातों पर कहने के लिए भी कुछ नहीं है। हमें कांगे्रस के भविष्य की कोई फिक्र नहीं है, और वह जैसा करेगी वैसा भरेगी, लेकिन देश की इस सबसे बड़ी पार्टी की शुरू की गई गलत और घटिया परंपराएं देश के बाकी राजनीतिक दलों उसी निचले स्तर की बातें करने का एक नैतिक अधिकार दे देती हैं।
महिलाओं के बारे में कही गई ऐसी फूहड़ बात पर भी सोनिया गांधी अगर कुछ नहीं कहेंगी और कुछ नहीं करेंगी तो वे एक बहुत गैरजिम्मेदार पार्टी अध्यक्ष और यूपीए मुखिया साबित होंगी। साथ-साथ उन्हें अपनी पार्टी के श्रीप्रकाशों और जायसवालों की बातों पर भी अपना रूख साफ करना चाहिए कि किस आधी रात को मनमोहन सिंह को नींद से जगाकर बर्खास्तगी थमाई जाएगी।

ऑनर से पहते मरती उदारता, ईमानदारी, सच्चाई


संपादकीय
25 फरवरी 2012
खडगपुर में पुलिस ने एक लड़की और उसके प्रेमी की ऑनर किलिंग के आरोप में उसके माता-पिता, भाई और चाचा को गिरफ्तार किया। 18 बरस की यह लड़की अपने प्रेमी के साथ खेतों में मरी मिली, तब माना गया कि शायद प्रेमी जोड़े ने घरवालों से मंजूरी न मिलने के डर से आत्महत्या कर ली। लेकिन जांच से पता चला कि लड़के और लड़की की मौत के बीच 4-5 दिनों का अंतर था, और उन्हें मारने के बाद आत्महत्या की शक्ल  देने के लिए उनकी लाशें खेतों में फेंक दी गई थी। दो दिन हुए गुजरात में शादी से एक दिन पहले एक लड़के ने अपनी प्रेमिका के साथ रेल के आगे कटकर जान दे दी। महाराष्ट्र में एक शहर सतारा में, एक महिला के अपनी जाति से बाहर के व्यक्ति से शादी करने के बाद उसकी ऑनर किलिंग के बाद, वहां के दर्जन भर संगठनों ने मौन मार्च निकालकर घरेलू हिंसा सहती महिलाओं के लिए हेल्प लाईन शुरू करने की मांग की। लेकिन सतारा में या किसी और जगह हेल्पलाईन शुरू हो ही जाने से क्या फर्क पड़ जाएगा? जो समाज दिन ब दिन इतना कट्टर होते जा रहा है कि झूठी शान की खातिर अपने घर आंगन में पली बड़ी हुई बेटी का बेरहमी से कत्ल करते हुए उसके  हाथ भी नहीं कांपते, उसे किसी भी कानून से क्या फर्क पड़ेगा। ऑनर किलिंग अब केवल हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु या झारखंड की बपौती नहीं बचा है, यह रोग पूरी दुनिया में फैल चुका है। खासकर उन देशों में, जहां एशियाई आबादी रहती है।
ब्रिटेन जैसे देशों की पुलिस अपनी ही औलादों को इस तरह मारने  की ऐसी घटनाओं से हक्का बक्का है, क्योंकि उनके कानून की किसी धारा में ऑनर किलिंग जैसा जुर्म ही शामिल नहीं है। अपनी औलादों को अपनी मिल्कियत समझते दंभी माता-पिता और रिश्तेदारों का हौसला, लचर कानून व्यवस्था, वोटों की सौदेबाजी में बिक चुकी राजनीतिक इच्छाशक्ति, और एक दंभी समाज में दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। यह एक सामाजिक सोच की समस्या है, जिसका कानूनी हल निकाला नहीं जा सकता, क्योंकि हम देख रहे हंै कि सामाजिक सोच तो खादी के कुर्तों और खाकी वर्दी पर भी चढ़ी बैठी है। यह अपने से अलग  राय रखने वाले को धमकी, और फिर मार कर चुप कर देने की एक वहशियत है।  