कांगे्रस नेताओं में बेअक्ली की फूहड़ बातें करने का मुकाबला


संपादकीय
26 फरवरी 2012
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष, राजस्थान में विधायक और प्रदेश महिला कांगे्रस अध्यक्ष रह चुकीं ममता शर्मा का कहना है कि किसी लड़की या महिला को कोई लड़का या आदमी सेक्सी कहे तो उसका बुरा नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियां सेक्सी शब्द से न डरें, सेक्सी का मतलब होता है ब्यूटी फॉर चार्मिंग एक्साइटेड। उन्होंने कहा कि सेक्सी शब्द का गलत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए एवं इसे पॉजिटिव लेना चाहिए।
यह शब्द लड़कियों या महिलाओं के बारे में लोग अपने बहुत करीबी दोस्तों के साथ मजाक में भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। और सती प्रथा, घूंघट वाले राजस्थान से आई हुई ममता शर्मा अगर कोई पुराने ख्याल की बात करतीं, तो भी यह रहता कि वे अपने इलाके की भावनाओं के मुताबिक कोई बात कर रही हैं। लेकिन आज अचानक जिस तरह से उन्होंने भारत की लड़कियों और महिलाओं को सेक्सी कहने और कहलाने को एक मान्यता दे दी है उसके बाद यह सवाल उठता है कि महिलाओं के हकों के लिए बनी देश की इस सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था का मुखिया बने रहने का उनको क्या हक है? उनके इस बयान के बाद छेडख़ानी करने वाले लोगों को राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना एक हिमायती मिल गया है और दूसरी तरफ अभद्र भाषा की शिकार होने वाली महिलाओं को अब किस हौसले के साथ महिला आयोग तक जाने सूझ सकेगी?
हम ममता शर्मा की भाषा की कम समझ को बहुत बड़ा नहीं मानते। राजनीति में आकर किसी संवैधानिक पद तक पहुंचने के लिए भाषाशास्त्री होना जरूरी नहीं है इसलिए जब वे सेक्सी शब्द के मायने गिनाती हैं तो हम उसका भी अधिक बुरा नहीं मानते क्योंकि समझ और ज्ञान दोनों की कमी से ऐसा हो सकता है कि वे सेक्सी का मतलब सुंदर और आकर्षक बताने लगें, और सेक्सी को उत्तेजित भी बताने लगें। हम भारत की आम संस्कृति और यहां की संवेदनशीलता की उनकी नासमझी को उनकी एक इतनी बड़ी कमी मानते हैं, कि इस एक बात को लेकर उन्हें वहां से हटा देना चाहिए। उनके पहले भारत में शायद ही किसी ने इस तरह की नसीहत महिलाओं को दी हो। एक सार्वजनिक महिला कार्यक्रम में उनकी यह बात महिलाओं का बहुत बड़ा अपमान भी है कि उन्हें सेक्स के सामान की तरह समझने पर इतनी बड़ी कुर्सी पर काबिज, नेहरू-इंदिरा-सोनिया की पार्टी की नेता मुहर लगाए। 
लोगों को याद होगा कि बहुत बरस पहले जब मीडिया के एक उत्साही तबके ने उमा भारती को सेक्सी संन्यासिन लिखना शुरू किया था तो उन्होंने इस पर आपत्ति जाहिर करते हुए यह सिलसिला बंद करवाया था। ममता शर्मा की बात के बाद अगर उनके बारे में लोग ऐसी जुबान में बात करने लगें, और उनके बयान का जवाब देने के लिए उनसे मिलने वाले लोग उन्हें रूबरू सेक्सी कहने लगें, तो वे इसे बर्दाश्त कर पाएंगी?