सोच, और रवैये में से उदारता की गुंजाईश पूरी तरह खत्म कर देने के लिए किया जा रहा मार्च है, जिसे कानून की कोई परवाह नहीं है। दुख की बात यह है, कि कब्र में पांव लटकाए बैठे बुज़ुर्गों ने अपनी विरासत सम्हालने के लिए नई पीढ़ी को भी राजी कर लिया है। इसलिए आए दिन भाई, बहनों, और उनके प्रेमियों की हत्या शान से करते दिखते हैं। देश की सबसे ऊंची अदालत उदारता की दुहाई दे देकर थक गई है, लेकिन कानून बनाने, और उसे अमल करने का फर्क दो दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालाय में तब दिखा, जब अदालत ने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को सही ठहराया, कहा- अपराध के लिए किसी का शिकायत करना जरूरी है, जब शिकायत ही नहीं, तो अपराध कहां हुआ, तो केन्द्र सरकार ने सामाजिक परम्पराओं और सोच की दुहाई दी। इसके पहले भी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुश्बू ने सालों तक समाज के ठेकेदारों का सामना कर के सर्वोच्च न्यायालय में जीत दर्ज की है, और सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि दो व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से हुए संबंध में कोई बुराई नहीं, उसने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से हुए लिव इन संबंधों में भी कोई बुराई नहीं देखी। इतना ही नहीं, अदालत संबंधित पक्षों से समलैंगिकता संबंधी कानून पर व्यापक और उदार नजरिये से बहस करने को कह रही है।
लेकिन इसके उल्टे हम देखते यह हंै कि कानून पर अमल करने वाली एजेंसियां, देश की  अदालतों के आदेशों की कोई परवाह नहीं करती, पार्कों में, होटलों में लड़के-लड़कियों को साथ देखकर उनके भीतर बैठा दम्भी समाज जाग उठता है, और वह ऐसे जोड़ों को कभी दौड़ा दौड़ाकर मारती है, कभी उनके मुंह पर कालिख पोतती है, तो कभी राखी बंधवा कर भाई-बहन का रिश्ता कायम करने पर मजबूर करती है। होटलों में लड़के-लड़कियां एक साथ अगर रुकंे, या एक कमरे में पाए जाएं ,तो उन्हे वेश्यावृत्ति के जुर्म में पकड़ लिया जाता है। जैसे नजरिये में उदारता और व्यापकता का जिम्मा केवल अदालतों का है, कानून लागू करने वाली एजेंसियां तो लकीर पीटने के लिए ही बनी है। ऐसा इसलिए है कि देश में आज कोई दमदार नेतृत्व नहीं है जो अपने स्वार्थ से परे उठकर समाज के लिए जो सही है, उसकी बात कर सके। आज यहां कोई राजाराम मोहन राय नहीं है जिन्होंने कभी विधवा विवाह की बात करने की हिम्मत की थी, आज तो यहां नवीन जिंदल, और ओम प्रकाश चौटाला हंै, जो संकीर्ण पुरातनपंथी नजरिये की हामी खाप पंचायतों के कदमों पर नतमस्तक है, क्योंकि उनके हाथ में इनके वोट बैंकों की चाभी है, जबकि जरूरत वोट के लिए मतदाता के तलवे चाटने की नहीं, उसके सामने कड़वा सच कहने की है। यह राजनीतिज्ञ ऐसे डॉक्टर हैं, जो अपने फायदे के लिए मलेरिया के मरीज को कुनैन खिलाकर चंगा करने की बजाए अपनी दूकानदारी चलाने के लिए उसे चाकलेट खिलाकर बीमार ही बनाए रखने में लगे हैं। सूचना क्रांति के इस जमाने में जब लड़के-लड़कियां पुराने दम्भ छोड़कर अपनी भावनाओं के लिए ईमानदार होना चाहते हंै, कभी कोई उनके पहनावे में बुराई ढूंढता है, तो कभी टी वी में,तो कभी मोबाईल को दोष दिया जाता है।
अपने गिरेबान में झांकना न तो यह कथित बुजुर्ग जरूरी समझते हंै, न ही उनकी चापलूसी में जुटे नेता, और न ही नेताओं को खुश करने में लगे  पुलिस और प्रशासन। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की उदार नजरिये के लिए बार-बार दुहाई देने से भी क्या फर्क पडऩा है? यह  पीढिय़ों की सोच के बीच अंतर की नहीं, अपने अपने स्वार्थ की बातें हंै, जिनके चक्कर में देश के आजादी, उदारता और सच्चाई दम घोंट रही है। चूंकि माता-पिता के हाथ में पुश्तैनी जमीन जायदाद है, समाज का समर्थन है  इसलिए वह बच्चों पर अपनी मनमानी  थोपना चाहते हंै, अपनी जिंदगी जी लेने के बाद अपने बच्चों की जि़ंदगियां भी वह जी लेना चाहते हैं। ऐसे परजीवी माता-पिता के हाथ मजबूत करती है। वह पुलिस और प्रशासन जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की चिंदिया फाड़कर उन्हें हवा में उड़ा देता है, और बेहद संकीर्णता दिखाते हुए वयस्क लड़के-लड़कियों से निपटता है। इन्हें शह मिलती है उन नेताओं से जो जाति विशेष के वोट पाने के लिए उसके ठेकेदारों की जी हुजूरी में लगे रहते हंै।
नजरिये का यह दोष, सोच की यह खामी, सिर्फ जीवन के इस एक पहलू तक ही सीमित नहीं रहेगी , इससे दूसरे पहलू भी प्रभावित होंगे, और हो रहे हैं नाइंसाफी, बेइमानी। झूठी शान फैल रही है जिसमें हर एक का नुकसान है। क्या इज्जत की खातिर अपने बच्चों की जान ले लेना माता-पिता के लिए जीवन की सबसे बड़ी हार नहीं है? उनके गलत काम की वाहवाही करने वाले, क्या कभी उनके जीवन में बच्चों की मौत के बाद पनपे खालीपन को भर सकते हैं? क्या ईमानदारी से सबके सामने बगीचे या होटल में मिलने वाले लड़के-लड़कियों को मारने पीटने से वह छिपकर मिलने और गंभीर खतरों में नहीं पड़ सकते हंै समाज के डर से किसी निर्जन स्थान मे मिलने वाले लड़के लड़कियों के साथ कितने ही हादसे होते हंै, तब पुलिस एक  कथित सामाजिक बुराई को रोक कर दूसरे कई जुर्मों की गुंजाईश पैदा नहीं करती है? गलत सोच का अंजाम हर मामले में गलत निकलेगा। एक चाकू की धार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उससे तरकारी कट रही है, या गला। देश की अदालतें इस गंदगी को रोकने में अपनी भूमिका पूरी तरह निभा रही है अब राजनीतिक नेतृत्व का जिम्मा है कि वह पहल करे, हिम्मत दिखाए और इस सच का सामना करे,  कि देश को उसकी अवसरवादिता के नहीं समाज के झूठे दम्भ की नहीं, ईमानदारी और हिम्मत की जरूरत है।



प्रतिभाओं का जवाब है, गरीबी का नहीं


संपादकीय
24 फरवरी 2012
प्रदेश के होनहार खिलाडिय़ों की खोज करके उन्हें तालीम देने वाले एक संस्थान ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ को बताया कि बहुत से प्रतिभावान खिलाड़ी गरीबी के कारण संस्थान में तालीम लेने के लिए चुने जाने के बाद भी, अपनी प्रतिभा को निखार नहीं पाते। संस्थान खेल प्रतिभाओं की तलाश करने दूर दराज के गांवों में जाकर उन्हें ढूंढ भी लाता है, लेकिन जब छात्रावास में रहकर तालीम लेने की बात आती है तो यह या तो यह आते ही नहीं या अपने घर लौट जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने घर के कामकाज में कमाई में मदद करनी होती है। राज्य स्तर के खेल मुकाबलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बावजूद वह अपने खेत-खलिहानों में अपने माता-पिता का हाथ बंटाने लौट जाने मजबूर हैं। उनके सपने, उनकी प्रतिभा, और खेल जगत में राज्य की संभावनाएं इस तरह दम तोड़ती रहती हैं। यह सिलसिला हम बहुत बरसों से देखते आ रहे हैं। इसे देखकर हमें लगता है कि गरीबी के हाथों हार जाने वाले खिलाडिय़ों का हश्र देखकर भी खेल के प्रति छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं का उत्साह फीका नहीं पड़ता है। वह अपनी तरफ से तो आखिरी दम तक कोशिश करती है, मानो अपने राज्य से कहती हो- देखो हमारे बस में जो था हमने कर दिखाया, बात इसके आगे ले जाना अगर तुम्हारे बस में है, तो कर दिखाओ। बहुत बार जलसों में परेड करते वक्त नंगे पैरों चलते युवाओं, स्कूली बच्चों की तस्वीरें भी हमने छापी हैं, जिनमें अपनी गरीबी के बावजूद दुनिया के सामने, एक चमचमते मैदान पर कदम रखने का तो हौसला है, लेकिन अपनी गरीबी का जिनके पास कोई जवाब नहीं जो इनके हौसले तोड़ देती है। विकास के बहुत से पैमानों पर बहुत तेज रफ्तार से दौड़ रहे अपने राज्य का यह एक अफसोसनाक और दुखद पहलू है,  लेकिन इससे भी अफसोसनाक बात यह है कि तेजी से सम्पन्न होते चल रहे इस राज्य में अपने इन हीरों को तराशने का माद्दा नहीं है।