दरअसल बहुत से लोगों का यह मानना होता है कि मुंह मिला हुआ है तो कुछ न कुछ बोलना चाहिए। हम इस मौके पर कुछ लोगों की जमाने पहले की दी हुई कुछ नसीहतें यहां याद दिलाना चाहेंगे ताकि और किसी की ममता शर्मा की तरह फजीहत न हो। किसी ने लिखा था-समझदार इसलिए बोलते हैं कि उनकेपास बोलने के लिए कुछ है, और कमसमझ इसलिए बोलते हैं कि वे कुछ बोलना चाहते हैं। कुछ और लोगों ने कहा है-इंसान को कुदरत ने आंखें दो दी हैं, कान दो दिए हैं, लेकिन इन चारों से देख-सुनकर बोलने के लिए मुंह कुल एक ही दिया है, इसलिए इसी अनुपात में बोलना चाहिए। लोगों को याद होगा कि गांधी जैसे महान विचारक भी बीच-बीच में कुछ वक्त के लिए चुप रहते थे और ऐसे मौनव्रत के दौरान वे स्लेट-पट्टी पर लिखकर लोगों से दो-चार शब्दों में बात कर लेते थे। आज कांगे्रस के बहुत से लोग सार्वजनिक जीवन में जिस तरह की बातें कर रहे हैं, वह भयानक है। इस पार्टी के एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का यह बयान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की खुली बेइज्जती करने वाला आपातकालीन-चापलूसी अंदाज का है जिसमें वे कहते हैं कि राहुल गांधी चाहें तो आज आधी रात प्रधानमंत्री बन सकते हैं और किसी में उनको रोकने की ताकत नहीं है। हमारा ख्याल है कि मनमोहन सिंह की जगह कोई भी जरा सा आत्मसम्मानी होता तो इस बयान के आने के बाद आधी रात भी नहीं होने देता और अपना इस्तीफा भेज चुका होता। हम बहुत से मामलों में सोनिया गांधी के व्यवहार की तारीफ करते आए हैं। लेकिन अब लगातार जिस तरह उनकी पार्टी के लोग अपने ही प्रधानमंत्री का अपमान करने में लगे हैं, अपनी ही पार्टी के सारे नेताओं और पार्टी का अपमान करने में लगे हैं, जिस तरह सोनिया का दामाद यह इंटरव्यू देता है कि उसकी जिम्मेदारी सोनिया के परिवार से दलालों को दूर रखने की है, जिस तरह वह यह बयान देता है कि सही वक्त आने पर प्रियंका राजनीति में आएगी और वह खुद भी राजनीति में आएगा, यह सब कुछ इस पार्टी के भीतर लोकतंत्र के खत्म हो जाने, पहले के मुकाबले अधिक खत्म हो जाने के सुबूत हैं। इंदिरा गांधी ने जब संजय गांधी जैसे तानाशाह को पार्टी और देश के ऊपर थोपा था, तो वे कम से कम मोर्चे पर खुद डटी रहती थीं और तमाम आरोपों का रूबरू सामना करती थीं। दस जनपथ की फौलादी दीवारों के पीछे से पार्टी और देश को चला रहीं सोनिया गांधी तो ऐसे आरोपों का सामना करने के लिए सामने भी नहीं आतीं। यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात नहीं है कि उनके पास अपनी पार्टी के, और अपने परिवार के ऐसे बड़बोले लोगों की कही बातों पर कहने के लिए भी कुछ नहीं है। हमें कांगे्रस के भविष्य की कोई फिक्र नहीं है, और वह जैसा करेगी वैसा भरेगी, लेकिन देश की इस सबसे बड़ी पार्टी की शुरू की गई गलत और घटिया परंपराएं देश के बाकी राजनीतिक दलों उसी निचले स्तर की बातें करने का एक नैतिक अधिकार दे देती हैं।
महिलाओं के बारे में कही गई ऐसी फूहड़ बात पर भी सोनिया गांधी अगर कुछ नहीं कहेंगी और कुछ नहीं करेंगी तो वे एक बहुत गैरजिम्मेदार पार्टी अध्यक्ष और यूपीए मुखिया साबित होंगी। साथ-साथ उन्हें अपनी पार्टी के श्रीप्रकाशों और जायसवालों की बातों पर भी अपना रूख साफ करना चाहिए कि किस आधी रात को मनमोहन सिंह को नींद से जगाकर बर्खास्तगी थमाई जाएगी।

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