जिस दिन विश्व कप क्रिकेट में पाकिस्तान को सेमी फाईनल में हरा देने के बाद देश भर में जनता आधी रात को सड़कों पर उतर आई, और हाथ में तिरंगा लिए रात पर देश प्रेम के नारे लगा रही तो हमें लगा कि शायद पाकिस्तान के खिलाफ देश भर में कहीं सोए, कहीं जागे जुनून का असर है, लेकिन दो दिन बाद विश्वकप जीतने पर फिर वही नजारा देखा, तो लगा कि नहीं, लोगों को खेल और देश दोनों के लिए लगाव है। लेकिन यह लगाव इतना क्षणिक और इतना सतही क्यों है? यह सोचने की बात है। विश्व कप यंू ही नहीं जीता जाता ,उसके लिए प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों के चुनाव, उनकी तालीम,और कड़े अभ्यास और सही मौके की जरूरत होती है। यह सब उन्हें कौन देगा कि वह हमें तिरंगा हाथ में लेकर सड़कों पर नारे लगाने, घूमने, खुश होने का मौका दें? इस राज्य में देश के बड़े-बड़े उद्योग यहां के प्राकृतिक संसाधनों,और यहां की श्रम शक्ति के बूते अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। वह इसके लिए रॉयल्टी देते होंगे, लेकिन क्या उनका फर्ज बस वहीं तक आ कर खत्म हो जाता है ? यहां  जितने भी उद्योग चल रहे हैं, उनमें से ज्यादातर पूरी तरह छतीसगढ़ के संसाधनों और मानव बल के बूते चल रहे हैं। उनकी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को छोटी-बड़ी नौकरियां देकर ही खत्म नहीं हो जाती। कार्पोरेट क्षेत्र की सामाजिक जवाबदेही के बारे में उनकी सोच भी गौर करने की बात है। अभी कुछ ही अर्सा पहले देश के औद्योगिक घरानों में ऊंचा नाम रखने वाले जिंदल समूह के मुखिया ने अमरीका की अपनी यूनिवर्सिटी को बड़ा दान दिया, ताकि वह जिस स्कूल में पढ़े वह उनके नाम से जान जाए। हम इसमें कोई बुराई भी नहीं देखते, यह एक सहज मानवीय हसरत है, जो किसी भी आम इंसान में जाग सकती है, और जब जेब में ऐसा करने के लिए जरूरी दौलत हो, तो यह सपना पूरा भी किया जा सकता है। ऐसे समय स्कूल में पढ़ते हुए परीक्षा में कितने नंबर आते थे, यह देखने की जरूरत नहीं रह जाती। लेकिन ऐसे उद्योगपतियों की तिजोरी अपनी कोख से भरने वाली इस धरती के बच्चों के सपनों का क्या, जो पूरी तरह इस लायक है कि आगे बढऩे की सुविधा उनके नाम हो। इस उद्योग समूह समेत राज्य भर में चल रहे बड़े-बड़े उद्योगों में से ज्यादातर छत्तीसगढ़ के लिए अपनी सामाजिक भागीदारी फ्लावर शो, डॉग शो या ऐसी ही किन्ही बातों में खर्च करते दिखते हैं। कई तो वह भी नहीं करते। अपने कारखानों में काम करने वालों के बच्चों के लिए स्कूल बनवाकर और उनमें आसपास के कुछ बच्चों को शिक्षा देकर जैसे छतीसगढ़ के लिए उनके फर्ज पूरे हो जाते हैं।
निजी क्षेत्र के उद्योगों के लिए तो सरकार ने सामाजिक भागीदारी को जरूरी बनाया ही नहीं है, लेकिन इसकी अपनी औद्योगिक इकाइयां, जहां सीएसआर अनिवार्य है, उनके इस मद के खर्च कैसे हैं, यह भी जांच का विषय है। जो सरकार राज्य के संसाधनों का औद्योगिक घरानों से सौदा करती है, उसे यह तय करना चाहिए कि वह यहां के मानव बल के विकास में अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा जरूर खर्च करे। यही नहीं सरकार को इन उद्योगों को अपने सीएसआर की सालाना रिपोर्ट में यह जाहिर करने की शर्त भी रखनी चाहिए। सामाजिक भागीदारी के अपने कामों में उन्होंने कहां, किस तरह के काम किए, और उनसे कितने लोगों को फायदा हुआ।
विकास में सामाजिक भागीदारी कई तरीके से हो सकती है इसके लिए कई तरह से सोचा जा सकता है जैसे नरेन्द्र मोदी को जब कोई किसी समारोह में मुख्य अतिथि की तरह बुलाता है, तो उसे उन्हें पैसे देने पड़ते हंै, जिन्हें वह अपने राज्य में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई पर खर्च करते हैं। साल भर में इस तरह अच्छी खासी रकम जमा हो जाती है। हम समझते हैं कि सरकार राज्य प्रतिभाओं के बारे में भी कुछ नया सोचने के लिए माहौल बनाए, और यहां से पैसा कमा रहे उद्योगों के लिए सामाजिक भागीदारी के तहत कोई ठोस काम करने की शर्त लगाए। यह केवल सरकार और औद्योगिक घरानों के सोचने की बात ही नहीं है। यह अच्छी स्थिति में जी रहे हर व्यक्ति के सोचने की बात होनी चाहिए कि वह ऐसी प्रतिभाओं का दम घुटने से कैसे रोक सकता है। गरीबी हटाना, या समाज में निचली पायदान पर खड़े इंसान की मदद करना, केवल एक अच्छा सामाजिक काम ही नहीं है। हालांकि हम यह मानते हंै कि ऐसा अच्छा  काम करने के अच्छे  नतीजे किसी न किसी रूप में मिलकर ही रहते हैं। वर्ना गुलाब का पौधा उगाने पर कैक्टस ऊग जाता, लेकिन हम इसके शुद्ध आर्थिक पहलू की बात करना चाहते हंै, जो गरीबी से बाहर आती जनता के उपभोक्ता वर्ग में तब्दील होने की बात करता है, जिससे व्यापार उद्योग को बढ़ावा मिलता है, नई नौकरियां  बनती हंै, समृद्धि आती है, यह अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाने की बात है। यह सच है कि यह एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन इतनी लंबी भी नहीं कि सालों साल तक प्रकृतिक संसाधनों का दोहन करके भी ना थकने वाले इसकी शुरुआत ना कर सके। ऐसे दौर में, जब जंगलों में जनता के असंतोष की चिंगारी को भड़काकर दावानल की शक्ल देने की कोशिशें जारी हों,   अपना धंधा चैन से चलाने के लिए व्यापारियों, उद्योगपतियों द्वारा नक्सलों को कर देने की बातें अक्सर सुनाई देती हों, क्या इन गरीब खिलाडिय़ों को मदद इसलिए न मिले कि इनके हाथ में हथियार नहीं है? 
समाज के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही के माहौल के फायदे घर से लेकर बाहर तक सब को है। वर्ना यहां के युवाओं को कार्पोरेट लालच के खिलाफ आवाज उठाने में कितनी देर लगेगी ? राजधानी और राज्य के बड़े शहरों में चलते बड़े स्कूल, मंडियां, बैंक, अगर मन बना लें तो, ऐसे कितने की खिलाडिय़ों को दत्तक लेकर आगे बढऩे के लिए थोड़ी सी मदद कर सकते हैं। स्कूल ऐसे खिलाडिय़ों के लिए अपने विद्यार्थियों की फीस में मामूली बढ़ोत्तरी करके भी यह काम कर सकते हंै, इसके लिए अपने विद्यार्थियों के पालकों को राजी कर सकते हैं। इससे दूसरे अच्छे कामों के लिए भी जागरुकता का स्तर बढ़ेगा। जरूरत अपने आसपास रह रहे,अपने से कमजोर लोगों के बारे में बड़े दिल से सोचने की है, रास्ते निकल आएंगे। ऐसे खिलाडिय़ों का सामने आना नहीं रुकेगा, क्योंकि हौसलों का तो जवाब है, लेकिन गरीबी का नहीं, इसलिए मुकाबले जीत कर भी, इनका मन में दुख और असंतोष की चिंगारी लिए घर वापस लौटने का सिलसिला भी जारी रहेगा- जब तक सरकार और छत्तीसगढ़ के लोग यह तय नहीं कर लेते कि वह ऐसा नहीं होने देंगे।